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अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की दिशाहीनता

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की दिशाहीनता
आबाद जाफ़री, नैनीताल
सात जनवरी 2007 की सुबह पाकिस्तान टेलिविजन चैनल पर राष्ट्रपति जनरल परवेज मुर्शर्रफ ने एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए ‘कारगिल यु( को अपना महत्वपूर्ण संघर्ष’ ठहराया। भारतीय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मियाँ नवाज़ शरीफ़ जब कश्मीर समस्या के शान्तिपूर्ण समाधान के निकट पहुँचे तो कारगिल का खूनी संघर्ष शुरू हो गया और पाकिस्तानी सेना ने जनरल परवेज मुशर्रफ़ के नेतृत्व में तख्ता पलट कर दिया। नवाज शरीफ़ मौत की सज़ा पाते-पाते अन्तर्राष्ट्रीय दबाव के बाद निर्वासित कर दिये गये। यह सब अमेरिका की रणनिति से हुआ।
1971 के भारत-पाक यु( के बाद ‘शिमला समझौता’ हुआ। इन्दिरा गांधी और जुलफ़िकार अली भुट्टो जब कश्मीर पर सहमत हुए तो अचानक फिर पाकिस्तानी फौज हरकत में आई और जनरल जिया-उल हक के नेतृत्व में भुट्टो को अपदस्थ करके सूली पर लटका दिया गया। अमेरिकी समर्थन से जनरल जियाउलहक़ पाकिस्तान के एक छत्र शासक बने रहे। जब नाकारा हो गये तो उनके जहाज को हवा में ही विस्फोट करके उड़ा दिया गया। यह काम भी सी.आई.ए. के इशारे पर हुआ। इस से पूर्व वियतनाम में दो दशकों तक अमेरिका ने खूनी खेल खेला।
मध्य ऐशिया में अपनी जड़ें जमाने के लिए और रूस की सेना को बर्चस्व की लड़ाई में मात देने के लिए अपने यहाँ पढ़ने वाली यमन के एक अमीर ज़ादे को तैयार करके अफगानिस्तान भेज दिया। अफगानिस्तान में रूसी सेना बड़े पैमाने पर बर्बाद हो गयी और इसका जिम्मेदार यमन का अमेरिका परस्त वह नौजवान छात्र ‘ओसामा बिन लादैन’ के नाम से प्रसि( होकर अमेरिका का एक बड़ा हथियार बना। जब ओसामा ने अमेरिका विरोधी सरगर्मियाँ तेज की तो उसे और उसके संगठन ‘अलकायदा’ को आतंकवादी ठहराया गया।
जब तक ‘रूसी पाॅवर’ का अन्त नहीं हो गया तब तक ‘बिन लादैन’ अमेरिका की आँख का तारा बना रहा। अमेरिका ने जिस ‘अलकायदा’ को रूस के लिए तैयार किया था उसी अलकायदा ने अमेरिका को आँखें दिखानी शुरु कर दीं। ‘भस्मासुर’ ;अलकायदाद्ध ने जब पंेटागन और डब्ल्यू.टी.सी.पर अपना जलवा दिखाया तो अमेरिका की नींद हराम हो गयी। रूस की बर्बादी पर जश्न मनाने वाला अमेरिका ‘लादैन’ की हरकतों से थर्रा उठा। सच है दूसरों की चोट का एहसास तभी होता है जब खुद को चोट लगती है। बदला लेने के लिए अफगानिस्तान पर हमला बोलकर उस को खण्हर बना दिया गया। मगर अलकायदा का काम जारी है और उसे रोक पाने में अमेरिकी फौजें आज भी नाकाम हैं।
अमेरिका ने ईरान से अपनी शत्रुता का बदला लेने के लिए इराक के शासक ‘सद्दाम हुसैन’ को अपना हथियार बनाया। इराक-इरान यु( हुआ। दोनों बर्बाद हुए। अमेरिकी हथियारों के सौदागरों की चाँदी हो गयी। सद्दाम हुसैन, अमेरिका के सब से अच्छे दोस्त साबित हुए। मगर जब उन्होंने अपने तेल को ‘योरा’ में बेचना शुरू किया तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को झटका लगा। अमेरिका और सद्दाम हुसैन में मनमुटाव हो गया और इराक में जनसंहारक हथियारों का जखीरा होने का आरोप लगाकर कल के अच्छे दोस्त अमेरिका ने इराक पर बम्बारी करके मध्य एशिया की प्राचीन सभ्यता की जड़ माने जाने वाले इराक को ‘सभ्य समाज’ के लिए खण्डहर बना दिया। रासायनिक हथियारों का आरोप और विशेषज्ञों की रिपोर्ट झूठी साबित होने पर अमेरिकी फौज ने सद्दाम हुसैन को पकड़कर 22 वर्ष पूर्व की 148 लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहराकर ‘मानवता का दुश्मन’ घोषित करके यातनाएं दी। यातनाओं से भी सद्दाम हुसैन नहीं टूटे तो फाँसी दे दी गयी। टाॅर्चर के बाद भी जिस्म में साँस बाकी थी इसलिए फाँसी ही एक विकल्प था। लगभग 6 लाख लोग अमेरिकी फौज का निशाना बने। इनकी मौत का जिम्मेदार कौन ठहराया जायेगा? हो सकता है कल को यह जिम्मेदार ईराक के ‘नूरी-अन मालिकी’ और ‘जलाल तालिबानी’ पर डाली जाये और उनका भी वही संजाम हो जो सद्दा हुसैन का हुआ।
डारफोर ;सूडानद्ध और सोमालिया में इस्लामी राज्य को समाप्त करने और वहाँ इस्लामी प्रवृत्ति को लगाम लगाने के लिए ईसाई राज्य की स्थापना के अमेरिका प्रयास तेज हो गये हैं। आरोप भिन्न हैं मगर असलियत यही है।
‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ जागीरदारों की तवाइफ की तरह सजी-सँवरी, निरन्तर ‘मुजरा’ करने में तल्लीन है। जैसे जागीरदार की खुशी में साथ देने के लिए तवाइफ के हर ठुमके और कलाम पर चापलूस वाह! वाह! करने लगते थे, उसी तरह छोटे-छोटे मुल्क भी अपनी सम्प्रभुता और वजूद बचाये रखने के लिए वहाँ भी वाह! वाह! की आवाजें लगाते रहते हैं।
निर्दयी शासकों ने सदैव अपने विरोधियों का सफाया किया है। उनकी मजबूरी होती है। हकूमत के लिए जुल्म शासकों ने सदैव अपने विरोधियों का सफाया किया है। उनकी मजबूरी होती है। हुकूमत के लिए जुल्म जरूरी है। ऐसे निर्दयी शासकों से फर्याद बेकार है। मगर ‘सभ्य समाज’ मानवता के नाम पर दिन रात बम्बारी करके, अस्पतालों, जल स्रोतों, बाँधों, अनाज के बड़े-बड़े भण्डारों और तेल के कुओं को खण्डर बना दें तो सही-गलत की तमीज कायम रखना नामुमकिन हो जाता है। इंसानियत उन से भी दःुखी थी और इंसानियत इन से भी दःुखी है। हमारे पास सभ्य समाजों सहित ‘अन्तर्राष्ट्रीय नियम हैं, अन्तर्राष्ट्रीय कानून हैं, अन्तर्राष्ट्रीय जज हैं, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हैं, मानव अधिकारों का पिटारा है, अन्तर्राष्ट्रीय रेड क्रास का संगठन है मगर किसके लिए? जो कातिल हैं, वही जज हैं। जो सेना रक्षक हैं, वही मासूमों की जान ले रही है। ऐसे में आतंकवादी क्यों पीछे रहें। वह भी जहाँ अवसर मिलता है बहती गंगा में खून की डुबकी लगा लेते हैं। परिस्थ्तिियों ने आम आदमी से विवेक की वह अवस्था भी छीन ली है जिसमें वह सही और गलत का फैसला कर सकता था।
‘मीडिया’ चाहे कहीं का हो उसे असल मुद्दे और पर्दे के पीछे की सच्चाइयाँ छिपाने की व्यवसायिक मजबूरी है। झूठ बोलने की महारत और हुनर की अच्छी कीमत मिलती है। भारतीय मीडिया ;विशेष- रूप से इलेक्ट्राॅनिक मीडियाद्ध के अनेक पत्रकार सभ्यता की सीमाएं लांघते नजर आते हैं। कई एक की वाणी बदलगामी के रास्ते पर दौड़ती है।
क्या खबरों ;झूटी या सच्चीद्ध के लिए भाषा की शालीनता भी अप्रसांगिक हो गयी है?
मुझ से मेरी बेटी ने सवाल किया, पापा! ऐसा क्यों है?मैं ने जवाब दिया, ‘‘बेटी! पहले शिक्षा के साथ-साथ दीक्षा भी दी जाती थी। दीक्षा में तहजीब, भाषा, शब्द, शैली, उच्चारण और तकनीक सब शामिल होता था। अब केवल शिक्षा ;अर्थात डिग्री मात्रद्ध ही पर्याप्त है। शिक्षित-दीक्षित होकर लोग समाज का निर्माण करते थे, अब यह शर्त नहीं है। शायद यही वजह है कि ;राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीयद्ध समाज के तथाकथित निर्माणकत्र्ता अब अविश्वसनीय हो चुके हैं।
मैं किसकी राहबर समझूँ,
मैं किसको राहजन जानूँ
बड़ी मश्किल में हूँ,
दोनों की सूरत मिलती जुलती है।