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अन्धकार की सत्ता नहीं है,

”अन्धकार की सत्ता नहीं है, केवल प्रकाश का अभाव है“
डी॰एस॰ कोटलिया, नैनीताल -

भ्रष्टाचार एवं अपराध की बातें करना, अपराधियों व भ्रष्ट लोगों को कोसना तथा व्यवस्था के अन्दर व्याप्त बुराइयों के लिए तंत्र को उत्तरदायी ठहराना पर्याप्त नहीं है। समस्या के मूल में जाकर उसके समस्त कारण-प्रभावों का अवलोकन करने से ही समाधान तक पहुँचना संभव हो सकेगा।
किसी भी समाज की प्रगति के समानांतर उसमें कुछ विकार भी स्वाभाविक रूप से पनपते हैं। समाज की व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्ट आचरण ऐसा ही एक विकार है और यदि उसके कारण-प्रभावों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो उसका उपचार संभव है। सर्वांग विकास की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते समाज इससे मुक्त हो जाता है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भ्रष्टाचार समाज के विकास की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। यदि व्यक्ति के सन्दर्भ में बात की जाए तो भ्रष्टाचार का अर्थ है  भौतिक विकास की उच्चतर अवस्था को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त करने के लिए अल्प-मार्गों का अनुगमन करने की प्रवृत्ति अथवा अनैतिक व असंवैधानिक तरीकों से भौतिक उन्नति करने का प्रयास। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचरण की प्रवृत्ति वस्तुतः समाज की इकाई अर्थात् व्यक्ति की प्रवृत्तियों का ही विस्तार है।

किशोरावस्था में मनुष्य के आचरण में स्वच्छंदता व उन्मुक्तता आती है। परन्तु यदि वयस्क होते-होते उसके व्यवहार में परिपक्वता नहीं आती और उसमें अपने आचरण के प्रति सजगता व उत्तरदायित्व का भाव नहीं पनपता तो स्वाभाविक रूप से उसका व्यक्तिगत और सामजिक जीवन जटिल हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रौढ़ावस्था में भी किशोरों व अवयस्क तरुणों जैसा व्यवहार करता रहे तो यह उसके पतन का संकेत है, जो अंततः उसको चारित्रिक अधोगति की ओर लेकर जायेगा। भारतीय समाज इसका एक सजीव उदाहरण है जहां स्वतंत्रता प्राप्ति के सढ़सठ वर्ष से अधिक समय बीत जाने
के बाद भी समाज की इकाई अर्थात व्यक्ति की मानसिक अपरिपक्वता के कारण न केवल स्वच्छंदता अपने चरम पर है बल्कि उसका आचरण और भी निरंकुश होता जा रहा है।

दुर्जनों की सक्रियता समाज को जितनी हानि पहुंचाती है, उससे अधिक हानि समाज को सज्जनों की निष्क्रियता के कारण होती है। समाज के अन्दर दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को यदि शरीर में रोग उत्पन्न करने वाले तत्व (Disease Cells) की संज्ञा दी जाए तो सज्जनों की भूमिका शरीर की रोग-प्रतिरक्षण प्रणाली (Immune  System) की होनी चाहिए। जिस शरीर की रोग-प्रतिरक्षण क्षमता क्षीण और प्रभावहीन हो जाती है, तो स्वाभाविक रूप से वह विभिन्न प्रकार के विकारों और व्याधियों का निवास-स्थान बन जाता है। सज्जनता जब निष्क्रिय और निष्प्रभावी हो जाती है तो उसके संरक्षण में दुर्जनता को और अधिक पुष्ट पोषण मिलने लगता है  यह स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण व विनाशकारी होती है।

किसी समाज को उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर करने तथा सर्वांग विकास की स्थिति पर अलंकृत करने में समाज के इन पाँच तत्वों का योगदान होता हैः- (1) शासन, (2) धर्म, (3) विद्या, (4) कला और (5) अर्थ। ये पाँचों तत्व किसी भी समाज की वास्तविक शक्तियाँ होती हैं। विचारणीय विषय यह है कि इन पाँचों में से चार शक्तियाँ ऐसी हैं जिनका संसार की वर्तमान व्यवस्था में स्थायित्व नहीं है, और जिनका पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः अथवा स्वाभाविक हस्तांतरण भी संभव नहीं है। वे चार शक्तियाँ हैंः राजसत्ता, धर्म, विद्या एवं कला। परन्तु आर्थिक सत्ता एकमात्र ऐसी शक्ति है जिसका स्थायित्व संभव है और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण भी संभव है - वह भी किसी योग्यता या पात्रता के मापदंड के बिना अर्थात् केवल जन्म के आधार पर। यदि गौर से देखा जाए तो पहली चारों शक्तियों के स्वामी अर्थात् शासक - प्रशासक व न्यायिक, बुद्धिजीवी, कलाकार व धर्माधिकारी- इन सबके पास किसी दूसरे को अपनी मौलिक सत्ता या शक्ति का उत्तराधिकारी नियुक्त करने की स्वतंत्रता नहीं होती। यही कारण है कि समाज को दिशा प्रदान करने में सक्षम इन शक्तियों के स्वामी लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होकर कार्य करने के स्थान पर अपनी योग्यता व अवसर का लाभ उठाकर अधिकाधिक आर्थिक शक्ति अर्जित करने का प्रयास करते हैं। धन-शक्ति के संचय की यह प्रवृत्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि येन-केन-प्रकारेण धनोपार्जन करना ही लोगों के जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है। मानसिक परिपक्वता, भावनात्मक नम्यता और नैतिकता पर आधारित जीवन मूल्यों के अभाव के कारण व्यक्ति अपनी योग्यता, ऊर्जा और क्षमता को अपने भौतिक उत्कर्ष के निमित्त नियोजित करने की चेष्टा में ही लगा रहता है। जो समाज इन पाँचों शक्तियों का सदुपयोग करता है वहाँ स्वतः ही समृद्धि, सुख और शांति का वातावरण होता है तथा उस राष्ट्र का चरित्र ऊँचा होता है। परन्तु जिस समाज में इन शक्तियों का दुरूपयोग होने लगता है उसे पतन की गर्त में जाने से कौन बचा सकता है?

धन-शक्ति के संचयन की यह प्रवृत्ति ही समाज को अपराध की ओर प्रवृत्त करने के लिए भी उत्तरदायी है। समाज के एक वर्ग के पास आवश्यकता से अधिक धन-संपत्ति के संचित हो जाने के कारण निर्धन वर्ग के मन-मस्तिष्क में स्वयं के ‘उपेक्षित या शोषित’ होने की धारणा और पुष्ट होती है। उपेक्षित व शोषित होने की यह धारणा निर्धन वर्ग के मन में भय, अनिश्चितता, ईष्र्या, घृणा और द्वेष आदि की भावनाओं को जन्म देती है। सर्वप्रथम तो समाज में आर्थिक शक्ति के विस्तार की प्रवृत्ति पनपने के कारण भ्रष्ट आचरण पनपता है, फिर आवश्यकता से अधिक आर्थिक-शक्ति के प्रदर्शन व उसके अनैतिक उपयोग की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। आर्थिक सत्ता में व्यक्ति को स्वच्छंद और निरंकुश बनाने की क्षमता और प्रवृत्ति होती है। लोकसत्तात्मक व्यवस्था में राजसत्ता आर्थिक-शक्ति के प्रभाव में रहकर कार्य करती है। अर्थ-शक्ति केवल राज-सत्ता के सञ्चालन को प्रभावित करने तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि समाज की अन्य शक्तियों  न्याय, धर्म, विद्या और कला पर भी अर्थ-शक्ति का प्रभाव बन जाता है। धीरे-धीरे यह प्रभाव नियंत्रण के रूप में परिणत हो जाता है। दूसरी ओर समाज का वह वर्ग जो आर्थिक रूप से पिछड़ चुका होता है, उसमें अनिश्चितता, भय, ईष्र्या, कुण्ठा और आक्रोश पनपने लगता है। चूँकि व्यवस्था के स´चालन में उसकी न तो भागीदारी होती और न ही कोई हस्तक्षेप होता है, इसलिए अपने विकास के लिए उसे अपराध का मार्ग ही सर्वोत्तम विकल्प लगने लगता है। उनकी अर्द्धविकसित व अपरिपक्व मानसिकता ऐसे में आग में घी का काम करती है।

यदि शासक-प्रशासक व न्यायिक भी आर्थिक-सत्ता के आकर्षण और अधिकाधिक धन संचय की लालसा का शिकार हो जाएँ और समाज में पनप रही इन वितियों तथा भविष्य में इनके दुष्परिणामों के प्रति उदासीन रहने लगें तो भ्रष्ट व अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को निरंकुश होने से कौन रोक सकता है? तथा अपने मूल-धर्म एवं कर्तव्य-पथ से विमुख होकर आवश्यकता से अधिक धन-संपत्ति का संचय करने के लालच में अन्य तीनों शक्तियों के स्वामी  धर्माधिकारी, बुद्धिजीवी व कलाजीवी भी इसी प्रकार का  आचरण अपना लें तो उस समाज को धार्मिक, मानसिक व सांस्कृतिक पतन से कौन बचा सकता है? यही कारण है कि हमारे समाज में न केवल धर्मान्धता, अन्धविश्वास, कट्टरता बढ़ रही है बल्कि असहिष्णुता, संवेदनहीनता और चेतनाशून्यता आ रही है और भ्रातृत्व, उद्यमशीलता, सहयोग, समन्वय जैसे विकासमूलक गुणों का अभाव हो रहा है। जीवन-शैली, संस्कृति और आधुनिकता के नाम पर जिस नई सभ्यता का उदय हो रहा है, सही अर्थों में वह पतन का संकेत है।

परन्तु, स्थितियाँ कितनी भी भयावह क्यों न हो चुकी हों, उनके उपचार की संभावनाएं सदैव बनी रहती हैं। अन्धकार की अपनी कोई सत्ता नहीं है, वह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति हैद्य प्रकाश के अभाव को हम अन्धकार कहते हैं। विकार उत्पन्न करने वाली शक्तियाँ समाज व शरीर  दोनों में सदैव विद्यमान रहती हैं, परन्तु वे अपने उद्देश्य में तब ही सफल होती हैं जब उनका प्रतिरोध करने की क्षमता रखने वाली शक्तियाँ निष्क्रिय व निष्प्रभावी हो जाती हैं। समाज में तीन श्रेणियों के व्यक्ति हैं एक, वह जो विकार उत्पन्न करने में संलग्न रहते हैं, दूसरे, वह जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार करते हैं और यथाशक्ति उसका निर्वाह करने का प्रयास करते हैं, तीसरे, वह जो मूकदर्शक बनकर अथवा अधिक से अधिक से दुष्टों की आलोचना करके अपनी ‘सज्जनता’ का प्रमाण प्रस्तुत करना चाहते हैं। ‘सज्जनता’ केवल समाज के निर्माण में सक्रिय योगदान देकर अर्थात् निष्ठापूर्वक कर्तव्यों का निर्वाह करने से ही सिद्ध हो सकती है अन्यथा नहीं। अन्धकार तब तक बना रहेगा जब तक प्रकाश उत्पन्न नहीं किया जाता।