दिशा तथा दशा

अभिशप्त हैं वो जो अंग्रेजी नहीं बोलते...

अभिशप्त हैं वो जो अंग्रेजी नहीं बोलते...
राजशेखर पंत, नैनीताल -

अपने चुलबुले और सामयिक व्यंग के लिए प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक जेराॅड किंट्ज ने अपनी एक किताब ‘ई मेल फ्राॅम अ मैडम’ में लिखा है - ‘आई एम अ मैन आॅव लेजर, देट इस बिकाॅज आई हेव एन इंग्लिश डिग्री एंड आई कांट गेट अ जाॅब।’ अंग्रेजी विषय में डिग्री की शायद अपनी सीमाएं हों, पर अंग्रेजी जानना और फर्राटे के साथ उसे बोल सकने की योग्यता रखना कम से कम हमारे जैसे आंग्ल प्रेमी देश और समाज में, रोजगार की तलाश में भटक रहे किसी भी युवा को एक अतिरिक्त धार देने के अलावा कभी कभी उसके निहायत ही लचर दीखने वाले रेज्यूमे को एक अदद खूबसूरत सी बैसाखी भी पकड़ा देता है। हमारे देश में अंग्रेजी भाषा के बढ़ते बाजार को देखते हुए उन अभिजात्य स्कूलों की अकड़ को अच्छी तरह समझा जा सकता है जो वर्षों से अंग्रेजी और अंग्रेजियत को एक उत्पाद की तरह बेच रहे हैं। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई-लिखाई के प्रति बढ़ती बेरुखी के चलते इन कथित ‘इंग्लिश मीडियम’ स्कूलों की खासी माँग है आजकल। संवाद की सारी संभावनाओं को ‘स्पोकन इंग्लिश’ जैसे किसी बिकाऊ मुहावरे के इर्द-गिर्द समेट देने की कुछ उन स्कूलों की हड़बड़ी -जिनको अपने अस्तित्व और इज्जत बचाने की जद्दोजहद में शैक्षिक रंगभेद, अर्थात अन्य विषयों के बरअक्स अंग्रेजी को ज्यादा अहमियत देने की नीति का इजहार करते हुए संक्रमण के एक अनचाहे दौर से गुजरना पड़ता है -प्रायः बड़ी हास्यास्पद हो जाती है। शीर्ष नेतृत्व द्वारा अंग्रेजी का लादा जाना इन स्कूलों में एक सतत् प्रक्रिया होती है। अंग्रेजी की किताबें और कहानियां, अंग्रेजी नाटकों का जबरिया मंचन, अंग्रेजी गाने, विद्यालय में अंग्रेजी बोलने की अनिवार्यता -इस चिन्ता के चलते कि यहां का ‘हिंदी मुक्त परिवेश’ कहीं प्रदूषित न हो जाये। और फिर हिंदी बोलते हुए ‘पकड़े’ जाने पर सजा का प्रावधान- सच! बहुत सारे दबाव होते हैं उन स्कूलों के दमघोंटू वातावरण में, जो अंग्रेजी में महारत की मरीचिका गढ़ छात्रों और अभिभावकों को सुनहरे सपने बेचा करते हैं।
बाजार की ताकतों से समझौता करने वाले इन स्कूलों के मालिक और वो जो इन्हें चलाने के लिए जिम्मेदार हैं प्रायः यह भूल जाते हैं कि एक शैक्षिक संस्था के रूप में उनके द्वारा अंग्रेजी जैसी द्वितीय भाषा को सिखाने के लिए लक्षित समूह उन छोटे छोटे बच्चों का है जो अभी बढ़ रहे हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से जो अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं, और जो खुद अभी अपनी पहली भाषा को सीखने के दौर से गुजर रहे हैं। इस आयु में किसी भी बच्चे के लिए अनुभवों की विविधता और जिंदगी के नित नये रंगों से दो चार होना उसकी अभिव्यक्ति को मजबूत करता है, बशर्ते उसे स्वयं को अभिव्यक्त करने का अवसर मिले। यह वह स्थिति होती है जब वह नए शब्दों को ढूंढता है, वाक्यों को  गढ़ता है, कोशिश करता है कि उसके द्वारा चुने गए शब्द उसके विचारों और उसके अनुभवों के साथ न्याय कर सकें। कितनी बड़ी विडंबना है यह कि बच्चों को इस  नाजुक मोड़ पर हिंदी बोलने के लिए हतोत्साहित किया जाता है, गरज ये की वो अंग्रेजी बोलना सीख सकें........ यानि की सीढियां चढ़ना तो तुम सीख ही जाओगे पहले पहाड़ चढ़ना सीख लो।
किसी भी बढ़ते हुए बच्चे के लिए उम्र का एक ऐसा पड़ाव होती है यह अवस्था जिसमें जागरूक अभिभावकों या फिर ढंग के स्कूल के लिये उनके अंदर अच्छी किताबों के लिए आकर्षण पैदा करना तुलनात्मक रूप से ज्यादा आसान होता है। पर कहाँ करते हैं हम ऐसा। अंग्रेजी लादने की जल्दबाजी में स्वाभाविक रूप से अपनी मातृभाषा से अंतरंग होने की संभावना भी धुंधलाती चली जाती है। और बदकिस्मती है कि यह सब उस उम्र में होता है जिसे भाषाविद् क्रिटिकल पीरियड अर्थात पहली भाषा सीखने का सबसे स्वाभाविक और अच्छा समय मानते हैं। इस तरह के स्कूलों में काबिज हमारे स्वयंभू शिक्षाविद् प्रायः यह भूल जाते हैं कि बच्चा अपनी मातृभाषा को ‘ग्रहण’ करता है, सोखता है उसे कुछ उसी अंदाज में जैसे मानसून की पहली फुहार को सूखी जमीन सोखती है। इसके विपरीत दूसरी भाषा को सीखना पूरी तरह से एक अकादमिक और बौद्धिक प्रक्रिया होती है।
बजाय इसके कि बच्चों को उनकी बात उन्ही के शब्दों में कहने की छूट दी जाये उनसे अपेक्षा की जाती है की वे विभिन्न अवसरों के लिए लैंग्वेज लैब या फिर किसी स्मार्ट क्लासरूम में टंगे और ज्यादा स्मार्ट कहे जाने वाले बोर्ड में दिखाए गए, रटाये गए सिचुएशनल सेंटेन्सेस का प्रयोग करें। एक स्थापित सत्य है यह कि अपनी प्रथम या मूल भाषा में हासिल की गयी दक्षता ही इस बात को तय करती है कि दूसरी भाषा सीखने में किसी को कितना समय लगेगा। मैं अंग्रेजी सीखने सिखाने के खिलाफ नहीं हूँ। एक अन्तर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा होने के अतिरिक्त बहुत सुन्दर और समृद्ध भाषा है यह। साहित्य की एक सजीव विरासत है इसके पास। खोट है हमारे अंग्रेजी सिखाने के तरीके में। सीखने की शुरुवात ही इस पूर्वाग्रह के साथ होती है कि स्कूली दिनों में अपनी मातृभाषा में संवाद करने का ‘अपराध’ अंग्रेजी सीखने में बाधक होता है। निहायत ही बेबुनियाद धारणा है यह। अपनी मातृभाषा में बगैर संवाद के स्वाभाविक प्रवाह को रोके हुए यदि हम उन्हें अंग्रेजी में भी ऐसा कुछ पढ़ा या सुना सकें जो की उनके जीवन से जुड़ा हो, जिससे वे खुद को जोड़ कर देख सकें तो शायद हम उनके साथ न्याय कर सकेंगे। भाषाई वर्जनाओं को बच्चों पर लाद कर हम उन्हें अंग्रेजी बोल सकने पर गर्व और न बोल सकने पर शर्म करने वाले दो वर्गों में तो बाँट ही रहे हैं साथ ही हमारी यह अवैज्ञानिक पहल उनकी संवेदना को भी भोथरा कर रही है। संवेदना का सीधा सम्बन्ध आखिर अभियक्ति से ही तो होता है।
आज जब की बाजार की ताकतें बाहें चढ़ाये हुए हमारे सामने खड़ी हैं, हमें इस अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा को सीखने सिखाने के अपने तौर तरीकों के अतिरिक्त अपनी प्राथमिकताओं के बारे में भी दोबारा सोचना होगा। आने वाले दिनों के लिए किस तरह की पीढ़ी की दरकार है हमें- ऐसे युवाओं की रोबोटिक छाया प्रति जो प्रोग्राम्ड हों उन सिचुएशनल सेंटेन्सेस के विस्तृत संस्करणों को दोहराने के लिये जो हमने उन्हें स्मार्ट क्लासरूम में बिठा कर रटाये थे, या फिर ऐसों की जिनके पास व्यक्तिगत सोच हो, जो रचनात्मक हों और जिनमे क्षमता हो, उत्साह हो वाकई  कुछ नया कर सकने का। निर्णय हमें ही करना होगा।