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अयोध्या, अंगूठी और तोता

अयोध्या, अंगूठी और तोता
राजशेखर पंत, नैनीताल -

अपने पेशे से जुड़ी मजबूरियों के चलते लखनऊ में निहायत ही उबाऊ और बेस्वाद दिनचर्या वाले दो महिने गुजारने की झुंझलाहट तो थी ही, पर शायद मेरा अतीत के प्रति आकर्षण भी एक कारण था जिसने मुझे अचानक ही एक दिन सुबह-सुबह अयोध्या के लिए बस यूं ही निकल जाने का विचार दे डाला। चालीस के दशक में मेरे दादा जी की मृत्यु रामनवमी के दिन अयोध्या में ही हुई थी। मेरे अतीतजीवी मन के किसी अचेतन से कोने में पप्पा के द्वारा, जो मेरे दादा जी की मृत्यु के समय अकेले ही उनके साथ थे, दादा जी की आखिरी समय में कही गई कुछ बातों को बार बार दोहराये जाने का एहसास भी शायद मुझे बस यूंही वहां जाने की प्रेरणा देने की एक वजह रहा होगा।
सरयू का रेतीला तट, मोटर बोट और बजरे के बीच की किसी नावनुमा चीज़ में नदी के इस पाट से उस पाट तक का चक्कर (अपने ड्राइवर अशोक के आग्रह पर उस कार्यशाला की सैर जहां भविष्य में प्रस्तावित कथित भव्य राम मंदिर के पत्थरों को तराशने का काम फिलहाल बंद पड़ा है) अब एक किले में तब्दील हो चुकी राम जन्म भूमि की चक्करदार बैरीकेडिंग में डेढ़-दो घ्ंटे की भटकन और इसके प्रवेश द्वार पर छोटे छोटे बच्चों के माध्यम से कुछ चटख़ारेदार सेल प्रमोशन स्लोगन्स के साथ 6 दिसंबर को ‘ध्वस्त’ की गयी बाबरी मस्जि़द की वीडिओ सीडी की खुले आम बिक्री से जन्मा यह अफसोस कि हमारी संस्कृति तो ज़ख्मों को हरा रखने का संदेश कभी नहीं देती -यह सब कुछ दोपहर के दो ढाई बजे तक लगभग सिमट चुका था....फिर हनुमानगढ़ के दर्शन और फ्राइ की हुई बाटी और चोखे का लंच।
मैं दशरथ महल कही जाने वाली एक हवेलीनुमा इमारत के सामने खड़ा हूँ। पास ही कनक महल भी है। मान्यता है कि राजा दशरथ ने उपहार स्वरूप इसे सीता को दिया था। ये दोनों ही इमारतें शाम के 4-4.30 बजे दर्शनार्थ खुलती हैं। हमें अभी 45-50 मिनट और इंतजार करना होगा। एक आम हिन्दुस्तानी की तरह गीता का सोचना है कि यह संरचनाऐं संभवतः रामायण कालीन ही रही होंगी। स्थापत्य के कुछ पहलुओं जैसे आर्चेस़, कोर्बल ब्रेकेट्स इत्यादि के उपयोग को दिखाते हुए मैं उसे बताता हूँ कि यह दोनों इमारतें शायद एक या दो शताब्दि से अधिक पुरानी न हों। समय के साथ साथ इनमें आये परिवर्तनों को भी मैं स्थापत्य के अपने आधे अधूरे ज्ञान के माध्यम से उसे समझाने की कोशिश करता हूँ। तभी मेरी निगाह दशरथ महल के सामने बैठे एक 30-35 साल के व्यक्ति पर पड़ती है। कथित महल के दरवाजे पर एक चैरस सी जगह पर वह दरी बिछाये एक पिंजरा ले कर बैठा है। उसके सामने करीने से सजे हुए लेमिनेटेड कार्ड्स की एक पंक्ति है। पिंजरे में बंद प्रशिक्षित पक्षी के माघ्यम से शगुन विचार और भविष्य कथन का कार्य करता है वह। 4.30 तक यहां रुकना जरूरी है क्योंकि गीता को स्थापत्य से जुड़ा मेरा किताबी ज्ञान बहुत प्रभावित नहीं कर पाया है। वह कम से कम कनक महल को अन्दर से देखना चाहती है। वक्त काटने के उद्देश्य से मैं पक्षियों के सहारे भविष्य में झांकने का दावा करने वाले उस व्यक्ति के पास बैठ जाता हूँ।
एक निहायत ही गंभीर किस्म का, सपाट से चेहरे वाला व्यक्ति है वह। भविष्य में झांकने की कीमत है सिर्फ 10 रु। वह मेरा नाम पूछ कर पिजड़े का दरवाजा खोल देता है। एक तोता, ब्लैक रिंग्ड पैराकीट कहते हैं जिसे, बाहर निकल कर कुछ लिफाफे इधर उधर करता है- कुछ ढूंढ रहा हो जैसे। बाकी लिफाफों को यूं ही छोडकर वह एक लिफाफे के अंदर रखा हुआ लेमिनेटेड कागज़ बाहर खींच लेता है। वह सपाट चेहरे वाला व्यक्ति तोते को संबोधित करते हुए कहता है ‘‘महाराज एक बार फिर अच्छी तरह से देख लीजिये, यही है क्या?’’ तोता अब उस कार्ड की शक्ल के कागज को अपनी चोंच से पकड़ कर सीधा कर देता है। यह संकेत है शायद इस बात का कि कार्ड सही है। कार्ड में लिखा है कि मेरे नाम का पहला अक्षर ‘र’ होने के कारण मेरी राशि तुला है और इस वक्त फलाॅं फलाॅं ग्रह दशा के कारण मैं मानसिक रूप से परेशान हूँ। मैं हंसते हुए तोते के मालिक को बताता हूँ कि हम सभी भाई बहिनों के नाम पिताजी ने ‘र’ अक्षर से रखे हैं (वैसे मेरी राशि दीपक या ऐसा ही कुछ और नाम होने के कारण मीन हैं। वह निर्विकार भाव से कहता है ‘‘कोई बात नहीं पंडित जी आपका कार्ड दोबारा निकाल देंगे और इसके लिए आपको फिर से पैसा नहीं देना होगा।’’ पूर्व वर्णित कवायद को दोहराते हुए तोता फिर से एक कार्ड निकाल देता है। इस कार्ड में मेरी राशि मीन ही है तथा भविष्य फल लगभग समान है। मैं गीता से कहता हूँ कि अब वह ट्राइ करे। आश्चर्य सा होता है मुझे यह देख कर कि इस कार्ड में संबंधित व्यक्ति को स्त्री लिंग में संबोधित किया गया है। अब मेरे 12 वर्षीय बेटे टुकुर के लिए उसी पिज़रे के दूसरे हिस्से में बंद एक अन्य चिडि़या- जो कि चिडि़याओं के मेरे सीमित ज्ञान के अनुसार शायद हाउस-रैन है -कार्ड निकालती है। उसके लिए निकाला गया कार्ड, जैसी कि मुझे उम्मीद थी, उसे ‘बालक’ कह कर संबोधित कर रहा है। मुझसे 30 रू का कुल भुगतान लेकर वह सपाट चेहरे वाला व्यक्ति मुझसे कहता है कि यदि मैं चाहूँ तो ग्रह नक्षत्रों की आड़ी तिरछी गति से बचने के लिए एक अंगूठी पहन सकता हूँ। मेरी उत्सुकता स्वाभाविक रूप से थोड़ा बढ़ जाती है। मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बगैर वह मुझसे कहता है, ‘‘चलिए पहले देखते हैं आपको यह अंगूठी सूट भी कर रही है या नहीं। इसके लिए आपको अलग से कोई भुगतान नहीं करना होगा।’’ तोता पिजरे से बाहर आ कर पुनः एक कार्ड निकालता है। मुझे इस कार्ड में श्रीचक्र वाली उस अंगूठी को धारण करने की सलाह दी गयी है। तोते का मालिक मुझसे कहता है कि मैं पहचान के लिए उस कार्ड पर कोई चिह्न बना दूं। यदि ‘‘महाराज’’ फिर से इसी कार्ड को बाहर निकालते हैं तो मुझे उस अंगूठी को पहन लेना चाहिये। सारे कार्डों का ढेर बना कर वह उसे मेरे हाथ में दे देता है और कहता है कि मैं जितना चाहूँ उसे फेंट लूं। तोता दोबारा वही कार्ड निकाल कर सामने रख देता है।
चीन और थाइलैंड में भी पक्षियों के माध्यम से भविष्य कथन की परंपरा है। वहाँ इसके लिए प्रायः जावा स्पैरोज़ और केनेरीज़ का उपयोग किया जाता है। एक चीनी भविष्य वक्ता ने स्पैरोज़ को ट्रेन करने के बाद उनके द्वारा निकाले गये चित्रांकित कार्ड की मनमानी व्याख्या कर ग्राहकों को उल्लू बनाने का विस्तृत वर्णन भी अपने संस्मरणों में किया है। पर यहाँ दशरथ महल के बाहर बैठा चिडि़याओं का यह मालिक तो कमावेश चुपचाप ही बैठा है। इतना ही कहा है उसने मुझसे कि यदि मैं चाहूँ तो अंगूठी पहन लूं, बाजार में भी यह आसानी से उपलब्ध है। मुझे फायदा ही होगा। गीता को वह देवी पूजन की सलाह देता है। गीता को लग रहा है कि मैं शायद इस भविष्यवक्ता से कुछ अधिक ही प्रभावित हो रहा हूँ। मुझे सचेत करने के प्रयास में वह अंग्रेजी में कहती है कि इस तरह के लोग हिप्नोटाइज करना भी जानते हैं। मैं पिजरे से बाहर आते तोते और हाउस-रैन की तस्वीरें खींचना चाहता हूँ, पर मेरा मोबाइल डिस्चार्ज हो चुका है और पावर बैंक की लीड एन वक्त पर धोखा दे रही है। खैर गीता अपने दो मैगापिक्सल वाले मोबाइल से एकआध तस्वीर अनमने ढंग से खींचती हैै।
उस आदमी की चुप्पी और निर्विकार भाव, पक्षी द्वारा बार बार सही कार्ड निकाल देने के संयोग के साथ मिल कर मुझे एक हद तक प्रभावित कर चुके हैं। इस विद्या की तह तक जाने की मेरी पुरजोर कोशिश चिडि़याओं के मालिक के मुँह से केवल इतना ही उगलवा सकी है कि पिछली तीन चार पुश्तों से उसके परिवार में यह विद्या है। तोते को बचपन से ही पकड़ कर ज्योतिष विद्या का ज्ञान दिया जाता है- बस सिर्फ इतना ही।
मैं सोच रहा हूँ अगर इस व्यक्ति ने चिडि़याओं को सिर्फ प्रशिक्षित ही किया है तब भी यह कोई साधारण कार्य नहीं है। बहुत से प्रश्न अनुत्तरित भी हैं, खास कर तब जब कि हर संभावना पर विचार करने के बाद यह लग रहा है कि प्रशिक्षण की भी तो अपनी सीमाऐं हैं। अंगूठी की कीमत 350रु है। कम से कम इतना तो इस विद्या के सम्मान में बनता ही है। इस लोककला के इन गुमनाम हो रहे साधकों को एक रूढिवादी समाज में अंधविश्वास का ढिंढोरची मान कर हाशिए पर धकेलना भी तो शायद अक्लमंदी नहीं होगी। पैसे दे कर वह अंगूठी मैं उससे ले लेता हूँ। वह फिर मुझसे कहता है कि यदि मैं चाहूँ तो इस अंगूठी को बाज़ार से भी ले सकता हूँ और यह भी कि खराब हो जाने पर श्यामा चिडि़या वाले किसी भी भविष्यवक्ता के पास इसे बदला जा सकता है।
वर्ष 1972 में बना एक वन्य जीव कानून तोते और चिडि़याओं को इस तरह बंद कर कुछ करवाने की इज़ाज़त नहीं देता। कुछ स्वयं सेवी संगठन भी हैं जो ऐसे पक्षियों की कथित आज़ादी के पैरोकार बन अंग्रेज़ी के अख़बारों में अच्छी खासी स्पेस पा लेते हैं। पर दशरथ महल के सामने बैठे उस निर्विकार चेहरे को देख कर मुझे लगता है कि परिन्दों और इन्सान के रिश्तों को सिर्फ कानून के दायरे में बाँध कर समझना जल्दबाज़ी होगी। वह अंगूठी मैने शायद एक आध घंटे के बाद उतार दी थी। एक कमज़ोर इंसान हूँ मैं। पूजा स्थल के एक कोने में रख दिया है उसे। अब जब भी कभी उस पर निगाह जाती है तो एक सपाट सा चेहरा आँखों के सामने आ जाता है़....पिंजरे से बाहर निकले तोते से यह कहता हुआ - ‘‘महाराज एक बार फिर अच्छी तरह से देख लीजिये, यही है क्या?’’