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अल्मोड़ा:- स्वर्णिम इतिहास और इसकी प्रेरणा

अल्मोड़ा:- स्वर्णिम इतिहास और इसकी प्रेरणा
कान्हा जोशी, बक्शीखोला, अल्मोड़ा -

अल्मोड़ा नगर, नाम सुनकर ही एक ऐसा परिदृश्य जिसमें अगाथ सांस्कृतिक छठा, इतिहास की धरोहरें, बाल मिठाई का मीठा स्वाद, दशहरे में पुतलों की लंबी कतारें, चितई मंदिर में टांगी गईं मनौतियां, प्रेम तथा अद्वितीय मानवीयता समावेशित है। परन्तु वर्तमान की सुन्दरता और कुरूपता का अनुभव करके कोई निर्णय निकाल लेने से पूर्व इतिहास के पीले पन्नों में छिपी घटनाओं और अनुभवों को जान लेना भी अति आवश्यक है।

अल्मोड़ा नगर चंद शासकों द्वारा बसाया गया। कहा जाता है कि बसने से पूर्व यह कत्यूरी राजा बैचल देव का अधिकार क्षेत्र था। यदि अल्मोड़ा नगर के बसने का संदर्भ आए तो इसमें दो घटनाएं प्रमुख हैं- पहली ये कि कुमाऊं के इतिहास के अनुसार बेचलदेव ने बहुत सी भूमि संकल्प करके एक गुजराती ब्राह्मण चंद तेवारी को दी। बाद में फिर चंद राज्य स्थापित होने पर इस क्षेत्र के मध्य में होने के कारण यहां नगर बसाया गया। दूसरी घटना एक रोचक किंवदंती है कि 1560 में राजा कल्याण चंद जब इस क्षेत्र में शिकार करते हुए आए तो उन्हें एक खरगोश दिखायी पड़ा। अल्मोड़ा की भूमि पर पहुंचकर यह खरगोश सिंह में बदल गया। ज्योतिषियों ने भी वृतांत सुनकर भविष्यवाणी कर डाली कि यह भूमि सिंहो की भूमि है। जहां नगर बसाने से शत्रु भयभीत होंगे। अतः यहां नगर बसा दिया गया। सत्य भी है क्यूंकि भारतरत्न पं0 गोविन्द बल्लभ पंत, सुप्रसिद्ध कवि श्री सुमित्रानंदन पंत, पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल बी0 सी0 जोशी, पद्मश्री छत्रपति जोशी, पद्मश्री देवकी नन्दन पाण्डे, पद्मश्री सुखदेव पाण्डे, प्रख्यात अर्थशास्त्री पी0 सी0 जोशी आदि सिंहो को जनने वाली भूमि को ‘सिंहों की भूमि’ कहा जाना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हालांकि यदि नाम का प्रसंग आये तो प्रारम्भ में यह क्षेत्र राणापुर के नाम से जाना जाता था। कई ताम्रपत्रों में इसका उल्लेख मिलता है। परन्तु नाम  ‘अल्मोड़ा’ पड़ जाने पर यह तर्क बहुप्रचलित है कि यहां पाए जाने वाली ‘किलमोड़ा’, ‘भिलमोड़ा’, ‘चलमोड़ा’ घास के नाम पर ही इसका ऐसा नाम रखा गया क्यूंकि ‘मोड़ा’ शब्द ‘मोरट’ से उत्पन्न माना गया है, जिसका अर्थ ‘घास’ होता है।

अल्मोड़ा नगर की ऊंचाई 5200-5500 फीट तक है। यदि सांस्कृतिक विशेषताओं की बात की जाए तो यह क्षेत्र अपना उत्कृष्ट स्थान रखता है। यहां के मंदिर शिल्प, श्रृद्धा एवं सुन्दरता के परिपेक्ष्य में अतुलनीय व अलौकिक हैं। अल्मोड़ा नगर की प्रमुख विशेषताओं में गिनी जाने वाली डेढ़ किमी0 विस्तार में फैली पटाल बाजार यहां का उन्नत आकर्षण है। कहा जाता है कि यहां की कचहरी पहले चंद राजाओं को मल्ला महल था। पहले कुमाऊं कमिश्नर अल्मोड़ा ही रहा करते थे परंतु बाद में नैनीताल रहने लगे। 1910 तक जहां अल्मोड़ा में सरकारी चेयरमैन होते थे वहीं 1911 में यहां पहले निर्वाचित चेयरमैन चुने गए।

अल्मोड़ा नगर ने राष्ट्र की स्वतंत्रता में समूचे देश के साथ आंदोलनों में भागीदारी करने का भी जज्बा दिखाया है। अल्मोड़ा में ‘झण्डा सत्याग्रह’ और गांधी जी के आंदोलन का अनुसरण करने हेतु जनमानस जागृत रहा। कई स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्र की स्वतत्रता हेतु शहीद हो गए जिनमें विक्टर मोहन जोशी का नाम अविस्मरणीय है। जिनको 25 मई 1930 ई0 को सभा में अल्मोड़ा म्युनिसिपल बोर्ड पर राष्ट्रीय झंण्डा फहराने के विरोध में गोरखा सिपाहियों द्वारा दंड प्रहार से विक्षिप्त अवस्था में पहुंचा दिया गया और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गयी। इसके अतिरिक्त इन आंदोलनों में उनके साथ अनेक सेनानी श्री तारा दत्त जोशी, बद्रीदत्त पाण्डे व महिलाएं श्रीमती बच्चीदेवी आदि थे। अल्मोड़ा का भूमि वास्तविकता में ऐसे ही सिंहों और ऐसी ही देवी रूपों के कारण स्वर्णिम इतिहास सहेजे हुए है।

यदि शिक्षा की बात की जाये तो अल्मोड़ा बुद्धिमानों का भूमि कही जाती है। यहां के बारे में तो यह बात भी प्रचलित है कि किसी समय जब लोगों में उच्च शिक्षा का अभाव इतना हावी था कि दसवीं कक्षा पास करना भी बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, उस समय यदि सड़क से पत्थर उठाकर भी किसी भी घर की छत की ओर फेंका जाये तो आवाज आती थी, मैं ग्रेजुएट हूँ। केवल विनोद की दृष्टि से नहीं, वास्तविकता में अल्मोड़ा कई बुद्धिमानों की भूमि रहा है। यहां की कई प्रतिभाएं राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी बुद्धिमत्ता का लोहा मनवा रही हैं और अल्मोड़ा की भूमि को गौरवान्वित कर रही हैं। परंतु आज प्रतिभाओं को उचित मंच और प्रोत्साहन न मिल पाने के कारण वे अपनी योग्यतानुसार सम्मान पाने से वंचित हैं।

यूं तो इतिहास के पीले पन्ने बहुत कुछ बोलते हैं। लोगों के अनुभवों से प्राप्त ज्ञान, अपने अनुभवों से देखी गयी स्थितियाँ पुस्तकें, इतिहास का बीता ज्ञान व जानकारी अगाध है। परंतु हमारे लिए इतिहास में घमंड करने से अधिक आवश्यक और तर्कपूर्ण है वर्तमान की स्थितियों का अवलोकन कर उसका निदान करना ताकि पूर्वजों द्वारा जो हमारे लिए स्वर्णिम इतिहास छोड़ा गया है वो आने वाली पीढ़ी हेतु भी स्वर्णिम ही हो। आशय यह है कि इतिहास के पीले पन्ने केवल गौरव करने को साधन अथवा हमारा अहंकार ही नहीं अपितु प्रेरणा भी है।