हमारे लेखक

अल्लाह के इस्लाम से मुल्ला के इस्लाम तक

अल्लाह के इस्लाम से मुल्ला के इस्लाम तक
आबाद जाफ़री, नैनीताल
610 ई0 में अरब में हजरत मुहम्मद (स0अ0व0) ने इस्लाम को पुर्नस्थापित करने की घोषणा की। कुरान की जो पहली आयत् अवतरित हुई उसका शुभारम्भ ‘इकरा’ (अर्थातः पढ़ो) से हुआ। उनके अनुयाइयों ने कुरान की शिक्षाओं को आत्मसात किया और प्रचारित करने में सफल हुए। 662 ई0 में चैथे ख़लीाफ़ा हज़रत अली (अ0स0) की हत्या के पश्चात अरब के कबीले खुलकर आमने-सामने आ गये और पारस्परिक खूनी संघर्ष आरम्भ हो गया। परिणाम स्वरूप मक्का, मदीना, बसरा, कूफ़ा और दमिश्क (सीरिया) में अनेक सम्प्रदाय पैदा हो गये और इस्लाम की वास्तविकताओं को लेकर पारस्परिक जंग छिड़ गयी। उस समय कुरान की हस्तलिखित चन्द प्रतियों के अतिरिक्त अन्य दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। मुहम्मद साहब (स0अ0व0) के शिष्य भारी संख्या में थे जो धार्मिक आवश्यकताएँ पूरी करते थे परन्तु ‘खिलाफ़त’ के स्थान पर बादशाहत स्थापित करन के खूनी संघर्ष में 682 ई0 तक लगभग 18 हजार सहाबी (हज़रत मुहम्मद स0अ0व0 के शिष्य) मार डाले गये। इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं को भारी क्षति पहुँची। आगे चलकर इस्लाम के नाम पर अनेक सम्प्रदाय (फिरके़) कुकरमुत्तों की भांति उत्पन्न होकर स्ंवय को वास्तविक इस्लाम के अनुयायी होने का दावा करने लगे। हजरत मुहम्मद (स0अ0व0) के 29 वर्ष पश्चात से ही मनगढ़त व्याख्याओं और टीकाओं ने वास्तविक इस्लाम का चेहरा बदल दिया। इसी जमाने में यज़ीद के तथाकथित इस्लामी गिरोह की सेनाओं ने मदीना लूटा, सैकड़ों महिलाओं से बालात्कार किया, हजरत मुहम्मद ( स0अ0व0) की पत्नी उम्मे-सलमा का घर लूटा गया, मस्जिद में घोड़े बांधे गये, सैनिकों ने लूट मचायी, आक्रमण किया और ‘काबा शरीफ’ को आग लगा दी। सारी इस्लामी व्यवस्था इस्लाम के नाम पर बने फिरकों में बंट गयी। यह एक बड़ा भयानक संकट था।
इमाम अबू हनीफ़ा (मृ0 772 ई0) इस्लामी जगत के पहले ऐसे व्यक्ति और विद्वान हैं जिन्होंने अपने कुछ शिष्यों की सहायता से इस्लाम के सिद्धान्तों और आवश्यक नियमों को दस्तावेजी शक्ल प्रदान की। उन्होंने चार मापदण्ड निर्धारित किये 1. कुरान 2. हदीस(हजरत मुहम्मद स0अ0व0 के निर्देश) 3. इजमा और 4. क़्यास। इनके अनुसार पहले कुरान से समस्याओं का समाधान किया जाये, यदि स्पष्ट नहीं किया जा सके तो ‘हदीस की सहायता ली जाये। यदि हदीस में विरोधभास हो तो ‘इजमा’ (अर्थात इस्लामी विशेषज्ञों का बहुमत) द्वारा हल निकाला जाये यदि फिर भी तसल्ली ने हो सके तो ‘क्यास’(अनुमान) को आधार बनाया जाये।
अबू हनीफ़ा ने अपने जीवन काल में इस्लामी शरीयत से सम्बन्धित 83 हजार समस्याओं की शन्तिपूर्वक समाधान निकालने में सफलता प्रदान की। उन्होंने इस्लाम आधारित अन्तर्राष्ट्रीय कानून, दिवानी-फौजदारी कानून, साक्ष्य कानून, निकाह, तल़ाक, विरासत, भूमि आध्याप्ति कानून, गैर मुस्लिमों के साथ सम्बन्ध और लोकनिधि (बैतुल माल) से सम्बन्धित अनेक नियमों को संहिताबद्ध किया जिन्हें तत्कालीन समस्त इस्लामी शासकों द्वारा स्वेच्छापूर्वक स्वीकार कर अपनी-अपनी रियासतों मंे लागू किया। अबू हनीफ़ा ने अपने 36 शागिर्दो(शिष्यों) को विशेषता प्रदान की। जिनमें 28 न्यायिक विशेषज्ञ, 6 मुफ्ती (फतवा जारी करने के लिए अधिकृत विशेषज्ञ) और 2 मुफ़्ती और काज़ी तैयार करने वाले शरीयत के जानकार और विशेषज्ञ थे। उक्त सभी अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर कार्यरत रहे और कभी दूसरे विशेषज्ञ के क्षेत्र में किसी ने अतिक्रमण नहीं किया। (दुर्भाग्य से आज प्रत्येक मस्जिद का मुल्ला स्वंय भू जस्टिस, काजी, मुफ़्ती और आलम बना हुआ है और अधिकृत नहीं होने के बाद भी फतवे जारी करता रहता है जिससे सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है और ऐसे मुल्लाओं को कोई रोकने वाला नहीं है। अबू हनीफा के मानने वाल मुल्लाओं को याद रखना चाहिए उन्होंन ‘कभी किसी को जिक्र बुराई के साथ नहीं किया है।)
अबू हनीफा के पश्चात आगे चलकर तीन अन्य इस्लामी विचारधाराओं (फिकहा) का उदय हुआ जिन्हें उनके विचारकों के नाम से जाना जाता है।