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अविश्वसनीय विश्वास - (?)

अविश्वसनीय विश्वास - (?)
हेमंत बिष्ट, खुर्पाताल
अपने समय के पढ़े-लिखे पिताजी ने हमेशा शिक्षा को महत्व दिया। लखनऊ में पढ़ाई, वहीं नौकरी फिर घरेलू परिस्थितियों के कारण लखनऊ से खुर्पाताल (नैनीताल) आ जाना, फोरेस्ट डिपार्टमेण्ट में जाॅब और उसके बाद नैनीताल में ही फल-सब्जी की दुकान करना और एक बार पुनः पारिवारिक विषम परिस्थितियों के कारण, खुर्पाताल में ही शाक-सब्जी का उत्पादन करना, पिता जी के कैरियर के कई पड़ाव रहे। लेकिन उनका मानना था कि किसी भी काम के लिये शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण कारण है।
गाँव में शिक्षा का वातावरण बनाना उनकी अभिरुचि रही। कक्षा पाँच के बाद विद्यालय न होने की स्थिति में अपने मित्रों स्व. गोधन सिंह, स्व. मनीराम शर्मा जी....आदि के साथ, मनीराम शर्मा जी के निकटवर्ती स्व. श्रद्धेय गंगा गिरि बाबा महाराज के माध्यम से गाँव वासियों ने शिक्षा की अलख जगाने हेतु, जू.हा. स्कूल खुलवाया।
उस जमाने की पढ़ाई का प्रभाव कि पिता जी धारा प्रवाह अंग्रेजी बोला करते थे। घर में गाँव के बच्चे पढ़ने आते थे। बड़े बच्चों को पिता जी पढ़ाते तो अपने से छोटे बच्चों को दीदियाँ पढ़ाती थीं। 4-5 साल के बच्चों को मैं भी शौकिया पढ़ाता क्योंकि उन दिनों मैं 6-7 वर्ष का रहा हूँगा। ईजा ने स्कूल नहीं पढ़ा था लेकिन हिन्दी पढ़ना, लिखना जानती थी और कुछ वाक्य रटे-रटाये अंग्रेजी के भी।
बात लम्बी हो रही है लेकिन जो कुछ मैं, कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि ‘पाॅली हाउस’ इत्यादि का कन्सेप्ट तो आज का है, पिता जी तभी से अनसीजनल सब्जी उत्पादन करते थे। पहाड़ की थोड़ी सी जमीन हुुई उसी में तरह-तरह की सब्जी उत्पादन करके, खूबसूरत डिसप्ले करना पिता जी की विशेषता थी। रेडिस, चुकन्दर, लेट्युस, शलजम, मूली, गोभी, गाजर आदि का इतना सुन्दर डिसप्ले खेतों में दिखता था मानों कोई पेंटिंग बनी हो।
यातायात के साधन नहीं थे। नेपाली एक कण्डी (डोके) में नैनीताल सब्जी ले जाते और आढ़त में पिता जी के निर्देशानुसार सजा कर बेचने को रखते तो सभी पहचान जाते कि यह सब्जी ‘बाबू साहब‘ (पिता जी का प्रचलित नाम बाबू साहब था) की है और थोड़ी सी सब्जी, अच्छे दामों में बिक जाती। घूमने वाले (पर्यटक) गाँव में आते तो खेतों को देखकर मुग्ध हो जाते। ईजा जब अंग्रेजी के वाक्य भी बोलती तो लोग आश्चर्य चकित हो जाते। बाबू जी की फ्लूएन्ट अंग्रजी भी कौतुहल का कारण बन जाती।
क्षैलेरी, लैट्यूस और हाथीचक (आर्टी चोक) अंग्रजों के पसंदीदा शाक थे। अर्टिचोक में, पत्तियों में काँटे, और फूल भी काँटा युक्त समझिए जैसे कनैल ‘भरभण्डा’ का विकसित रूप। लोग घर आकर ही खरीद कर ले जाते थे।
समय तेजी से निकलता गया। मैं और दीदियाँ (हन्सा दी, देबा दी चन्द्रा दी) शिक्षक-शिक्षिकाओं के रूप में कार्य करने लगे, बाबू ने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर लीं। आयु 73-74 वर्ष हो गयी.....खेती का काम कम हो गया। बाबू क्षीण और रुग्ण हो गए लेकिन फिर भी खेती की परम्परा चलती रही। ईजा और पत्नी गीता हर तरह की सब्जी केवल दस्तूर बनाए रखने के लिये लगवाती रही। गाँव की ही महिलाओं के सहयोग से खेती चलती रही।
1988 में, मैं ट्रांसफर होकर रा.इ.का. ज्योलीकोट आ गया। पिता जी बहुत बीमार रहने लगे। इसलिये मैं खुर्पाताल से ही अप-डाउन करता रहा। अचानक पिता जी का स्वास्थ्य बहुत ही खराब हो गया। मैं पिता जी के कक्ष में ही बैठा था। अनसीजनल सब्जी उत्पादित करके पिता जी ने आई.ए.आर.ई.(इण्डियन एग्रीकल्चर रिसर्च इन्स्टीट्यूट), आई.सी.ए.आर. आदि की प्रदर्शनियों में कई-कई उच्च कोटि के पुरस्कार जीते थे। उन प्रमाण-पत्रों, फोटोग्राफ्स को पिता जी ने अपने कमरे में सुसज्जित किया था। उन्हीं को देखते हुए मुझे ‘हाथीचक’ की याद आ गई। मैं देखते-देखते उस स्थान तक पहुँचा जहाँ हाथीचक के पौंधे लगे होते हैं। मैंने देखा, हाथीचक उजड़ चुका था। मैं चिंतित होकर घर लौटा। ईजा और पत्नी से पूछा ‘हाथीचक के पौंधे नहीं हंै? ईजा ने कहा वह उजड़ गया है। मुझे लगा पिता जी की निशानियाँ खोने लगी हैं, कहीं पिता जी को भी कुछ न हो जाय। पिता जी की रुग्णता इतनी बढ़ गयी कि बचने की कोई उम्मीद ही नहीं रही। आर्टीचोक से इतना लगाव इसलिये क्योंकि एक बार श्री बिशन प्रधान बड़े बाबू आर्टिचोक का पौंधा ले गए थे और जाते वक्त कहने लगे थे, बाबू साहब जब तक यह आर्टिचोक का पौधा रहेगा, तब तक आप भी दिमाग में बने रहेंगे। मेरे बाल मन ने इसका न जाने क्या अर्थ लगा लिया था। एक दिन उदास-निराश ज्योलीकोट विद्यालय से लौट रहा था तो रास्ते में ज्योलीकोट निवासी श्री ललित जोशी (एडवोकेट) मिले। उदासी का कारण पूछने लगे। मैंने बताया तो पहले खूब हँसे, फिर बोले यार ये कलाकार कवि, सभी पागल होते हैं क्या? बाबू का इलाज करवाओ ठीक हो जाएंगे। मैं, आगे बढ़ गया ! फिर बोले, ‘‘वैसे कैसा होता है आर्टिचोक?’’ मैंने नमूना बताया। बोले, ‘‘चलो-चलो वो यहीं नीचे होता है।’’ हम दोनों मौन पालन विभाग की ओर बढ़े। वहीं से हाथीचक का पौधा उन्होंने दिलवाया। मुझे लगा जैसे पिता जी के लिए कोई आषधि मिल गयी। मैं पौधे घर लाया, रोपित किये। जैसे-जैसे पौधे उगने लगे...पौधे स्वस्थ्य होने लगे...पिता जी भी स्वस्थ्य होने लगे। इधर पौधे स्वस्थ्य हुए उधर पिता जी के स्वास्थ्य में अप्रत्याशित सुधार हो गया। किसी को भी संकोच वश यह किस्सा नहीं सुनाया केवल ललित जोशी जी को छोडकर...।
ज्योलीकोट से ट्रांसफर होकर पटवाडांगर आ गया 1991 में। पिता जी का स्वास्थ्य इस बार बहुत ही खराब हो गया। फिर से चिंताओं में भटकते हुए गोशाला के नीचे उसी स्थान में गया जहाँ ‘हाथी चक’ के पौधे लगे थे। इस बार हाथीचक फिर गायब था। अचानक याद आई कि एक बार, कोई मेहमान हाथीचक को देखकर बोले थे कि ”हाय! य अलच्छणि कनैल क्यलै लगै राखौ?“ (ये कुलक्षणी काँटे क्यों लगाए हैं?) मैंने उनसे कहा था कि हमारे लिये यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिद्दी स्वभाव के मेहमान ने एक दो लट्ठ भी पौधों पर चलाए थे और मैंने रोका था। मैं घबराहट में घर आया। मैंने पूछा, ”हाथीचक के पौधे?“ हँसकर घर वालों ने बताया कि मेहमान उसे चूट कर खतम कर गए हैं। मैं क्रोध से तिलमिला उठा.. मुझे लगा कि उन्होंने पिता जी की दवा की शीशियाँ तोड़ दी हैं, पिता जी की औषधियाँ जला डाली हैं...। अगले ही दिन मैं ज्योलीकोट भागा...। एक जीर्ण-क्षीर्ण पौधा मिला, घर लाकर रोपा। जितनी सुश्रूषा बाबू जी की की, उतनी ही चिन्ता उस पौंधे की भी की। न बाबू जी का स्वास्थ्य सुधरा और ना ही हाथीचक पनप पाया। अंततः सितम्बर प्रथम सप्ताह में पौधा गलकर समाप्त हो गया और 8 सितम्बर 1991 को पिता जी स्वर्ग सिधार गए।
इस अविश्वसनीय विश्वास की कहानी बताते हुए संकोच का अनुभव करता हूँ क्योंकि अन्धविश्वास मूर्खता है कहते-कहते अपनी मूर्खता और विश्वास को तोलने लगता हूँ।