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आँखें

आँखें
- निर्मला पंत ‘बबली’, नई दिल्ली
जब वक़्त मिला और पीछे मुड़कर देखा
तब पता चला कि
कितनी दूर निकल आए हम
रिश्ते निभाते निभाते
माँ बाप बच्चे ससुराल ये समाज
और अपने पराये बस यही ध्यान रहा
पर उम्र के इस पढ़ाव पे समझ आया
कि खुद को खो दिया हमने
शायद अपनों को पाते पाते
इस एक छोटी सी जिंदगी में
न जाने क्यूँ दर्द मिले बड़े बड़े
पर हर किसी ने यही कहा कि,
‘‘ये तो सब तकदीर का खेला है’’
तो भला जाकर किससे लड़ें?
‘‘ये आँखें ....................................’’
ये मेरी आँखें बहुत रोई है
शायद इतने वर्षों में, ये सोने और
सपने देखने से अधिक ............. रोई हैं
पर लोग ....................? लोग कहते हैं
इन आँखों में झील सी ‘गहराई’ है
एक ‘चमक’ है .......... एक ‘कशिश’ है
कहते हैं ये आँखें सब कुछ ‘बोलती’ है
झूठ कहते हैं .................... ये लोग
या झूठ बोलती है ये आँखें?
(पूछो क्यूँ?)
चलो बता ही देती हूँ जाते जाते
कि सबको तो सब ‘कशिश’ दिखी
‘चमक’ दिखी ........ या ‘गहराई’ दिखी
शायद डूब जाने का दिल भी किया हो
और एक हम हैं ........... और एक हम हैं
जो शक गए ‘दर्द’ छुपाते छुपाते।