युवा कलम

आओ जानें चिडि़यों का संसार भाग 1

आओ जानें चिडि़यों का संसार
लोकेश कुमार पाण्डे, नैनीताल-

पक्षियों के बारे में हमने काफी कुछ रोचक जाना। उनके बारे में समझने का प्रयास किया लेकिन विकास की भूख और मनुष्य की मैं वाली प्रवृति ने इन पर कई प्रतिकूल प्रभाव भी डाले जिसके कारण इसका दूष परिणाम पूरा पशु जगत भुगतने को मजबूर हो रहा है। आज इन सभी पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। प्रकृति में हुए इस असंतुलन के कारण जो प्रदूषण की मात्रा बढ़ी है चाहे वह जल प्रदूषण हो, वायु प्रदूषण हो, ध्वनि प्रदूषण हो, प्रकाश प्रदूषण या फिर रासायनिक प्रदूषण हो, इन सभी के अलावा आवास व भोजन की कमी ने इन्हे और भी समस्या में डाल दिया है। ध्वनि प्रदूषण का सीधा प्रभाव इनकी संख्या पर पड़ा है क्योेंकि गाने वाले पक्षी अपना जोड़ा बनाने व परिवार बढ़ाने के लिये अपनी मीठी ध्वनियों पर ही निर्भर करते हैं। लेकिन प्रदूषण के कारण इनकी इस प्रक्रिया में प्रभाव पड़ता है। जिससे वह समय पर जोड़ा नहीं बना पाते और उनकी संख्या नहीं बढ़ पाती है। वैसे ही प्रदूषित जल और उसमें उपस्थित प्रदूषित भोजन सामग्री भी इनके जीवन चक्र में प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

समुद्र में जहाजों से रिसने वाला तेल व अन्य माध्यमों से जो तेल व प्रदूषण फैलता है, वह समुद्रीय पक्षियों के लिए मौत का कारण बन जाता है। क्योंकि इन पक्षीयों के पंखों में तैलिय ग्रन्थियाँ होती है जो कि पानी को इनके शरीर से व पंखों से दूर रखती है। जब तेल इसमें चिपक जाता है तो वह इसे पंखों से हटाने का प्रयास करती है और साफ करने की प्रक्रिया के दौरान शरीर के अन्दर प्रवेश कर जाता है और शरीर को नुकसान पहुंचाता है। कई बार मृत्यु का कारण बन जाता है। घटते जंगल और शिकार ने तो जले में कटे का काम कर दिया। प्रवासी पक्षी जो कि समय-समय पर स्थान परिर्वतन करते हैं। वह अत्यधिक कौलाहल के कारण कई प्रकार के शिकारीयों को आकर्षित करते है। जिसके कारण वह भोजन व व्यापार के लिये मारे जाते हैं। पर्यावरण को व्यवस्थित करने और पारिस्थितक संतुलन बनाये रखने के लिए पक्षियों का विशेष महत्व है। जैसे इस समय पक्षियों का परिवार बढ़ाने का समय है और फसल भी पकती है। पेड़ों में बौर भी आती है तो सभी प्रकार के कीट पतंगों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है। यदि इन कीटों की संख्या में नियन्त्रण नहीं हो तो इतनी बढ़ जाय कि शायद पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश आना भी सम्भव न हो। यदि आपने टिड्डीयो का झुंड देखा हो तो आपके समझ में बात आ जाय। पक्षियों को इनके माध्यम से भोजन की प्राप्ति हो जाती है। जिससे पक्षियों के बच्चों को पोषण प्राप्त होता है। यह श्रंखला पक्षियों से भी आगे इसी प्रकार चलती है। जिससे खाद्य श्रंखला पूर्ण होती है।

यह है प्राकृतिक की संतुलन करने की व्यवस्था लेकिन बढ़ते प्राकृतिक दोहन ने असंतुलन की स्थिती गम्भीर कर दी है। पर्यावरण में हस्तक्षेप के कारण पक्षियों की प्रवास यात्रा भी प्रभावित हो रही है। पक्षी तेज रोशनी, तेज ध्वनि व प्रदूषण के अलावा शिकार जिससे इनकी अत्यधिक संख्या अपने प्रवास को पूरा नहीं कर पा रही है। जो कि एक बड़ी संख्या इस समस्या से गुजर रही है। पक्षी जो कि खेत में किट नियन्त्रक का भी कार्य करते हैं। इनकी गिरती हुई संख्या हमें किटनाशकों पर हमारी निर्भरता बढ़ा रही है। जो कि हमारे स्वास्थ्य के साथ इनके लिये भी घातक है। इस समस्या को हमें गम्भीरता से ही लेना होगा नहीं तो मनुष्यों द्वारा बनाई गई पक्तियाँ मनुष्य पर ही चरितार्थ हो जायेगी-
‘‘अब पछताए होत क्या जब चिडि़यां चुग गई खेत’’
हमें समझना होगा कि मानवीय हस्तक्षेप या प्रकृतिक आपदाओं के कारण बढ़ी-बढ़ी समाप्त हो गई है। हमने जिसे तेजी से पहाड़ों, मैदानों को कंक्रिट से जंगल में बदलने के लिए नियम है । उससे तापमान पर तेजी से वृद्धि हुई है। वायु व मृदा दोनों को ही दूषित कर दिया है। जिससे प्रकृतिक चक्र में असमानता पैदा हो गई है। बेमौसम आंधी तूफान से पक्षियों के घोंसले बरबाद हो रहे हैं और परिवार बढ़ाने में सफलता का प्रतिशत भी गिर रहा है। जैसे कि आजकल बेमौसम की बरसात व आंधी तूफान यही मौसम निडन का भी होता है । जो पक्षी अण्डे देने व सेने की तैयारी कर रहे होंगे और उनके घोंसले या अण्डे बरबाद हो गये होंगे उन्हें पुनः प्रयास करना होगा।जिस समय में दो पिढि़यां तक तैयार हो जाती थी उस समय में एक पिढ़ी भी बडी मुश्किल से बढ़ पा रही है। जो कि बढ़े दुर्भाग्य की बात है। आगे भी इस विषय पर चर्चा करते रहेंगे।
क्रमशः