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आओ जानें चिडि़यों का संसार भाग 10

आओ जानें चिडि़यों का संसार
लोकेश कुमार पाण्डे, नैनीताल -
पक्षी- भूत, वर्तमान व भविष्य
प्रकृति की श्रेष्ठ कलाकृतियों में एक है पक्षी। विभिन्न रंगों व सुरों से सुसज्जित इन सुंदर प्राणियों को देख हम सभी भाव-विभोर हो उठते हैं। आखिर कितना सूना लगता ये आकाश इन परिंदों के बगैर, और धरती कितनी ऊबाऊ, उनके कलरव के बिना।
पर पक्षी जगत की संरचना के पीछे का उद्देश्य कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। प्राणि वैज्ञानिकों के अनुसार यह उद्देश्य ऐसी उत्कृष्ट व्यवस्था को जन्म देता है, जिसके द्वारा पृथ्वी के वातावरण को संतुलित व व्यवस्थित रखा जा सके।
माना जाता है कि इस व्यवस्था की शुरुआत लगभग 140 हजार वर्ष पूर्व ‘जुरासिक काल’ में हुई थी। इस बात की पुष्टि बेगुनर नामक एक जर्मन वैज्ञानिक ने की है, और इसका आधार है एक जीवश्म, जो उनको बावेरिकया (जर्मनी) में 1861 में मिला। इस जीवाश्म को उस समय नाम दिया गया आर्कियो- आॅप्टेरिक्स जिसका अर्थ है ‘‘प्राचीन पंख’’।
यह जीवश्म एक महत्वपूर्ण कड़ी है, पक्षी व सरीसृप के बीच की। कबूतर के आकार का यह प्राणी दांत व पंजे से सरीसृप व पंख से पक्षी की तरह था। पंख होने के बावजूद इस प्रजाति के प्राणी उड़ने में सक्षम नहीं थे। परन्तु यह कहा जा सकता है कि सरीसृप जमीन को छोड़कर उड़ने के प्रयास आरम्भ कर चुके थे, और एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के बीच ‘ग्लाइडिंग’ करते थे।
यहीं से पक्षी का विकास आरम्भ हो चुका था और क्रमिक विकास के चलते पक्षी उड़ान भरने में सक्षम हो गए। फलस्वरूप गर्म रेगिस्तानों से लेकर घ्रुव प्रदेशों तक, तथा आद्र्र वर्षा वनों से लेकर घास बहुल क्षेत्रों तक पक्षी का विकास व विस्तार हुआ। और वर्तमान पक्षी जिसे वैज्ञानिकों ने (पंख-युक्त द्विपाद प्राणी’ नाम दिया) का प्रादुर्भाव हुआ। ये पक्षी एक कशेरूकी व समतापी प्राणी हैं, जिनके शरीर का तापमान 38° से 44° सेन्टीग्रेट या 110° फारेनहाईट लगभग निश्चित रहता है।
30° सेन्टीग्रेट से 50° सेन्टीग्रेट तक के तापमान में ये पक्षी बिना विचलित हुए रह सकते हैं। यही कारण है कि इनमें मूत्राशय अनुपस्थित रहता है।
पृथ्वी में लगभग 8,000 विभिन्न पक्षियों की जातियां पाई जाती हैं। पर उपजातियां मिलाकर पक्षी प्रजातियों की यह संख्या 30,000 से भी अधिक हो जाती है।
पक्षियों के इस विकास का क्रम जारी है। आज भी पक्षियों की उन नई-नई प्रजातियों का पता चल रहा है, जिनके बारे में हमें पहले पता नहीं था। विकास के दौरान पक्षियों में अग्रपाद पंख के रूप में विकसित हो गये, हड्डियां छिद्र युक्त व हल्की हो गयीं, जिससे उड़ने की प्रक्रिया आसान हो गयी थी। विकास की इस प्रक्रिया में जो इनको प्राप्त हुआ और जिसके कारण हम अक्सर ही इनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं, वह है इनके आकर्षक रंग, सुर व नृत्य, और इन गुणों से सुसज्ज्ति नर ही होते हैं। इन्हीं गुणों के आधार पर मादा जोड़े बनाने के लिए नर का चयन करती हैं और सबसे सुन्दर, सुरीला व नृत्यक नर ही अधिक जोड़े बनाने में सक्षम होता है। बस राजहंस ही एक ऐसा पक्षी है जो एक ही जीवन साथी का चयन करता है। पक्षियों में एक विशिष्ट गुण भी पाया जाता है, वह है घौंसला बनाने का, इसलिए इन्हें प्रकृति का एक श्रेष्ठ शिल्पी भी कहा जाता है। कोयल व साफ्ट टेल्ड व्हाईदा जैसे पक्षियों को छोड़कर सभी पक्षी घोंसलों का निर्माण करते हैं, जिसमें बयां का घोंसला एक उत्कृष्ट शिल्प का नमूना है। जोड़ा बनाते ही या उससे पहले भी पक्षी घोसलों का निर्माण प्रारम्भ कर लेते हैं। पक्षी एक अच्छे माता-पिता की तरह अपने पाल्यों को सुरक्षित रखते हुए भरण- पोषण करते हैं। पक्षियों में प्रजनन, भोजन व अच्छी जलवायु के लिए प्रवास यात्राएं एक प्रमुख घटना होती है। लगभग सभी पक्षी प्रवास यात्रा करते हैं। यह कुछ निश्चित समय के लिए ही होती है। इसके बाद यह अपने मूल स्थानों पर लौट आते हैं। ये यात्राएं अगस्त-सितम्बर से प्रारम्भ हो जाती हैं। कुछ की यात्रा लम्बी व कुछ की यात्राएं छोटी होती हैं। जैसे कि उत्तरी धु्रव का पक्षी लगभग 11,000 मील की यात्रा करता है, तो सबसे कम बर्फीला तीतर जो मात्र 2 किमी0 की प्रवास यात्रा करता है लेकिन कौआ को हमारे देश का अप्रवासी माना जाता है। ये यात्राएं मुख्य रूप से रात्रि के समय प्रारम्भ होती हैं ताकि सूर्य की गर्मी व शिकारियों से बचा जा सके। यह प्रवास यात्राएं इनके जीवन की सबसे संघर्षमय, साहसिक व रोमांचकारी घटनाएं होती हैं। ये इतनी लम्बी यात्राएं कैसे करते हैं, यह वैज्ञानिको में शोध का विषय है। कुछ का मानना है कि यह पृथ्वी की चुम्बकीय ऊर्जा की सहायता से यात्रा करते हैं, तो कुछ इसे धु्रवीय प्रकाश को समझने की अभूतपूर्व शक्ति मानते हैं और कुछ सूंघने की। किन्तु इस यात्रा का आनन्द छोटे से लेकर बड़े पक्षी तक सभी उठाते हैं। संसार की सबसे छोटी चिडि़या हमिंग बर्ड है, जो भौंरे सी प्रतीत होती है, तो सबसे बड़ी चिडि़या शुतुरमुर्ग है। परन्तु सबसे रोचक बात यह है कि जहां शुतुरमुर्ग 50 मील प्रति घंटे की गति से दौड़ सकता है, वहीं छोटी सी हमिंग बर्ड 50 मील प्रति घंटे की गति से उड़ सकती है। यह छोटी सी चिडि़या पीछे को भी उड़ सकती है। इतना ही नहीं प्रतिदिन 90 किमी0 तक की यात्रा कर सकती है, व किसी रस को चूसते समय लगभग इतनी स्थिर हो जाती है जितना हमारा हाथ सुई में धागा डालते हुए हो जाता है।