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आओ जानें चिडि़यों का संसार भाग 12

आओ जानें चिडि़यों का संसार
लोकेश कुमार पाण्डे, नैनीताल -
चिडि़यों की प्रकृति में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्राकृतिक घटनाओं का पूर्वानुमान इन्हें लग जाता है और यह उसके आधार पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं। प्रकृति से हमारे तालमेल में जिस गति से कमी आ रही है उसके कारण पर्यावरण परिवर्तन का हम कई स्तरों पर पता नहीं लगा पा रहे हैं। चिडि़याऐं प्रकृति के नजदीक रहती हैं और होने वाले किसी भी परिर्वतन को समय पर महसूस कर प्रतिक्रिया देती हैं। उदाहरण के लिये मौसम परिवर्तन की ही बात लेते हैं बरसात के अनुमान के लिये भड्डरी की कहावतें जग विख्यात हैं-
‘‘पवन थग्यों, तीतर लम्बे
गुरू सदैवे नेह,
कहत भड्डरी जोर से
ता दिन बरसे मेघ।’’
प्रकृति  की कल्पना चिडि़यों के बिना जितनी रंग विहीन लगती है उतनी कहावतें, कविताऐं, कहानियाँ भी प्रत्येक धर्म में पक्षियों को धर्म गन्थों में विशेष स्थान दिया गया है और उन्हें इस प्रकार से महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है कि उसे नकारा ना जा सके। पक्षियों की जीवनचर्या कई मायने में हमारे लिये परोपकार से कम नहीं होती है। कीट नियंत्रण और परागणों का विस्तार कर प्राकृतिक संतुलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। चिडि़यों की संवेदनशीलता की, पर्यावरण असंतुलन की यदि बात करें तो पर्यावरण पर होने वाले किसी भी हानिकारक बदलाव का प्रभाव हमसे पहले इन पर पड़ने लगता है। यह चेतावनी भी होती है परन्तु प्रड्डति के साथ सामंजस्य की कमी के कारण हम इसे बहुत देर से समझ पाते हैं। पानी हो, जमीन हो, या फिर आकाश इन्हें स्वच्छ और स्वस्थ रखने में ये अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभाते हैं। प्रकृति की इन स्टीक व्यवस्था के कारण हमें उन समस्याओं का पता ही नहीं लगता जो हमारे जीवन में इन चिडि़याओं के ना होने पर गम्भीर समस्या पैदा कर देती हैं। हानिकारक कीट हों, मरे सड़े गले शव, खरपतवार हो या फिर काई सभी को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। आज मानवीय जिद के कारण इनकी संख्या सीमित हो रही है और इसके दुष्प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। पक्षियों को संरक्षण प्रदान करना सरकार ही नहीं बल्कि सभी की निजि जिम्मेदारी भी है। प्रकृति  की जैव विविधता को बचाने के प्रयास हों या फिर जल संरक्षण, के सभी की भागीदारी महत्वपूर्ण है क्यूँकी  इनके ऊपर पड़े किसी भी प्रतिकूल प्रभाव का प्रभाव हम पर भी प्रतिकूल ही पड़ेगा। इसके लिये एक कहावत है ‘बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होए’। जिस बुद्धिमानी  से हम अपने लिये सुरक्षित जीवन के प्रयास करते हैं, वही प्रयास इस क्षेत्र में भी करने की आवश्यकता है। यही वह सम्पत्ति है जो आने वाली पीढि़यों का भविष्य निश्चित करेगी। अगर प्रकृति  के महत्वपूर्ण अंग इसी प्रकार से समाप्त होते रहे तो आने वाला समय बेहद कठिन होगा। जो असंतुलन पैदा होगा वह जीवन को उससे कहीं अधिक कठिन कर देगा, जितना कि हमारे कारण इन जीवों का जीवन कठिन होता जा रहा है। हमारी परम्पराओं और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग रही चिडि़यां आज हमसे दूर होती जा रही है । इस बात को हम अभी गम्भीरता के साथ महसूस नहीं कर पा रहे हैं क्योंकी  हम इन सम्पदाओं से सम्पन्न स्थानों पर बैठे हैं परन्तु बढ़ते शहरीकरण के कारण यह समस्या गम्भीर हो चुकी है और जैसे ही यह स्थिति हम तक पहुंचेगी यह एक गम्भीर और लाइलाज बीमारी बन चुकी होगी। जीवन का क्रम हो या फिर मृत्यु का हर क्रम में संतुलन के लिये एक क्रम होता है। ये सब एक कड़ी से जुड़े होते हैं और सफल संचालन के लिये इस संतुलन पर निर्भर करते हैं। यदि किसी भी श्रेणी में नुकसान होता है तो यह क्रम बाधित होता है और इसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव हम पर पड़ने लग जाते हैं। क्योंकि संतुलन की स्थिति ही जीवन को बनाये रखने के लिये आवश्यक है। यदि हम इस ओर ध्यान नहीं देते हैं तो नुकसान का क्रम तेज हो जायेगा और विनाश का भी।