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आओ जानें चिडि़यों का संसार भाग 7

लोकेश कुमार पाण्डे,

नैनीताल -
घोंसला यानि नीड़ निर्माण पक्षियों के जीवन का एक महत्तवपूर्ण भाग होता है। हर प्रजाति की अपनी एक विशेषता होती है। ऐसी ही एक विशेषता है घांेसले का निर्माण। प्रत्येक पक्षी की प्रजाति अपनी पीढ़ी को सुरक्षित स्थान में बढ़ाना चाहती है ताकि किसी प्रकार के खतरे से अण्डों व बच्चों को बचाया जा सके। अधिकतर पक्षियों में घोंसलों के निर्माण की जिम्मेदारी नर पक्षी पर होती है। किन्तु कुछ पक्षियों में दोनों मिलकर इस जिम्मेदारी को पूरा करते हैं। कुछ पक्षियों को पुराने घोंसले के इस्तेमाल में कोई गूरेज नहीं होता है, तो कुछ को पुराने घोंसले रास नहीं आते। वह नये घोंसले का निर्माण करते हैं और उसी में अण्डे देते हैं। घोंसले के निर्माण से पूर्व जगह का चयन और सुरक्षा सबसे महत्तवपूर्ण कारक होता है। कुछ पक्षी खुले के पर सामूहिक रुप से अण्डे देते हैं ताकि शिकारियों पर निगाह रखी जा सके। कुछ ऐसे परिवेश का चयन करते हैं जो अण्डो, घोंसले व बच्चों के रंग से मेल खाता हो ताकि वह उस वातावरण में घुल-मिल जाय और शिकारियों को उनका पता ना चल सके। पक्षियों की एक प्रजाति पत्तों को सिल कर घोंसले का निर्माण करती है। इसे दर्जिन या टेलर बर्ड कहते हैं। कुछ पक्षी विकास के क्रम में मनुष्य के इतने करीब पहुँच गये हैं कि वह मानवीय बस्तियों, फैक्ट्रियों व घरों में अपना घोंसला बनाते हैं जैसे गौरैय्या, कबूतर, स्वेलो, स्वीफ्ट। जो पक्षी मनुष्य की बस्तियों या मनुष्य के आस-पास घर का निर्माण करते हैं उनके घोंसले ज्यादातर मजबूत नहीं होते हैं परन्तु कुछ मजबूती का इस समय भी ध्यान देते हैं कठफठवा अपनी मजबूत चोंच से पेड़ में छेद कर घांेसले का निर्माण करता है। यह घोंसला सूखे और हरे दोनों पेड़ो में हो सकता है जबकि कुछ पक्षी पेड़ांे की गाँठ में प्राकृतिक रूप से हुए छेद में भी घांेसला बना लेते हैं। बया पक्षी का घोंसला बड़ा ही कलात्मक और मजबूत होता है। ग्रे हेडेड केनरी फ्लाइकेचर अपना घोंसला चट्टान पर काई से इस खूबसूरती से बनती है कि यह खुले में होने पर भी वातावरण से इतना घुलमिल जाता है कि आसानी से नजर नहीं आता है। धनेश पक्षी में मादा स्वयं को पेड़ के ठूठ में पूरी तरह बंद कर देती है। मादा की सिर्फ चोंच ही बाहर रहती है। भोजन के लिये बच्चों व मादा के पोषण की जिम्मेदारी नर पर होती है। कुछ पक्षी अपने घोसलों को मजबूती देने के लिये मकड़ी के जाले का उपयोग करते हैं तथा टूट-फूट हो जाने पर मकड़ी के जाले से उसकी मरम्मत करते हैं। कुछ पक्षी अपना घोंसला बनाने में अपनी आनुवंशिकी कारीगरी का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं। इनके द्वारा बनाये जाने वाले घोंसले आकार-प्रकार में तो एक जैसे होते हैं, परन्तु कुछ इतनी सफाई और कारीगरी से बनाये जाते हैं कि वह देखते ही बनते हैं घोंसले का निर्माण व गुणवत्ता समय पर भी निर्भर करती है कि निडन के लिये पक्षियों के पास कितना समय है। कुछ पक्षी सिर्फ कुछ लकड़ी के तिनकों को एकत्र कर उसमें ही अण्डे दे देते हैं और कुछ घोंसला ही नहीं बनाते। वह अपने अण्डे दूसरे पक्षी के घोंसले में ही दे देते हैं। लेकिन घोंसले के निर्माण में व जगह के चयन में जिस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है वह है सुरक्षा। घांेसला पक्षियों के जीवन का महत्तवपूर्ण भाग है और इसमें कला के साथ भावों का भी समावेश होता है जो कि अपने पाल्यों के सुरक्षित और स्वस्थ जीवन के लिये महत्तवपूर्ण है। घोंसले के निर्माण में कुछ पक्षी बड़ी सावधानी बरतते हैं कि उनके घोंसले का पता लगाना रेत में सुई ढूढने से कम नहीं होता। इसके लिये कुछ पक्षी छद्म वातावरण का भी इस्तेमाल करते हैं और इसमें इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि बच्चे जब तक बड़े ना हो जायें वह उस छदम वातावरण में घुले मिले रहें। खासकर जमीन में घोंसला बनाने वाले व छोटे पक्षी इस विधि पर ज्यादा ध्यान देते दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर पक्षियों के घोंसलों का संसार उतना ही सुन्दर है जितना कि पक्षियों का संसार।
क्रमशः