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आओ जानें चिडि़यों का संसार भाग 8

लोकेश कुमार पाण्डे,
नैनीताल -
18 सेमी0 की यह नन्हीं सी चिडि़या जिसे पहाडों में हम धनपुतई, गोताई, गोेतयाली आदि नामों से जानते है, अंग्रेजी नाम है ”बार्न स्वेलो“े और वैज्ञानिक नाम है श्ीपतनदकव तनेजपबंश्। जाड़ों की विदाई और गर्मी के आगाज के साथ जनवरी फरवरी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हंै। यह मौसम इनके प्रजनन का होता है। और दुकानों और घरों में जहाँ पर इन्हें आने जाने की सुरक्षा और स्वतंत्रता मिले, यह अपना घांेसला बड़ी तत्परता के साथ बनाती हैं, लोग भी बड़ी उत्सुकता के साथ इनका इंतजार करते हंै और उम्मीद करते हंै कि इन अबाबील के जोड़े को उनकी दुकान, घर पसंद आ जाये। अबाबील बेहद फुर्तीली चिडि़या होती है तथा प्रवास में आने के बाद यह बेहतर व सुगम स्थान के चयन में तुरंत सक्रिय हो जाती है, जिस पर इनकी आपस में गहमा गहमी भी हो जाती है। घोंसले को बनाने के दौरान पुराने घोंसले का चयन होता है, जिसकी संभावना कम होती है। ज्यादातर नये घांेसलांे का निर्माण किया जाता है। इसके लिये गीली मिट्टी में तिनकांे को डुबो कर व कीचड़ के द्वारा दीवार या किसी टेक वाले स्थान पर धीरे-धीरे नर व मादा द्वारा बनाया जाता है जोकि सूखने के पश्चात् सीमेंट की भाँति मजबूत हो जाता है। फिर इसके अन्दर मुलायम चीजों के इस्तेमाल द्वारा एक बिस्तर तैयार किया जाता है जोकि एक बेहतरीन इंस्यूटेलर का भी काम करता है क्यांेकि यह बिस्तर अण्डे सेने के दौरान ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है तथा माता पिता के बाहर जाने पर घोंसले में अण्डों के लिए उचित तापमान को बनाये रखता है। इनके घांेसले की गुणवत्ता यदि गिर जाय या फिर किसी कारण घोंसला टूट जाय तो ये तेजी से 15 से 20 दिन में पुनः घांेसले का निर्माण कर लेती हंै। इन्हें मानवीय हस्तक्षेप से किसी भी प्रकार का या कष्ट नहीं होता है। यानि ये मनुष्यों की उपस्थिति के आदि होते हंै। ऐसा लगता है कि ये मनुष्यों के बीच स्वयं को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं।
एक बार घोंसले का निर्माण पूरा होने के बाद मादा 4 से 6 अण्डे देती है। अण्डे 2 से 3 हफ्तों तक सेने के बाद चूजे निकल आते हंै, यह समय माता-पिता के लिये अत्यधिक परिश्रम का होता है। क्यांेकि बच्चों की तेजी से वृद्वि के लिये उच्च पोषण युक्त भोजन की आवश्यकता होती है और सभी बच्चों को तेजी से भोजन उपलब्ध कराना होता है। प्रकृति द्वारा इस व्यवस्था को सरल कर दिया जाता है क्यांेकि यह वक्त कई कीट-पंतगों के प्रजनन का समय होता है जोकि भोजन की उपलब्धता को सरल बना देते हंै। शिकारियों व खतरों से बचाने के लिए ये बच्चों की बीट (मल) को चांेच द्वारा उठाकर घांेसले से दूर फेंकते हंै और कई बार उसको भोजन के रूप में ग्रहण भी कर लेते हंै। क्योंकि शायद बच्चों के आमाशय में वह शक्ति नहीं होती है कि वह भोजन से सम्पूर्ण आवश्यक तत्वों को अवशोषित कर सकें। तो यह उस अधपचे भोजन से जरुरी तत्व प्राप्त कर लेते हैं। अबाबील पक्षी एक प्रवास के दौरान 2 बार तक प्रजनन कर अण्डे देते हंै। यह प्रक्रिया वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व पूर्ण करने की कोशिश की जाती है तथा वर्षा ऋतु आने के साथ ही प्रवास की समाप्ति की घोषणा व लौटने के लिये एक जगह बैठ कर मंथन प्रारम्भ हो जाता है तथा जुलाई के अंत तक यह प्रवास लगभग समाप्त हो चुका होता है और सभी नई पीढ़ी के साथ अपने अगले प्रवास स्थल की ओर निकल चुके होते हंै। धनपुतई, अबाबील,गोताई, गोतयाली नाम से प्रसि; इस पक्षी को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।