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आबाद जाफ़री, नैनीताल

तलाक, तलाक, तलाक का सुधारात्मक चांस

आबाद जाफ़री, नैनीताल

तलाक से सम्बन्धित समाचार प्रायः मुसलमानों से ही जोड़ दिये जाते हैं। आमतौर पर लोगों का ख्याल है कि मुसलमानों में तलाक का रूजहान ज्यादा पाया जाता है, हालांकि ऐसा नहीं है। केन्द्र सरकार ने लोक सभा में जानकारी देते हुए बतलाया था कि वर्ष 2014 में केरल में प्रति घन्टा तलाक का औसत पाँच से ज्यादा रहा। देश के 11 राज्यों में प्रतिदिन तलाक के 130 से अधिक मामले दर्ज किये गये। मौजूदा दौर में एक हजार शादी-शुदा जोड़ों में से 13 जोड़े तलाक ले रहे हैं। 6 वर्ष पूर्व यह आँकड़ा मात्र एक था।
शादी का बंधन टूटने से बचाने के लिए अनेक लोग और स्वयंसेवी संस्थाएँ आगे आ रही हैं। तलाक का यह मामला केवल मुसलमानों का ही नहीं है, बल्कि इसमें सभी शामिल हैं। यह चलन हिन्दुओं में निरन्तर बढ़ रहा है। इस तरह की औसत बढ़ोत्तरी यकीनन चिन्ताजनक है।
फैमिली एक्ट 1984 के अनुसार न्यायाधीश, तलाक लेने वाले जोड़ों में समझौता कराने का प्रयास करेंगे। इस प्रयास में वह सकारात्मक तरीका तलाश करेंगे।
श्री गंगा नगर फैमिली कोर्ट के जज राजेन्द्र शर्मा तलाक केस में इसी प्रणाली का प्रयोग सबसे पहले करते हैं। यही कारण है कि उनके निर्णयों की सराहना की जाती है। 8 सितम्बर 2015 को न्यायाधीश शर्मा, राधारमन तलाक मामले की सुनवाई कर रहे थे। कोर्ट में आने वाले बच्चे अपने माता-पिता ;राधा-रमनद्ध के विवाद विच्छद से दुःखी थे और वह रो रहे थे। बच्चों को रोता देख माता-पिता भी रोने लगे। उसी दिन न्यायाधीश ने तलाक के मालले कम करने की ठान ली। उन्होंने ऐसे आइडिया निकाले जो अल्ला होने वाले मियाँ-बीवियों को उनके पिछले दिनों के सुख दुःख याद दिला सकें। उन्हें 11 महीने में इस तरह के 102 जोड़ों में से 52 जोड़ों को वापस आने के बाद तलाक लेने से मना कर दिया। वह जोड़ो को उन रेस्टोरेंट या स्थानों पर भेजा करते थे जहाँ वह शादी से पहले अक्सर मिलते थे। यह एक मनो वैज्ञानिक ब्याज है ताकि इंसान अपने अतीत के खुशगवार लम्हों को याद करके सुखद एहसास को ताकतवर बना सके।
सूरत निवासी समाज सेविका गीता बेन शराफ तलाक रोकने के लिए दिलचस्प तरीका निकालती हैं। वह काउंसिलिंग के दौरान लोगों को साँप-सीढ़ी, शतरंज, कैरम जैसे इन्डोर गेम खेलने को कहती हैं। उनके इस प्रयास से तनाव कम हो जाता है। फिर इन्हीं खेलों को वह जीवन से जोड़कर मामलों को सुधारने का प्रयास करती हैं।
रायपुर में डाक्टर प्रत्यालाल 11 वर्ष से और एक रिटायर्ड प्रिंसिपल चित्रा वालिया पिछले 10 वर्षों से तलाक रोकने की समाज सेवा में प्रयासरत हैं। उनका विचार और अनुभव है कि यदि सही ढंग से काउंसिलिंग हो तो 50 प्रतिशत मामले निपटाये जा सकते हैं।
फरीदाबाद की वकील अंजू वाजपेयी ने 25 वर्षों में एक हजार रिश्तों को टूटने से बचाने में सफलता प्राप्त की है। उनका कहना है कि यह केवल मियाँ-बीबी के टूटने का मामला नहीं है बल्कि बच्चों को भी मायूसियों और महरूमियों से बचाना है। निश्चित रूप से यह वातावरण बच्चों को डिप्रेशन का शिकार बना देते हैं जबकि वह उत्तरदायी नहीं होते।
इस प्रकार की स्वयंसेवी संस्थाओं, जजों और समाजसेवियों की राय है कि तलाक के प्रयासों को सुलझाने में अध्यापकगण महत्वपूर्ण रोल निभाने की क्षमता रखते हैं इसलिए उनका योगदान भी शामिल हो तो इस सामाजिक समस्या को निपटाने में बड़ा सहारा मिलेगा।
मैं खुद भी यही मिजाज रखता हूँ और चाहता हूँ कि शिक्षकों को इस प्रकार का व्यवहारिक और जिम्मेदाराना प्रशिक्षण देकर तथा कथित नियमों में आजाद कर देना चाहिए। शिक्षक समाज ही सर्वाधिक प्रतिष्ठित और उच्चवर्गीय विभूति है वह परिवारों से सर्वाधिक जुड़ा रहता है इसलिए उसकी सेवाएं प्राप्त की जा सकती हैं। मगर प्रत्येक शिक्षक में इस प्रकार की क्षमता और प्रतिभा हो, यह भी आवश्यक है। अक्सर देखा गया है कि अपनी खुद की कुछ बुरी आदतों को लेकर कई शिक्षक स्वयं पारिवारिक समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं इसलिए हमें इस दिशा में बहुत सावधानी की जरूरत होगी।