विचार विमर्श

आरक्षणः समाज के अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचे

आरक्षणः समाज के अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचे
संदीप बिष्ट, नैनीताल-
भारतीय गणराज्य में आरक्षण की व्यवस्था अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए शुरूआत में 10 वर्षों के लिए की गई थी परन्तु कालान्तर में सरकारों ने इसे समय-समय पर बढ़ा दिया। वर्तमान दौर में भारतीय समाज में आरक्षण पाने की होड़ में सामाजिक रूप से सम्पन्न तथा प्रभावशाली लोग भी शामिल हो रहे हैं। इसका ज्वलन्त उदाहरण गुजरात से उठा पटेलों का आरक्षण आन्दोलन है या हरियाणा व पश्चिम उत्तर प्रदेश व राजस्थान में जाट हो, उत्तर प्रदेश के राजपूत हो या फिर आंध्र के कापू समुदाय के लोग हो। ऐसे दौर में देश में अगर इतने समुदाय आरक्षण की माँग करते हुए आन्दोलन शुरू कर दें तो देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो जायेगी। नये दौर में जहाँ विश्व को एक ग्लोबल गाँव की शक्ल दी जा रही है तो वैश्वीकरण तथा व्यापारिक ढाँचे में शिथिलता होना स्वाभाविक है। भारत में सरकारें निजिकरण तथा ठेकेदारी व्यवस्था को बढ़ावा दे रही हैं। ऐसे में सरकारी नौकरियों का दायरा सीमित होता जा रहा है। सरकारी विभागों में पदों की संख्या घटती जा रही है। परन्तु फिर भी कई राजनैतिक दल पूरी तरह से आरक्षण का कार्ड खेलकर समाज के एक चिन्हित वर्ग को सरकारी नौकरियों का सपना दिखाते हैं। जब भारत में पहली गैर-कांगे्रसी सरकार सन 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी तो उन्होंने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों की पहचान जो कि सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से कमजोर हों और जो सरकारी नौकरियों में आरक्षण के पात्र हों, की पहचान को मंडल आयोग का गठन किया। सन 1980 में आयोग ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की तथा इस रिपोर्ट में आरक्षण के दायरे में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27ø और आरक्षण का प्रावधान किया गया तथा अब कुल आरक्षण 49.5ø करने का सुझाव दिया गया। परन्तु तब तक मोरारजी भाई सत्ता खो चुके थे। लगभग दस वर्ष तक ये रिपोर्ट ठंडे बस्ते में रहने के बाद 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की जनता दल सरकार ने इसे लागू कर दिया। देश भर में आरक्षण विरोध आन्दोलन ने जोर पकड़ा परन्तु केन्द्र सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
तब से आरक्षण व्यवस्था इसी तरह की बनी हुई है। अब कई जातियां तथा समुदाय इस 27% के दायरे में आना चाहते हैं और कोई भी राजनैतिक दल आरक्षण की इस व्यवस्था की समीक्षा करने की बात नहीं करना चाहता है। समाज में कई लोग ऐसे भी हैं जो दूसरी तीसरी पीढ़ी में आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। परन्तु इसी समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जिसकी स्थिति आजादी के समय से जस की तस बनी हुई है और कई राजनैतिक पार्टियां इन लोगों को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा कर अपना वोट बैंक बनाये बैठे हैं। भारत में जाति व्यवस्था को खत्म करना अकल्पनीय है। ऐसे में जाति व्यवस्था पर आधारित आरक्षण को भी खत्म नहीं किया जा सकता है। परन्तु सरकारें आरक्षण को समाज की जाति व्यवस्था के उस अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचाने में नाकाम रही है  जिसका वह असली हकदार है। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों में भी आरक्षण का लाभ केवल एक दायरे में सीमित है और पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा है। जो इस व्यवस्था से परिचित नहीं हैं उनकी कोई सुनवायी नहीं है। तभी तो आज भी अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोग आर्थिक आधार पर लगभग 40 से 50% तक गरीबी रेखा से नीचे हैं और इसका कारण उच्च शिक्षा का अभाव इन वर्गाें में है तथा इसका सीधा कारण सरकारी बड़े पदों पर आरक्षण का लाभ अनुसूचित जाति, जनजाति का व्यक्ति नहीं ले पाता है।