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आसमान खुला है (प्रेम का मर्म)

दीपक बिष्ट, रानीखेत, अल्मोड़ा -
‘हर किसी के बचपन में सबसे बहुमूल्य चीज क्या होती है, क्या कभी आपने सोचा है? मैंने सोचा तो सबसे पहले विचार आया शायद खिलौने, या फिर खेलना, फिर विचार आया कि शायद तुतलाना भी हो सकता है। लेकिन फिर विचार आया कि ये सब तो जीवन का एक हिस्सा हैं या कह लो कि बचपन की जरूरते हैं। तो बहुमूल्य है क्या? थोड़ा और गहराई से विचार करने पर मुझे जो सबसे बहुमूल्य लगा वह था, हमारा गलती करना, उस पर पिताजी का डांटना, फिर हमारा रोना, उस पर माँ का दुलार करना, और फिर पिताजी द्वारा हमारी सब गलतियों को भूल कर हमें गोद में उठाना और खुले दिल से हमें एक नई उड़ान के लिए प्रोत्साहित करना’।
बात मेरे बचपन की है जब मैं बहुत छोटा था। तुतलाता था, भागता था तितलियों के पीछे और खेलने में मग्न रहता था। एक दिन हरी-हरी घास के मैदान में मैं खेल रहा था कि तभी जोर से गड़गड़ाहट की आवाज सुनाई दी। मैंने इधर-उधर देखा लेकिन कोई नहीं था। फिर मैं खेलने में मस्त हो गया। किन्तु एक बार फिर मुझे गड़गड़ाहट की आवाज सुनाई दी। फिर से मैंने इधर-उधर देखा लेकिन कोई नहीं था। इस बार मैं सोचने लगा कि यह कौन जोर-जोर से गरज रहा है? अचानक मेरी नजर ऊपर आसमान की ओर गई, तो मैंने देखा कि सूरज को बादलों ने छुपा लिया था और आसमान जोर.जोर से गरज रहा था। इसी दौरान माँ ने मुझे पुकारा कि बेटा अंदर आ जाओ बारिश होने वाली है। यह सुनते ही मैं अंदर की ओर भागा। मेरे अंदर पहुचने के कुछ देर बाद ही बारिश शुरू हो गई। मैं खिड़की के पास बैठ कर फिर से आसमान की तरफ देखने लगा। और देखते ही देखते कुछ प्रश्न मेरे मन मैं जाग उठे थे। जो प्रश्न मेरे बालमन में उठे थे वे इस प्रकार थे।
मेरा पहला प्रश्न यह था कि आसमान गरजता क्यों है?
दूसरा प्रश्न यह था कि आसमान बरसता क्यों है?
तीसरा प्रश्न यह था कि आसमान इतना विशाल क्यों है?
चैथा और अंतिम प्रश्न यह था कि क्या आसमान खुला है? या तारों और बादलों से भरा है।
इन सब प्रश्नों का जवाब ढूढ़ने का तरीका मैं खुद ही खोजने लगा। मैं घर में इधर-उधर कुछ खोजने लगा, कोना-कोना तलाशने लगा। तभी एक कोने में मुझे वह चीज मिल गई जो मेरे काम की थी। वह चीज थी छाता, पिताजी का नया छाता जिसे वे कल ही खरीद कर लाये थे। अगले दिन धूप खिली और मैंने अपने सवालों के जवाब पाने के लिए अपना प्रयोग शुरू कर दिया। मैंने छाते को खोला और उसे आसमान का नाम दिया। फिर मैंने सोचा कि आसमान में तो तारे भी होते हैं, सूरज भी होता है और चाँद भी होता है। तब मैंने छाते में ढेर सारे तारे, सूरज और चाँद जैसे छेद चाकू से बना डाले। बादलों के लिए मैंने छाते की डंडियों में रुई लगा दी। छाते को ऊपर उठा कर जब मैंने देखा तो ऐसा लग रहा था मानो आसमान को बादलों ने ढक लिया हो। लेकिन इतना भी नहीं ढका था कि मुझे सूरज, चाँद और सितारे न दिखाई दें। फिर जैसे ही में छाते को लेकर अपने कमरे से बाहर निकलाए तो पिताजी ने मुझे रोका और जोर-जोर से डांटने लगे ये क्या किया? तुमने, किसने कहा ऐसा करने को? बहुत बिगड़ गए हो तुम आजकल, नया छाता खराब कर दिया और एक चांटा मेरी गाल पर पड़ा। और मुझे अपने पहले प्रश्न का जवाब मिल गया कि ‘आसमान गरजता क्यों है?’
चांटा खा कर मैं रोते हुए बाहर मैदान की ओर चला गया और छाते को नीचे रख कर जोर-जोर से रोने लगा। तभी मुझे लगा कि मेरे आँसू छतरी रूपी आसमान के ऊपर गिर रहे हैं, और छेदों से होते हुए नीचे की ओर बह रहे हैं। इस तरह मुझे अपने दूसरे प्रश्न का जवाब मिला कि ‘आसमान बरसता क्यों है?’
फिर मैं छाते के नीचे बैठ गया और बादल रूपी रुई की ओर देखने लगा, रुई गीली हो चुकी थी। क्योंकि रुई ने मेरे आंसुओं को सोख लिया था। तभी माँ आई और मुझे गोद में उठाकर मेरे आंसुओं को पोछने लगी। और मुझे अपने तीसरे प्रश्न का जवाब भी मिल गया कि ‘आसमान इतना विशाल क्यों है?’
तभी होले-होले से हवाओं ने चलना शुरू कर दिया। हवा के चलने के साथ ही मेरा ध्यान इस बात ने अपनी ओर खींचा कि जब कभी पहले मैं छतरी खोल कर रखता था तो हवा उसे उड़ा कर अपने साथ ले जाती थी, लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ क्योंकि आज हवा मेरे द्वारा छतरी पर बनाये गए छेदों से पार हो रही थी। यह देखकर मैं तुरंत माँ की गोद से उठा और भागते हुए चिल्लाया ‘आसमान खुला है, उड़ चलो’ और तभी पिताजी ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और प्यार से पुचकारने लगे। इस तरह मुझे अपने चैथे और अंतिम प्रश्न का जवाब आखिर मिल ही गया।