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आस्था की चट्टानें और सच्चाई के प्रहार

राजशेखर पंत, नैनीताल-
कौतूहल, कुछ देख कर उसके बारे में बहुत कुछ, सब कुछ जानने की कोशिश करना संभवतः मनुष्य का जन्म-जात स्वाभाव है। हमारी शोध की प्रवृत्ति, तकनीक, वैज्ञानिक सोच इत्यादि ने हमारे चारों ओर फैली अनगिनत पहेलियों को अब एक हद तक सुलझा लिया है, पर कभी बीज का धरती पर उग कर वृक्ष बन जाना, सूरज का निकलना और रात के समय अँधेरे का छा जाना, मौसम का कभी खुश-मिजाज, कभी ठण्डा हो जाना, बादलों का घिर आना और फिर बरसात का होना - ऐसे ही न जाने कितने सवाल रहे होंगे जिन्होंने हमारे किसी पुरखे को परेशान किया होगा। वैज्ञानिक सोच और शोध के अभाव में निश्चित ही उसकी कल्पना शक्ति कुलबुलाई होगी। प्राची के क्षितिज पर फैली अरुणिमा ने याद दिलाई होगी उसे किसी स्त्री के लहराते हुए आँचल की और तब भोर के सिंदूरी आसमान के लिए )ग्वेद में किसीने ऊषा जैसा सुन्दर नाम गढ़ा होगा। गरजते हुए बादलों की पृष्ठभूमि में किसी वज्र या आसमान से टप-टप टपकती वर्षा या सुबह की ओस को सहज ही करुणा या आंसू से जोड़ना स्वाभाविक रहा होगा तब वेदों में उल्लेखित इन्द्र, मरुत, वरुण या इशान जैसी शक्तियों का जन्म ऐसी ही निश्छल कल्पनाओं से हुआ होगा। हाल ही में अपने बेटे-बेटी और पत्नी के साथ लाँग ड्राइव पर नैनीताल को मध्य हिमालयी क्षेत्र में स्थित देवीधुरा-लोहाघाट नामक रोड साइड स्टेशंस से जोड़ने वाली सड़क पर बहुत दूर तक निकल गया था। मुझे अक्सर महसूस होता है कि बच्चों को पहाड़ की निस्तब्धता, उसके रहस्यों से भरे चिरंतन मौन, उसके दातृत्व और उसके आँचल में पल-बढ़ रही सभ्यता और संस्कृति की सरलता से परिचित कराना उनके व्यक्तित्व में मानवीय मूल्यों और अच्छे संस्कारों को सुनिश्चित करने का एक बेहतर जरिया है। लोहाघाट से लौटते हुए हम देवीधुरा के प्राचीन मंदिर में रुकते हैं। मध्य हिमालय के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है यह -जागृत अदि-शक्ति की पीठ, जिसे कभी कीलित नहीं किया जा सका था। बहुत बार आ चुका हूँ मैं यहाँ, तब भी जब मंदिर के नाम पर सिर्फ एक पुराना सा पहाड़ी घर हुआ करता था, जिसकी दूसरी मंजिल पर देवी की कथित रूप से रहस्यमयी समझी जाने वाली मूर्ति एक पुराने से लोहे के बक्से में बंद कर यहाँ रखी हुई थी। यह मंदिर अब बहुत विशाल, विट्रीफाइड टाइल्स और मार्बल वाला बन चुका है। पर वह रहस्यमयी बक्सा आज भी वैसे ही पूजा जाता है। इस मूर्ति के दर्शन करना वर्जित है। इसे स्नान भी मंदिर का पुजारी आँखों में पट्टी बांध कर कराता है। खैर...। इस मंदिर का विस्तृत परिसर बड़ी-बड़ी चट्टानों से घिरा हुआ है। आश्चर्यजनक रूप से इतनी बड़ी चट्टानें आस-पास के क्षेत्र में दिखाई नहीं देतीं। स्थानीय लोक-संस्ड्डति में इन चट्टानों की विशेष स्थिति, इनसे बने आकारों, समय के लम्बे अन्तराल के चलते इन विशाल चट्टानों पर विभिन्न कारणों से उभरी आड्डति-विड्डतियों के चारों ओर मिथकों का एक भरा-पूरा संसार उग आया है अब। मंदिर में हमारे द्वारा चढ़ाये गए नारियल की बलि देने, और बड़ी-बड़ी आड़ी-तिरछी चट्टानों को निर्मिमेष निहार रहे बच्चों की आँखों के कौतूहल को पढ़ कर मंदिर में कार्यरत एक युवा, शायद पुजारी का सहायक है वह -एक स्वघोषित गाइड के रूप हमारे साथ आ जाता है। बलिवेदी मंदिर के पृष्ठ भाग में दो डरावनी सी चट्टानों और देवदार के कुछ पुराने, घने से पेड़ों की तलहटी पर बनी हुई है। नारियल की बलि की दक्षिणा हमारे गाइड का स्थापित और चिर-स्वीकार्य देय है। वह हमें आस-पास युग-युगांतर से बिखरी हुई चट्टानों के इर्द-गिर्द बुनी गयी रहस्यमय कथाओं से परिचित करना चाहता है। बच्चे उत्साहित हैं। हिमालयी क्षेत्र के पुरातत्व में अपने स्वाभाविक लगाव के चलते मैंने इन सबके बारे में थोडा बहुत पढ़ा है। मैं उस उत्साही सीधे-सरल युवा की अपेक्षाओं को समझते हुए चुपचाप उसके पीछे चल देता हूँ। मंदिर के सीमान्त क्षेत्र में एक विशालकाय चट्टान के ऊपर खड़े हैं हम। यह चट्टान बीचों-बीच से फटी हुई है, मानो किसी तीक्ष्ण हथियार से काट दिया गया हो इसे। चट्टान की ऊपरी सतह पर चैपड़ की आड्डति का एक अनगढ़ चतुर्भुज बना हुआ है। करीने से तराशे गए सामान गहराई वाले गड्ढों की एक श्रृंखला भी उकेरी गयी है इस चट्टान पर। हमारा युवा गाइड बलशाली पांडव भीम के वनवास के दौरान इस क्षेत्र में आने और क्रोधित होने पर अपने शक्तिशाली प्रहार से इस चट्टान को दो हिस्सों में विभक्त करने की कहानी सुना रहा है। अपने आस-पास के परिवेश में उपलब्ध असामान्य रूप से विशाल और भारी या बेडोल सी किसी वास्तु को अतिमानवीय शक्तियों के कथित स्वामी भीम से जोड़ना कितना आसन है।
मुझे उन्नीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक में ब्रिटिश पुराविद हेनवुड द्वारा इस क्षेत्र पर किये गए व्यापक शोध का ध्यान आता है। उसने इस स्थान को किसी प्रागेतिहासिक कबीले के शवगाह के रूप में पहचाना था। यहाँ बिखरी विशालकाय चट्टानों, जिन्हें वह मोनोलिथिक ग्रेनाइट कहता है, के पीछे एक निश्चित योजना देखी थी उसने। पत्थरों पर सामान आकार के गड्ढों को कपमार्क का नाम देकर उसने इनकी और चैपड़ जैसी आकृतियों की पहचान क्लानटोटम के रूप में की थी। ग्रामीणों द्वारा कुछ दशक पहले मंदिर परिसर में की गयी खुदाई में, जिसे बाद में प्रशासन और शायद पुरातत्व विभाग द्वारा रूकवा दिया गया था, समय की परतों में दबे-ढके कुछ रहस्य उजागर भी हुए थे। पर फिर यह सबकुछ भुला दिया गया। सहस्त्राब्दियों पहले दफन हुए इंसानों और जमीदोज हुई संस्कृति को बिसरा देना यूँ भी बहुत स्वाभाविक और आसन होता है। मैं यह सबकुछ बच्चों के साथ साझा करना चाहता हूँ। पर उनका कौतूहल, वह जिज्ञासा जिसके चलते वह अपनी आँखें फैलाये हमारे स्वेच्छा से बने गाइड की बातें सुन रहे हैं, मुझे रोक देती है। किसी मिथ, कल्पना या विश्वास को कुरेद कर सच्चाई को जानना क्या इतने भी जरूरी है? क्या होगा तब उस जुगुप्सा, उस कौतूहल का जो मैं इन बच्चों की आँखों में देख रहा हूँ? लोहे के एक बक्से में बंद कथित रूप से रहस्यमयी मूर्तिऋ इन पत्थरों पर बने निशान, अधर में लटकती चट्टानों पर बिंदु विशेष में लगने वाला गुरत्वाकर्षण बल जिसकी वजह से ये टिकी हुई हैं -इन सब की सच्चाई को यदि परत दर परत उधेड़ दिया जाये तो कितना नीरस हो जायेगा यह स्थान। इस परिसर में निर्बाध रूप से व्याप्त आस्था, देवदार के पुराने पेड़ों के साये में बनी बलिवेदी के आस-पास पसरी एक अनबूझी सी प्रतीति, इन चट्टानों से जुड़े मिथक...। क्या सब कुछ इतना निरर्थक, इतना बकवास है की इसके पार झांकना जरूरी है? अनुभूति को, विश्वास को, आस्था को ठन्डे ज्ञान और शोध के वजनी हाथों से हर हमेशा, हर किसी के लिया कुचला जाना उचित होगा क्या? चाँद से यदि उसका ‘मामा’ वाला आभामंडल छीन लिया जाये, उसमे छुपी चरखा कातती बुढि़या या लम्बे कानों वाले खरगोश को धकिया कर भगा दिया जाये तो एक ठण्डा उपग्रह भर ही तो बचेगा, कितना सूना हो जायेगा बचपन बगैर चंदामामा के। ज्ञान-विज्ञान सच्चाई निश्चित ही जरूरी है। इसके बगैर तो हम ‘श्रेष्ठतम’ कहलाने का दावा ही खो बैठेंगे। पर थोड़ी सी ही सही, कहीं तो जगह हो इंसानी जिन्दगी में इन कल्पनाओं की, इन मिथकों विश्वास और आस्थाओं की। जो जिन्दगी को जन्म और मृत्यु के बीच खींची गयी एक सीधी-सपाट रेखा भर नहीं रहने देते।