दिशा तथा दशा

उत्तराखण्ड-खण्ड खण्ड ही क्या तेरा भविष्य?

उत्तराखण्ड-खण्ड खण्ड ही क्या तेरा भविष्य?
9 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आये छोटे से राज्य उत्तराखण्ड के राजनैतिक भविष्य पर हमेशा से मंडरा रहे काले बादलों ने इस राज्य का भविष्य अंधकारमय प्रदर्शित करना शुरू कर दिया है। राज्य गठन की मूलधारणा से विपरीत राज्य के समस्त राजनैतिक दलों के आचरणों ने जनता को ठगा सा महसूस करा दिया है। अधिकतर हर सरकार के कार्यकाल को विधायकों द्वारा अपने निहित स्वार्थों के कारण अस्थिर कर राज्य के विकास के पहियों को विराम लगा देने से जनता यह महसूस करने लगी है कि क्या इसीलिए इन माननीयों को चुन कर ‘अपनी सरकार’ बनाने भेजा था। इस पूरी राजनैतिक उठापठक को देखें तो लगता है जैसे उत्तराखण्ड की सरकारों पर कोई ‘काल सर्प योग’ का साया है। पन्द्रह सालों के शासन के इतिहास पर नजर दौड़ायें तो 2000 में नित्यानन्द स्वामी की सरकार को पहले दिन से ही राजनैतिक अस्थिरता ने घेर लिया था, जो बमुश्किल 11 महीने बाद ही राजनैतिक महत्वकांक्षा की भेंट चढ़ गयी। राज्य के पहले विधान सभा चुनाव वर्ष 2002 में जनता ने भी इसी गुटबाजी को दृष्टिगत रखते हुए कांगे्रस को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी। वर्ष 2002 के चुनावों में कांगे्रस को जीत दिलाने का श्रेय हरीश रावत को गया लेकिन सूबे की कमान वरिष्ठ कांगे्रसी नारायण दत्त तिवारी को सौंपा हाईकमान ने विरोध की चिंगारी को हवा दे दी। राजनैतिक अस्थिरता की यह हवा फिर आगे कभी नहीं रूकी। नारायण दत्त तिवारी ने तो अपनी नैया जैसा तैसे पार लगा ली। लेकिन उनके बाद आये किसी भी मुख्यमंत्री में इतनी राजनैतिक कूटनीति व राजनैतिक आपदा प्रबंधन की कार्यकुशलता व महारत हासिल नहीं थी और न है कि वह इस राजनैतिक तूफान को रोक सके-
बोया पेड़ बबूल का, तो फूल कहाँ से होय।।
यह उक्ति वास्तव में उत्तराखण्ड के लिए सटीक बैठती है।
राज्य गठन की मांग करने वाला राज्य का सबसे बड़ा दल उत्तराखण्ड क्रांति दल आज अपने स्वयं के राजनैतिक भविष्य को ढंूढने में लगा है। भाजपा के बीते दो शासनकाल में राज्य ने अस्थिरता व गुटबाजी के बेहतरीन नमूने देखे। विकास की गाथा, अस्थिरता की कहानी व गाने सुनाने लगी। कांगे्रस के दो शासन कालों में 3 मुख्यमंत्री पद शोभित करने का गौरव ले चुके हैं पर फिर भी विकास के पैमाने पर राज्य वहीं का वहीं।
विकास हुआ है तो सिर्फ इस तरह से दल बदल व स्वयं स्थार्थ सिद्धि  करने वाले नेताओं का। लेकिन शायद लगता है उत्तराखण्ड की जनता भी इन सब बातों को जानते समझते हुए भी अनजान बनने की कोशिश में लगी रहती है। अगर समझती तो यह नौटंकी देखकर चुप नहीं बैठती। शायद वास्तव में उत्तराखण्ड की किस्मत में खण्ड-खण्ड ही है।