युवा कलम

उपेक्षित है बहु उपयोगी रामबांस

उपेक्षित है बहु उपयोगी रामबांस वनस्पति प्रजाति सरकारी प्रयास नहीं होने से विलुप्त होती जा रही वनस्पति
कमल बिष्ट, नैनीताल -

कभी पहाड़ों में रस्सी बनाने, खेती में कीट नाशक दवा तथा भूस्खलन रोकने के लिए रोपण की जाने वाली वनस्पति रामबांस उपेक्षा का शिकार है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद मुख्य सचिव डा. आर एस टोलिया ने इसके प्रसार के प्रयास जरूर किए लेकिन जो बाद में फाइलों में कैद होकर रह गए।
रामबांस का वैज्ञानिक नाम एगेब है। मरू भूमि में भी पैदा होने वाले रामबांस का प्रयोग दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी किया जाता है। लेकिन उत्तराखण्ड में यह उपेक्षा का शिकार है। इसकी चैड़ी हरी कांटेदार पत्तियां सदाबहार हरी रहती हैं। पत्तियां रेशेदार होती हैं। जिससे रस्सी का निर्माण किया जाता है। इसके अलावा इसके फाइबर से ग्रामीण अन्य घरेलू वस्तुओं का भी निर्माण करते थे लेकिन अब रामबांस का उपयोग सीमित हो गया है। एक हजार मीटर से आठ हजार मीटर की ऊँचाई के मरूस्थलीय भू भाग में पैदा होने वाले रामबांस का उपयोग ग्रामीण खेतों की बाड़ के रूप में भी करते हैं। चूँकि इसकी पत्तियों को जानवर नुकसान नहीं पहुँचाते और कांटेदार होने के कारण जानवर कृषि भूमि पर बाड़ लगे होने के कारण प्रवेश नहीं कर पाते। इस वनस्पति की सबसे बड़ी खूबी भूस्खलन रोकना है। भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में इसका प्रयोग सफल पाया गया। उत्तराखण्ड राज्य के मुख्य सचिव रहे डा. आर एस टोलिया के कार्यकाल में रामबांस की खेती पर जोर दिया गया लेकिन यह कुछ समय में धूल फांकने लगी। आज उत्तराखण्ड वन वर्धनिक की उत्तराखण्ड की 12 नर्सरियों में इसकी पौध तैयार की जा रही है। वन वर्धनिक कुबेर सिंह बिष्ट का कहना है कि रामबांस का प्रयोग भूस्खलन रोकने के लिए सफल साधन है। तैयार पौधों का उपयोग भू-क्षरण रोकने में किया जा रहा है। इधर वनस्पति विज्ञान विभाग, डीएसबी परिसर के प्रो0 ललित तिवारी का कहना है कि इसका व्यवसायिक उपयोग किया जा सकता है। लेकिन यह ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया है। इसका उपयोग भूस्खलन प्रभावित बलियानाला में किया गया था, जो सफल रहा।