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एकात्मक मानवावाद के प्रणेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय

एकात्मक मानवावाद के प्रणेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय
आबाद जाफ़री, नैनीताल
भारत भूमि पर कभी-कभी ऐसे महान पुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होंने समाज में युगान्तकारी परिवर्तन लाने का काम किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ऐसे लोगों ने अपनी चमत्कारिक चिन्तन क्षमता तथा प्रबल इच्छा शक्ति से अपने समय की धारा को नई दिशा प्रदान की। विलक्षण प्रतिभा के धनी, एकात्म मानववाद के जनक, युगपुरुष पंडित दीन दयाल उपाध्याय उनमें से एक थे। भारत ने मनुष्य को मात्र पदार्थ के रूप में कभी नहीं जाना। सम्पूर्ण मनुष्य एक जीवन्त चेतना है। इसीलिए प्राचीन भारतीय राजनीति का दायरा भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा। उत्कर्ष की मानवीय चाह से मुक्त रहते हुए समूचे विश्व का कल्याण भारतीय चिन्तन धारा का लक्ष्य रहा। सहस्त्रों वर्ष पुरानी भारत की इसी शाश्वत परम्परा को आधुनिक राजनीति के क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने का काम जिस महानायक ने किया, अक्षरसः अनिकेत उस तत्वदर्शी महामानव का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय था।
पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 ई. को नगला (जिला मथुरा) में हुआ था। उनके पिता पंडित भगवती प्रसाद उपाध्याय थे।
बालक सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) की भाँति जीवन-मृत्यु के रहस्य को जानने और आत्मबोध पैदा करने का मार्ग ढूँढ कर भौतिक सुख और ऐश्वर्य सारहीन समझना सरल नहीं है। बालक दीन दयाल ने भी अपनों की ही मृत्यु को अत्यंत निकट से देखते हुए-‘आत्मबोध’ के उस चरम बिन्दु का साक्षात्कार किया था जिनके लिए तत्वान्वेशी ऋषि आजीवन वनों और पर्वत कन्दराओं में भटकते रहते हैं। तीन वर्ष के अबोध बालक ने पिता पंडित भगवती प्रसाद उपाध्याय का निधन देखा। पितृहीन बालक को उसकी माँ उस दुःख से उबार पाती कि वे भी चल बसी। नाना ने उनका पालन-पोषण प्रारम्भ किया किन्तु दो वर्ष के पश्चात् वे भी स्वर्ग सिधार गये। मामा ने यह भार सम्भाला ही था कि वे भी चल बसे। फिर छोटा भाई गम्भीर रूप से बीमार हुआ और वह भी नहीं बच सका। नानी भी साथ छोड़ गयी। इस तरह उन्होंने काल के क्रूर चक्र को बार-बार देखा समझा। और जिसने काल का तत्व और दर्शन समझ लिया वह ‘अपराजेय’ हो ही जाता है। इन विपरीत परिस्थितियों में भी प्रतिभाशाली छात्र दीनदयाल जी ने जूनियर हाईस्कूल, इन्टरमीडिएट, बी.ए., एम.ए. की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण की। पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने भारत में अपनी लेखनी का सहारा लेकर अपनी विचारधारा और नीतियों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए भारतीय संस्कृति के गौरव को उजागर करते हुए ‘चन्द्रगुप्त’ नामक पुस्तक लिखी। वर्ष 1947 ई. में उन्होंने ‘राष्ट्र धर्म’ प्रकाशन की स्थापना की और राष्ट्र धर्म मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया।
कश्मीर को भारत से अलग करने के षडयन्त्र के विरूद्ध ‘भारतीय जनसंघ’ के अध्यक्ष डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में आयोजित सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हाथों में रहा। उपाध्याय जी की अद्भुत संगठन क्षमता की प्रशंसा करते हुए डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था, ‘‘दीन दयाल जी जैसे दो कार्यकत्र्ता मिल जायें तो एक वर्ष में सारे देश का नक्शा बदल सकता हूँ।’’ अपनी विदेश यात्राओं के दौरान उन्होंने देश के बाहर भी राष्ट्रवादी भारतीय मित्रों के बीच ‘लन्दन जनसंघ फोरम’ की स्थापना की थी। दिसम्बर 1967 ई. में कालीकट में हुए अखिल भारतीय अधिवेशन में वे पार्टी के अध्यक्ष बने। पंडित जी के इस अध्यक्षीय भाषण में कृषि, शिक्षा, भाषानीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, समान नागरिक सुरक्षा और कश्मीर जैसे विषयों का विचारोत्तेजक उद्बोधन पूरे देश में गम्भीर चर्चा का विषय रहा। क्रमाश