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एबट माउंट-हाशिये पर ठहरा एक कालखण्ड

एबट माउंट-हाशिये पर ठहरा एक कालखण्ड
राजशेखर पंत -
वर्षों पूर्व आया था लोेहाघाट, शायद 90 के दशक में। तब गीता के साथ यहाँ आने की योजना बनायी थी, पर ऐन वक्त पर उसके अचानक बीमार हो जाने के कारण अकेले ही आना पड़ा था। बालेश्वर का प्राचीन मंदिर ;19वीं शताब्दी के शुरूवाती दौर में 1815 के अल्मोड़ा युद्ध  के बाद, यहाँ लोहाघाट में बना अंग्रेजों का पहला कब्रिस्तान ;स्वामी विवेकानन्द से जुड़ा मायावती आश्रम- बहुत कुछ था जिसे देखने और महसूस करने की उत्कंठा 19वीं शताब्दी में कुमायूँ में तैनात किसी अनाम गोरे सिपाही की किताब ‘अल्मोड़ियाना’ और ब्रिटिश कुमायूँ में नौकरशाह रहे जी. आर. काला के संस्मरण ‘मेमोयर्स आव राज’ पढ़ कर और तीव्र हो गयी थी। पर वह यात्रा बालेश्वर के खण्डहरों, लोहाघाट के पुराने कब्रिस्तान और मायावती आश्रम में विवेकानन्द के ओजपूर्ण शब्दों और सिस्टर निवेदिता के साथ उनके द्वारा कभी इस हिमालयी बियाबान में छोड़े गये पदचिह्नों को तलाशने में ही सिमट गयी थी। लोहाघाट से पांच-छह कि.मी. दूर एक पहाड़ की चोटी पर कभी झांसी के एक गोरे जमींदार जान हैराल्ड एबट द्वारा बसायी गयी बस्ती, एबट माउंट कहते हैं जिसे, को सिर्फ छू भर पाया था उस बार।
बीस वर्ष के दीर्घ अन्तराल के बाद आज फिर खड़ा हूँ नैनीताल से लगभग 160 कि.मी. दूर एबट माउंट की चोटी पर स्थित उस बड़े से फील्ड पर जो कभी अंग्रेज साहबों का क्रिकेट ग्राउंड हुआ करता था। मई का महिना होने के बावजूद लोहाघाट से 6 कि.मी. दूर स्थित एबट माउंट में आज मौसम खराब है। सुबह से ही वर्षा हो रही है औैर घने कोहरे की परत ने सब कुछ अपने अंदर समेट लिया है। ऊँची मध्य हिमालयी पहाड़ियों पर मौसम की इसी अनिश्चितता के चलते एटकिन्सन ने कभी कहा था, ‘‘यहाँ के मौसम का मिजाज किसी संवेदनशील महिला के मूड की तरह है, यह कब बदल जाये कोई नहीं कह सकता।’’
अतीत को सभी उपलब्ध साधनों के माध्यम से तलाशते हुए उसे वर्तमान संदर्भों से जोड़ने की मेरी पुरानी आदत अभी गयी नहीं है। अप्रेलिया के सफेद फूलों से लदी हैज से घिरे बडे़़ से मैदान पर रिमझिम बरसात अभी जारी है और पहाड़ों की तलहटी से उठते हुए कोहरे ने देवदार के वृक्षों के बीच धीरे-धीरे सरकते हुए सारे लैंडस्केप को उनींदा सा बना दिया है। देवदार के एक बड़े से वृक्ष के नीचे खड़ा हुआ मैं अनायास ही इस क्षेत्र के अतीत से जुड़ने लगता हूँ।
पिछली शताब्दि के शुरुवाती दौर में आया था एबट यहाँ, झाँसी से, और फिर यहीं का हो कर रह गया था। जल्द ही यहां यूरोपियन्स और एंग्लो इन्डियन्स की एक पूरी बस्ती ही बस गयी थी। पहाड़ी ढलानों पर खूबसूरत बंगले और सेब के बगीचे धीरे धीरे सर उठाने लगे थे। काला के मैमोयर्स में यहाँ की विक्टोरियन जिन्दगी के बहुत से छुटपुट शब्द चित्र मौजूद हैं। अप्रैल के शुरुवाती हफ्तों से ले कर नवंबर तक खासी चहल पहल रहती थी यहाँ। मि. एबट अपना जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाया करते थे। फ्लावर, वैजिटेबल और फ्रूट शो, फिशिंग, जंगल वाक और ब्वाय मीट्स ए गर्ल किस्म के रोमांस यहाँ की जिन्दगी का अभिन्न हिस्सा थे। वक्त के हाशिये पर यहाँ थोड़ी देर के लिए ठहरी हुई जिन्दगी निश्चित ही एक उत्सव रही होगी। पर बहुत जल्द ही इतिहास बन गयी थी एबट माउंट की यह कालोनी। स्कूली शिक्षा के अभाव तथा जिन्दगी की रोजमर्रा की जरुरतों के लिए 80 कि.मी. की दूरी पर स्थित टनकपुर बाजार पर निर्भरता ने यहाँ के खुशनुमा बाशिन्दों को जल्द ही जिन्दगी की तल्खियों से रूबरू करा दिया था और फिर सेब के बगीचों से भी तो अब इतनी आमदनी नहीं हो रही थी कि यहाँ रुका जा सके। यहाँ बसे यूरोपियन परिवार धीरे धीरे आस्ट्रेलिया का रुख करने लगे, जहाँ संभावनाऐं अधिक थीं।
कोहरा अब और अधिक घना हो चुका है। चारों ओर फैली निस्तब्घता में बस देवदार के नुकीले पत्तों से टप टप कर गिरती हुई बंूदों का संगीत गूंज रहा है। अतीत के शब्द चित्रों में भटकते हुए मुझे लगता है जैसे मैं स्वयं उस पुरानी दुनियां का हिस्सा बन गया हूँ। तभी सामने कोहरे के घने सैलाब से एक आड्डति उभरती है- काली पैराट्रूपर्स जैकेट पहने एक लंबी चैड़ी उम्रदार काया, साथ में एक काला ऊँंचा सा तिब्बतियन मैस्टिफ कुत्ता, अपने घने बालों पर पड़ी पानी की बूंदों को बार बार छिटकाता हुआ। मेरे सामने आ कर वह चेहरा एक ग्लास चाय की पेशकश करता है। कल्याण सिंह अधिकारी नाम है इनका। पास ही के एक पुराने गाँव रोंगड़ के निवासी हैं। कल्याण सिंह फौज से रिटायर्ड सैनिक हैं। फिलहाल वह एबट माउंट की चैकीदारी के प्रति समर्पित हैं। कोई भी सरकारी विभाग या संस्था उन्हें इस कार्य के लिए कुछ भी भुगतान नहीं करती। कल्याण सिंह भावनात्मक रूप से इस क्षेत्र से जुड़े हैं और इसकी रक्षा करना, उन्हें लगता है, उनका कर्तव्य है। वे मुझे एबट की कब्र तक ले जाते हैं, एबट माउंट से जुडंे़ अपने सैकड़ों रंगीन सपनों के साथ यहीं दफन हैं वह। पास ही उसके प्रिय कुत्ते की कब्र भी है। उपेक्षित पड़ी कब्रगाह के ठीक ऊपर एबट माउंट की पुरानी चर्च है। रस्किन बाँड की किसी भुतहा कहानी के पुराने गिरजाघर की तरह यह चर्च भी उजाड़ है। खिड़कियों पर लगे धुंधले कांचों से झांकने के प्रयास में मुझे कुछ आडे़ तिरछे पड़े बैंच और लेक्र्टन दिखायी देते हैं। किसी आखिरी संडे मास में पढ़ी बाइबिल की पंक्तियाँ यहाँ की निस्तब्धता में अब भी गूंज रही हैं। कोहरा घना होता चला जा रहा है। अजीब सा लग रहा है सब कुछ। कल्याण सिंह मुझे कोहरे में लिपटी एबट की पुरानी कोठी के पास ले जाते हैं। कुछ उन यूरोपियन्स के उजाड़ बंगले भी हैं यहाँ, जिन्होंने कभी मिशनरी के रूप में रह कर धर्मान्तरण का कार्य भी किया था।
एबट माउंट के अधिकांश बंगलों को अब बडे़ व्यवसाइयों और कुछ नेताओं ने खरीद लिया है। कुछ बंगले रिजाटर््स में भी तब्दील हो चुके हैं। कहीं कुछ ऐसा भी है जिसे स्थानीय निवासी संदेह की दृष्टि से देखते हैं। कल्याण सिंह मुझे बड़े से मैदान के कोने में बन रही लकड़ी की कुछ हट्स के पास ले जाते हैं जिनके लिए लकड़ी पता नहीं क्यों विदेशों से मंगायी जा रही है। लोग बताते हैं कि इसमें लाखों का वारा न्यारा हो रहा है। हट्स के पास ही बने स्नो व्यू प्वाइंट पर, जहां से मैकतोली, नन्दाखाट, नन्दादेवी इत्यादि हिमालयी शिखरों का विहंगम दृश्य खुले हुए मौसम में साफ दिखायी देता है, एक शैड बनाया गया है। सरकारी खर्चे पर लगभग 2 लाख रु. की लागत से बना यह विचित्र शैड न वर्षा रोक पाता है न धूप। यह कहते हुए कि पहाड़ों पर रहने की तमीज और उनसे प्यार सिर्फ अंग्रेजों को ही था, कल्याण सिंह मुझे यह बताना नहीं भूलते कि इस शैड के लिए किसी अन्तर्राष्ट्रीय फंड से आये पैसे ने गाँव के सभापति से लेकर इन्जीनियर तक बहुतों को मालामाल कर दिया है।
एबट माउंट की ऊँचाई से उतरते हुए मैं पहाड़ी ढलान पर बने बंगलों, जिनका इस्तेमाल अब रिर्जाट्स की तरह हो रहा है, पर रुक कर अतीत के कुहासे में दबी ढकी यूरोपियन कालोनी के बारे में कुछ और जानकारी जुटाने की कोशिश करता हूँ। रिजार्टस में मौजूद स्टाफ मुझे यहाँ मिलने वाली सुविधाओं, ड्रिंक्स और टैरिफ के अलावा कुछ नहीं बता पाता। आश्चर्य होता है मुझे, इस सुंदर जगह के इतने खूबसूरत अतीत से भला कोई कैसे तटस्थ रह सकता है?
अपने पर्स से कुछ नोट निकाल कर उन्हें जबरदस्ती कल्याण सिंह के हाथों में ठूंसते हुए मैं अपनी कार स्टार्ट करता हूँ। कार के रियर व्यू मिरर में अपने झबरे कुत्ते के साथ खड़ा उसका प्रतिबिंब धुंधला रहा है...धीरे धीरे कुहासे में खोता हुआ। कुछ पुरानी किताबों के पीले पड़ चुके पन्नों तक सिमटा एबट माउंट का अतीत... कौन जाने, इस कल्याण सिंह के साथ कब तक और जिन्दा रहेगा।