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एली स्टेनली जोन्स एवं दिव्य आश्रयस्थल

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
एली स्टेनली जोन्स (1884 - 1973) एक मेथोडिस्ट मिशनरी एवं धर्मशास्त्री थे, जिन्हें मुख्यतः 20वीं सदी के भारत में शिक्षित वर्ग को दिए अपने अंतर-धार्मिक व्याख्यान हेतु याद किया जाता है। स्टेनली जोन्स फाउंडेशन द्वारा वर्णित किया गया कि ”ऐसा कोई भी दिन नहीं गया जब उनके लेखन, उपदेश और पुस्तकों ने दुनिया भर के लाखों लोगों के जीवन को नहीं बदला।“ विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ नागरिक भुवन लाल साह दृढ़ता से कहते हैं ”सन 1925 में प्रकाशित उनकी पहली पुस्तक द क्राइस्ट आॅफ इंडियन रोड शीघ्र एक आदर्श लेखन बन गई और द्वितीय विश्व युद्ध से ठीक पहले के दशक में प्रसिद्ध दुनिया भर में आर्थिक मंदी के दौरान दो अन्य पुस्तकें अबुन्देन्ट लिविंग एवं विकटरियस लिविंग की एक लाख से अधिक प्रतियां (1929-39) बिक गयी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस समय लोग अपने जीवन में बदलाव हेतु सत्य और उत्तर की खोज में लगे थे।“ उनकी 29 पुस्तकें निरंतर चलने वाली कलम से प्रवाहित होती रहीं जिनका तत्पश्चात विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद किया गया।
एली स्टेनली जोन्स का जन्म 3 जनवरी 1884 के दिन मैरीलैंड के क्लार्क्सविला, संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ था। मूलतः जोन्स एक वकील बनना चाहते थे लेकिन उनके भाग्य में ईसाई धर्म के प्रचार का कार्य ही लिखा था। विल्मोर में आसबुर्य काॅलेज, केंटकी से स्नातक करने के बाद वह सन 1907 में भारत आ गए। उन्होंने अपना पहला कार्य लखनऊ में लाल बाग मेथोडिस्ट चर्च से आरम्भ किया। सन 1911 में उन्होंने एक शैक्षिक मिशनरी, माबेल लाॅसिंग से शादी कर ली। तत्पश्चात उन दोनों को सीतापुर में कार्यभार हेतु भेज दिया गया, जहाँ लाॅसिंग क्रिस्चियन ब्वायज स्कूल की प्राचार्य या प्रबंधक के रूप में गयीं तथा जोंस को जिला अधीक्षक के रूप में भेजा गया। स्टेनली एक जिला मिशनरी के रूप में अधीर थे। जिसके चलते उन्होंने पूरे भारत से ईसाई प्रचार के अनुरोधों को स्वीकार करना शुरू कर दिया। इस बीच उनके बच्चे ईयूनिस का जन्म सीतापुर में हुआ। एक ईसाई प्रचारक के रूप में जोन्स की ख्याति बढ़ने लग गयी और जल्द ही वह भारत में सबसे बड़े उपदेशक बन गए।
वह ईसाई आश्रम आंदोलन के संस्थापक भी थे। सन 1930 में उन्होंने कुमाऊं के सात ताल में ईसाई आश्रम की स्थापना की जो निश्चित तौर पर भारत में अपने जैसा पहला वेंचर था और समुद्र तल से 1488 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह 161.88 हेक्टेयर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है जिसमें मुख्य बंगले के साथ 14 काॅटेज और एक झील भी शामिल हैं। आश्रम तक काठगोदाम में स्थित निकटतम रेलवे स्टेशन से पहुँचा जा सकता है। सात ताल आश्रम भारतीय परिप्रेक्ष्य से ओत-प्रोत तथा सादा जीवन और उच्च विचार की आदर्शवादिता को दर्शाता है। आश्रम के प्रभारी विजय पाटनी बताते हैं ”यहाँ आध्यात्मिक शीतलता पायी जा सकती है तथा यह सभी ईसाई संप्रदायों में एकता लाने का एक सकारात्मक और रचनात्मक माध्यम है।“
जोन्स ने अपने जीवनकाल में 60 हजार से अधिक उपदेश दिए। उनका प्रभाव बहुत प्रगाढ़ था तथा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और फिर विश्व के कई अन्य भागों में आश्रम आंदोलन को और बढ़ाया। आश्रम आंदोलन विश्व के 38 देशों में फैला और भारत में अब तक ऐसे 10 आश्रम हैं। उन्होंने सन 1950 में लखनऊ में नूर मंजिल मनोरोग केंद्र की स्थापना की जो भारत में अपने तरह का पहला ऐसा केंद्र था। उन्होंने माब्ले जोंस गर्ल्स हाई स्कूल के नाम से सीतापुर में लड़कियों के लिए स्कूल के साथ छात्रावास सुविधा की स्थापना भी की। यह सभी संगठन समाज की बेहतरी हेतु काम कर रहे हैं।
रेव सीएफ एंड्रयूज के माध्यम से डाॅ जोन्स गांधी जी के संपर्क में आये और सन 1925 में गांधी जी से प्रभावित हो स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की ओर आकर्षित हो गए। भारतीयों के प्रति ब्रिटिशर्स का रवैया उन्हें पसंद नहीं था जिसके चलते वे असहयोग आंदोलन और अहिंसा के प्रबल समर्थक बन गए। फलस्वरूप वह ब्रिटिशर्स की आँख का काँटा बने और 1940 से 1946 तक भारत से उन्हें निर्वासित कर दिया गया। इस दौरान उन्होंने वाॅशिंगटन में जापानी दूतावास में अपने ईसाई संपर्कों के साथ मिलकर अंतिम समय में रूजवेल्ट और सम्राट हिरोहितो के मध्य बातचीत कराकर जापान और अमेरिका के बीच युद्ध टालने की पुरजोर कोशिश की। सन 1946 में उन्हें भारत लौटने की अनुमति दे दी गई और सन 1947 में उन्होंने अमेरिका में संयुक्त चर्च हेतु पहले धर्मयुद्ध का आरम्भ किया। सन 1959 में उन्हें वर्ष के मेथोडिस्ट के नाम से सम्मानित भी किया गया। उन्हें दो बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया तथा सन 1963 में वह गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित भी किये गए।
दिसंबर 1971 में संयुक्त राज्य अमेरिका के ओकलाहोमा शहर में उन्हें पक्षाघात पड़ा जिसके बाद सन 1972 में वह सात ताल आश्रम लौट आए लेकिन पूरी तरह से ठीक नहीं हो सके। उन्हें बरेली में क्लारा स्वेन अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ 25 जनवरी 1973 के दिन उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उनकी अस्थियों को सात ताल तथा माउंट औलिवेट सिमेट्री, अमरीका में पंचतत्व में विलीन कर दिया गया। इस प्रकार भारत ने धर्म प्रचारक ही नहीं बल्कि एक दार्शनिक भी खो दिया, पर उनकी द्वारा जलायी गयी अलख में अभी भी तेज बरकरार है।