विचार विमर्श

एल्सी माउद इंग्लिश

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
पिता के रिटायरमेंट के बाद उनका परिवार स्कॉटलैंड वापस लौट आया और एडिनबर्ग में बस गया। उनकी शुरू से रूचि चिकित्सा में अध्ययन करने की थी परन्तु सन 1885 में अपनी मां के निधन के कारण प्रवेश में देरी करने के कारण उन्हें एडिनबर्ग में ही रहने के लिए बाध्य होना पड़ा। इसके पश्चात उन्होंने डॉ सोफिया जेक्स ब्लेक द्वारा स्थापित किये गए नये एडिनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर वीमेन में दाखिला ले लिया। सन 1892 में उन्होंने रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियन एंड सर्जन, एडिनबर्ग एवं फिजिशियन एंड सर्जन के फैकल्टी के रूप में अहर्ता प्राप्त की। एक संवेदनशील महिला होते हुए महिला रोगियों की जरूरतों, देखभाल और विशेषज्ञों की कमी को देखते हुए वह द्रवित हो उठी। इस श्य ने उन्हें राजनीतिक रूप से सक्रिय होने हेतु प्रेरित किया जिसके फलस्वरूप उन्होंने स्कॉटिश फेडरेशन ऑफ वीमेन सफरेज सोसायटी की स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुद को समझाते हुए उन्होंने यह कहा कि भाग्य ने उन्हें एक महान आंदोलन को सँभालने का कार्यभार सौपा हैं जिसके कारण उन्हें एक अच्छे वक्ता एवं योद्धा के रूप में भी वर्णित किया गया। सन 1906 में इंग्लिश ने स्कॉटिश वीमेन सफरेज की स्थापना में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
अपनी पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने लंदन में महिलाओं का एलिजाबेथ ग्रेट एंडरसन द्वारा शुरू किया गया एक अग्रणी अस्पताल तथा उसके बाद डबलिन में प्रसूति अस्पताल में काम करना शुरू कर दिया। एवं सन 1894 में अपने साथी छात्र जेसी मैक ग्रेगर के साथ उन्होंने चिकित्सा केंद्र एडिनबर्ग में लौट कर स्थापित किया। तत्पश्चात गरीब महिलाओं के लिए उन्होंने एक प्रसूति अस्पताल (दी होस्पिस) एवं दाईमाँ के लिए कार्य संसाधन केन्द्र खोला। एडिनबर्ग की मलिन बस्तियों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों के लिए भी चिकित्सा के साथ साथ सामाजिक कार्य में उनका अथक प्रयास रहा।
परोपकारी व्यव्हार के चलते वह अक्सर अपने मरीजों की बकाया फीस माफ कर देती थी और रोगियों को समुद्र किनारे स्वस्थ होने हेतु भुगतान कर देती थी। वह न केवल एक बेहतरीन पारिवारिक डॉक्टर थी बल्कि एक सक्षम और आश्वस्त सर्जन भी थी। अपने प्रयासों तथा चिकित्सा और वीमेन सफरेज के क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करने के बावजूद उन्हें प्रसिद्धि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मिली। इसी दौरान उन्होंने पश्चिमी मोर्चे पर महिलाओं की चिकित्सा इकाइयों के सृजन का सुझाव दिया। ब्रिटिश सरकार ने तो उनके सुझाव को स्वीकार नहीं किया लेकिन इसी तरह की पेशकश को फ्रांस सरकार ने स्वीकार कर अब्बए दे रोयौमोँट में सन 1914 में 200 बेड के सहायक अस्पताल को स्थापित किया। इसके बाद सन 1917 में वीलर्स कोटर्स में दूसरा अस्पताल स्थापित हुआ। उन्होंने सर्बिया और रूस के लिए दलों को भेजने में सक्रिय भूमिका निभाई और खुद भी सर्बिया गयीं जहाँ स्वच्छता में सुधार हेतु उनके काम ने मित्र देशों की सेना में उग्र सन्निपात और अन्य महामारियों को कम कर दिया। सन 1915 में उन्हें पकड़ कर प्रत्यावर्तित किया गया लेकिन अमेरिकी राजनयिक दबाव के फलस्वरूप उनकी रिहाई हो गई।
वापस स्वदेश लौटने के पश्चात उन्होंने रूस में स्कॉटिश महिला अस्पताल के लिए धन इकठ्ठा करना शुरू कर दिया, जो सन 1916 में ओडेसा स्थान्तरित हो गया। ऑस्ट्रिया के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की 28 जून 1914 को गवरीलो प्रिंसिप - एक युवा बोस्निया संगठन के सदस्य द्वारा हत्या के कारण ऑस्ट्रिया एवं हंगरी के मध्य युद्ध छिड़ गया। यह प्रथम विश्व युद्ध का आरम्भ था जिसमे सर्बिया के ओडेसा को महान युद्ध में खींच लिया गया। प्रारम्भ में उन्होंने दल का नेतृत्व किया, लेकिन सन 1917 में लंबे समय तक काम करने और भयावह स्थिति होने के कारण वह बीमार पड़ गयी। वह इंग्लैंड लौट आई जिसके पश्चात न्यूकैसल में स्थित सेंट्रल स्टेशन होटल में 53 वर्ष की आयु में 26 नवंबर 1917 को उन्होंने अपना देह त्याग दिया। 29 नवंबर को एडिनबर्ग में सेंट जाइल्स कैथेड्रल में उनका अंतिम संस्कार भव्य सार्वजनिक श्रद्धांजलि का एक अवसर बन गया था। इंगलिश को और उनकी नर्सों को श्रद्धांजलि देते हुए विंस्टन चर्चिल ने कहा ”वे सदैव इतिहास के पन्नो में जगमगाती रहेंगी।”
30 नवंबर के दिन वेस्टमिंस्टर लंदन स्थित सेंट मार्गरेट चर्च में उनके पार्थिव शरीर को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए विशेष सभा का आयोजन किया गया जिसके उपरांत डीन कब्रिस्तान के उत्तरी खंड में उन्हें विलीन कर दिया गया। यह कब्रिस्तान शांति और अद्वितीय सौंदर्य के स्थल के रूप में आज भी सन 1846 की तरह शांत गरिमा की भावना के साथ अंत्येष्टि के वातावरण की याद दिलाता है। पंक्ति में खड़े वृक्ष, रास्ते और स्मारक की शिलालेख में सुशोभित पंक्तियाँ इतिहास के इन्ही पन्नो को बयां करती रहती है। एल्सी इंगलिश लंदन में एक समारोह में सर्बिया के युवराज द्वारा आर्डर ऑफ व्हाइट ईगल (वी वर्ग) से सम्मानित होने वाली पहली महिला बनीं। आर्डर ऑफ व्हाइट ईगल सम्मान को सर्बिया के राजा मिलान प्रथम द्वारा 23 जनवरी 1883 को शुरू किया गया था। इससे पहले उन्हें आर्डर ऑफ सेंट सावा (तृतीय श्रेणी) के सम्मान से भी सम्मानित किया गया था। इस सम्मान को भी राजा मिलान प्रथम द्वारा 23 जनवरी 1883 को शुरू किया गया था, जो केवल विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय उपलब्धियों के लिए नागरिकों को सम्मानित करने हेतु दिया जाता था। लेकिन सन 1914 में इसमें परिवर्तन लाया गया तथा सैन्य कर्मियों को भी इस सम्मान से विभूषित किया जाने लगा।