विज्ञान जगत

ओस्टियोआर्थराइटिस

ओस्टियोआर्थराइटिस

डा॰ हिमानी पाण्डे बी॰ए॰एम॰एस॰, नैनीताल -

ओस्टियोआर्थराइटिस विश्व की एक गम्भीर बीमारी बन गई है। इस रोग पर विभिन्न शोध के बाद भी कोई कारगर इलाज नहीं मिल पाया है। यह बीमारी मुख्यतः बुजुर्ग लोगों में ज्यादा देखने को मिलती है। यह रोग जोड़ो में उपस्थित Cartilage के अभाव या टूट जाने के कारण होता है। Cartilage एक तरह का Tissue है जो जोड़ों को सुरक्षा प्रदान करता है और हड्डियों को आपस में टकराने से बचाता है। इसके अभाव के कारण हड्डियां आपस में टकराती हैं जिससे रोग उत्पन्न होता है।
आयुर्वेद में इस रोग को सन्धिवात नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद में इस रोग की उत्पत्ति का मुख्यः कारण जठराग्नि का मन्द होना और आम (Toxic Waste) की उत्पत्ति माना गया है। आहार-विहार और मनःस्थिति के अनुसार जब शरीर में उपस्थित वात, पित्त, कफ कुपित हो जाते हैं तो वह अग्नि को मन्द कर देते हैं जिससे आम की उत्पत्ति होती है। वहीं आम शिथिल आन्त्र में पहुंच कर सम्पूर्ण शरीर में विकार उत्पन्न करते हैं।

सन्धि अर्थात् संधि (Joint) वात अर्थात् वातदोष। जब वात दोष कुपित अवस्था को प्राप्त होकर संधियों में जाकर अपने रूक्ष स्वभाव के कारण संधियों में उपस्थित तरल पदार्थ (Synovial fluid) को सुखा देता है तो संधि वात रोग होता है।
कारण-
1. विरुद्धाशन (दो परस्पर विरोधी पदार्थाें का एक साथ सेवन।)
2. अध्यशन (एक बार खाकर पुनः भोजन करना।)
3. अनशन (भोजन न करना।)
4. बासी और ठण्डे पदार्थों का सेवन।
5. अधारणीय वेगों को धारण करना।
6. शीत, सीलनयुक्त वातावरण।
7. वजन का बढ़ना।
8. व्यायाम का न करना या अत्यधिक करना।
9. वृद्धावस्था।
लक्षण - आयुर्वेद के अनुसार-
वातपूर्णदृतिस्पर्शः शोथः सन्धिगतेऽनिले।
प्रसारणाकु´चनयोः प्रवृश्चिय सवेदना।।
(च. चि. 28/37)
अर्थात् जब वायु कुपित होकर सन्धियों में आश्रित होती है तब सन्धियों में स्पर्श से वातपूर्ण दृति के समान अनुभव होता है तथा सन्धियों में शोथ हो जाता है। अंगों के प्रसारण तथा आकुचन में पीड़ा होती है।

अन्य लक्षण-
1. सन्धियों में तीव्र वेदना का होना।
2. सन्धियों में जकड़न का होना जो मुख्यतः प्रातःकाल सोकर उठने के बाद देखी जाती है।
3. सूजन।
4. छूने में दर्द का होना।
5. जब सन्धियां मुड़ती हैं तो हड्डियोें के टकराने की आवाज होना जिसे (Cracking Sound या crepitation) कहते हैं।
6. मांसपेशियों का कमजोर होना।

चिकित्सा-
1. ताजे फल एवं सब्जियों का प्रयोग।
2. मिर्च मसालों का प्रयोग नहीं करना।
3. व्यायाम करना, जिससे सन्धियों में लचीलापन बना रहे।
4. मालिश करना (औषधिगुण युक्त तैल) से।
5. मालिश के बाद स्वेदन करना (बजरी की थैली या गर्म पानी से)।
6. वात नाशक औषधियों का प्रयोग जैसे गुग्गुल।
7. अग्नि को तीव्र करना जिससे आम की उत्पत्ति ना हो।
8. आन्त्र को तन्दरूस्त रखना जिससे कब्ज की स्थिति पैदा न हो।

ध्यान रखें-
1. व्यायाम करें (अपने बल के अनुसार)।
2. वजन कम करें।
3. आहार संतुलित लें।