अपना शहर

औपनिवेशिक बस्ती

प्रो0जी0एल0 साह
यद्यपि यह औपनिवेशिक बस्ती के रूप में नयनीताल की बसासत का प्रारम्भ कहा जा सकता है तथापि इसके साथ ही इस बात के भी प्रमाण है कि नैनीताल में बनने वाले भवनों में पहली कोठी मेजर एच0एच0 अर्नाउड द्वारा गिवालीखेत में बनायी गयी शेरवुड थी (न कि बैरन की पिलग्रिम लाॅज)। जिसका निर्माण वर्ष मई 1843 था (टोलिया आर0एस0-1996)। नगर पालिका कमेटी के अभिलेखों से तत्कालीन निर्मित कुछ भवनों के निर्माण तिथि की पुष्टि, जो क्रमशः पिलग्रिम लौज (1844) ओक लौज एवं विंडसर (1845) अल्माकाटेज एवं ब्रेसाइड तथा स्प्रिंगफील्ड (1846) थे।
स्थानीय थोकदार नरसिंह जो कि स्वयं को इस समूचे क्षेत्र के भू-पति मानते हुए नैनीताल को भी अपनी मिल्कियत (स्वामित्व) मानते थे और नैनीताल को हड़पने की अंग्रेजी साजिश की मंशा को समझते थे, ने तत्कालीन सहायक कमिश्नर बैटन की अदालत में इससे सम्बन्घित वाद दायर किया था। यद्यपि तत्कालीन अदालत में दिया गया निर्णय उसके विपक्ष में था तो भी बैरन द्वारा नरसिंह को दायर वाद को वापस लेने तथा लिखित सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने पर जोर देना तथा उसको पटवारी पद का प्रलोभन देना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि बैरन येन केन प्रकारेण नैनीताल में भूमि के सौदागर के रूप में प्रतिष्ठित होकर आर्थिक लाभ चाहता था। बाद के वर्षों में ऐसा हुआ भी।
अतएव बैरन का नैनीताल के खोजकर्ता के रूपमें अनावश्यक महिमा मंडन ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। नैनीताल के प्रादुर्भाव एवं नगरीय विकास में इस महत्वपूर्ण तथ्य का संज्ञान लिया जाना समीचीन होगा कि -
(1)       8 मई 1845 को स्थानीय भवन स्वामियों द्वारा कमेटी की स्थापना का प्रस्ताव गवर्नर को भेजा गया । इस कमेटी को गवर्नर द्वारा 7 जून 1845 में अध्यक्ष के साथ केवल चार सदस्यों को ही अनुमोदित किया गया। कैप्टन वाॅक को इस पहले कमेटी के सचिव की जिम्मेदारी दी गयी, ने कुलियों की सहायता से चैन सर्वे द्वारा आवेदित तथा प्रो0जी0एल0 साह
यद्यपि यह औपनिवेशिक बस्ती के रूप में नयनीताल की बसासत का प्रारम्भ कहा जा सकता है तथापि इसके साथ ही इस बात के भी प्रमाण है कि नैनीताल में बनने वाले भवनों में पहली कोठी मेजर एच0एच0 अर्नाउड द्वारा गिवालीखेत में बनायी गयी शेरवुड थी (न कि बैरन की पिलग्रिम लाॅज)। जिसका निर्माण वर्ष मई 1843 था (टोलिया आर0एस0-1996)। नगर पालिका कमेटी के अभिलेखों से तत्कालीन निर्मित कुछ भवनों के निर्माण तिथि की पुष्टि, जो क्रमशः पिलग्रिम लौज (1844) ओक लौज एवं विंडसर (1845) अल्माकाटेज एवं ब्रेसाइड तथा स्प्रिंगफील्ड (1846) थे।
स्थानीय थोकदार नरसिंह जो कि स्वयं को इस समूचे क्षेत्र के भू-पति मानते हुए नैनीताल को भी अपनी मिल्कियत (स्वामित्व) मानते थे और नैनीताल को हड़पने की अंग्रेजी साजिश की मंशा को समझते थे, ने तत्कालीन सहायक कमिश्नर बैटन की अदालत में इससे सम्बन्घित वाद दायर किया था। यद्यपि तत्कालीन अदालत में दिया गया निर्णय उसके विपक्ष में था तो भी बैरन द्वारा नरसिंह को दायर वाद को वापस लेने तथा लिखित सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने पर जोर देना तथा उसको पटवारी पद का प्रलोभन देना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि बैरन येन केन प्रकारेण नैनीताल में भूमि के सौदागर के रूप में प्रतिष्ठित होकर आर्थिक लाभ चाहता था। बाद के वर्षों में ऐसा हुआ भी।
अतएव बैरन का नैनीताल के खोजकर्ता के रूपमें अनावश्यक महिमा मंडन ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। नैनीताल के प्रादुर्भाव एवं नगरीय विकास में इस महत्वपूर्ण तथ्य का संज्ञान लिया जाना समीचीन होगा कि -
(1) 8 मई 1845 को स्थानीय भवन स्वामियों द्वारा कमेटी की स्थापना का प्रस्ताव गवर्नर को भेजा गया । इस कमेटी को गवर्नर द्वारा 7 जून 1845 में अध्यक्ष के साथ केवल चार सदस्यों को ही अनुमोदित किया गया। कैप्टन वाॅक को इस पहले कमेटी के सचिव की जिम्मेदारी दी गयी, ने कुलियों की सहायता से चैन सर्वे द्वारा आवेदित तथा स्वीड्डत भवन/जागीरों की नाप जोख प्रारम्भ की। इसके साथ ही उन्होंने म्यूनिसिपल कमेटी के नियम/उपनियम बनाने शुरू किये तथा अनेक पदों पर नियुक्तियाँ प्रारम्भ कीं क्रमशः