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कलयुग को अब मिला दूसरा ठौर

- दिनेश कुकरेती

नैमिषारण्य में अट्ठासी हजार शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा सूतजी कलयुग की कथा सुना रहे हैं। पृथ्वीलोक की परिक्रमा करते हुए संयोग से मैं भी वहाँ पहुँच गया। सूतजी को प्रणाम किया तो उन्होंने पास ही बैठने का इशारा किया और बोले, ‘‘नारद! देवभूमि में दाज्यू के क्या हाल ठैरे।’’ सूतजी के श्रीमुख से दाज्यू का जिक्र सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। सोचने लगा, आखिर कुछ तो बात है दाज्यू में, जो सूतजी भी आईने में उतरे हुए हैं।
मैंने कहा, ऋषिवर! दाज्यू तो पूरी तरह दुरुस्त हैं पर अपने इर्द-गिर्द वालों को उन्होंने जमीन दिखा दी है। एक-एक को चुन-चुनकर उसके कर्मों की सजा दे रहे हैं। लोकतंत्र के महासमर को उन्होंने ऐसे रण में तब्दील कर दिया है, जिसका कहीं आदि नजर आ रहा न अंत। घर में ही लोग एक-दूसरे के लहू के प्यासे बने बैठे हैं। दाज्यू के तेज के सामने कुछ तो ऐसे निस्तेज हो गए हैं कि उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा। मुझे तो उस किशोर के चेहरे पर तरस आ रहा है, जो लड़ भी रहा है और हाथ में तलवार भी नहीं। और...गुरुवर मजा देखिए कि इस किशोर को जहाँ दौड़ाया जा रहा है, वहाँ वह दौडने को तैयार ही नहीं। उसकी इच्छा तो घर में दौडने की थी, जहाँ उसे घुसने ही नहीं दिया गया। दाज्यू न जाने किस जनम का बदला ले रहे हैं उससे।
इतना कहते-कहते मैं थोड़ा सुस्ताने के लिए रुका कि सूतजी ने आगे बोलने का इशारा कर दिया। आदेश को शिरोधार्य कर मैंने कहा, गुरुवर दाज्यू नौ को तो पहले ही निपटा चुके थे, कुछ उनकी देखादेखी निपटने लगे। एक जवान को तो उन्होंने युद्ध के मोर्चे पर खड़ा कर उसके गले में टिकट फँसा दिया और अब कह रहे हैं तू योद्धा नहीं, जल्दी टिकट लौटा। उसने दाज्यू की मंशा पूछी तो बोले, हमने दूसरे के ऊपर ज्यूँदाल (चावल) छिड़क दिए हैं। अब वही बनेगा हमारा पश्वा (सवारी)। जवान बेचारा! मारा-मारा फिर रहा है, इस घर से उस घर। न उगलते बनता है, न निगलते। आप ही बताइए गुरुवर लड़ना जिसका शगल रहा हो, वो लडने लायक कैसे नहीं होगा भला। सो, वह भी अपनी पर अड़ा है कि नहीं लौटाऊँगा पर मुझे लगता नहीं कि वह दाज्यू के सामने बहुत देर टिक पाएगा। इतना कहकर मैं शांत हो गया।
सूतजी बोले, ‘‘नारद! तो, तुम्हारे हिसाब से इस जवान को क्या करना चाहिए। क्या दाज्यू गलत कर रहे हैं।’’ मैंने कहा, ‘‘गुरुदेव! दाज्यू की तो दाज्यू जानें, मैं तो बस इतना जानता हूँ कि छुरी सेब पर गिरे या सेब छुरी पर, कटना तो सेब को ही है।’’ बिल्कुल सही कहा तुमने, सूतजी बोले। असल में दाज्यू की स्थिति वही है, जो कलयुग के प्रारंभ में महाराज परीक्षित की थी। जब तक उनके सिर पर राजमुकुट है, तब तक वे एक-एक को ऐसे ही निपटाते रहेंगे। महाराज परीक्षित के बाद कलयुग को उन्हीं की तलाश थी। खैर! तुम तो दर्शक हो, बस देखते जाओ, आगे-आगे होता क्या है।