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किलबरी संरक्षित रिजर्व घोषित

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -

30 अप्रैल के दिन किलबरी को उत्तराखण्ड राज्य का चैथा संरक्षित रिजर्व घोषित किया गया। सन 2003 में किए गए भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972, में संशोधनों के बदौलत उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बना जिसने शुरुआती दौर में ही दो संरक्षित रिजर्व, आसन एवं झिलमिल संरक्षित रिजर्व स्थापित किये। इन रिजर्वो को प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. ए पी जे अब्दुल कलाम ने 14 अगस्त 2005 को राष्ट्र को समर्पित किया। आसन वेटलैंड संरक्षित रिजर्व देश के सबसे महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों की गिनती में आता है, जो साथ ही प्रवासी सर्द पक्षियों को सुरक्षा के उच्च स्तर भी प्रदान करता है।
उसी तरह से महत्वपूर्ण झिलमिल उत्तराखण्ड का एकमात्र रिजर्व है जो अत्यधिक लुप्तप्राय स्वैम्प हिरण को शरण प्रदान करता है। 7 मार्च 2015 के दिन नन्धौर को तीसरे संरक्षित रिजर्व के रूप में घोषित किया गया। यह राज्य के भाभर क्षेत्र के जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करता है।
एक संरक्षित रिजर्व भारतीय वन अधिनियम 1972 की धारा 18 (1) के अंतर्गत घोषित किया जाता है। यह अपने में पहला और एक महत्वपूर्ण कदम है जो संरक्षित क्षेत्र के प्रबंधन में लोगों की भागीदारी को भी सम्मिलित करता है। वन विभाग के अतिरिक्त इसकी सलाहकार समिति में पंचायतीराज संस्था के तीन प्रतिनिधि, दो गैर सरकारी संगठनों के सदस्य, एक-एक प्रतिनिधि पुलिस और पशु चिकित्सा विभागों से, एक सदस्य मानद वन्य जीव वार्डन और तीन सदस्य वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों में से आते हैं।
इस अवसर पर बोलते हुए वन संरक्षक श्री विवेक पांडे ने कहा कि ”किलबरी वन नैनीताल के बहुत समीप है और नैनीताल तथा किलबरी के बीच ऊंचाई में बदलती जैव विविधता एक उल्लेखनीय का उदाहरण है। प्रसिद्ध संरक्षणवादी जिम काॅर्बेट जब नैनीताल नगर पालिका बोर्ड के वरिष्ठ उप-चेयरमैन थे तो इस क्षेत्र को एक पक्षी अभयारण्य के रूप में घोषित करना चाहते थे लेकिन उनका यह उत्तम विचार द्वितीय विश्व युद्ध और युद्ध के बाद नैनीताल नगर पालिका के बोर्ड से इस्तीफा देने के चलते फलीभूत न हो सका।“
हिमालय की उन कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में किलबरी क्षेत्र जैव विविधता का एक ऐसा गर्भगृह है जहाँ बाँज अभी भी फल-फूल रहा है लेकिन बाहरी कारकों और चीड़ की घुसपैठ के कारण यह लुप्त होने को विवश है। किलबरी वन में बाँज की पांच प्रजातियां खर्सू (क्वेरकस सेमिकारपीफोलिआ), तिलौंज (क्वेरकस दिलिटाता), रिआँज (क्वेरकस लानुगिनोसे), बाँज (क्वेरकस लूकोट्रिकोफोरा) और फल्यांट (क्वेरकस ग्लाउका) पायी जाती हैं।
किलबरी के वनों के महत्व को समझाते हुए रेंज अधिकारी श्री केएस रावत कहते है ”किलबरी, कौसानी से निकलने वाली कोसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र का एक हिस्सा है। कोसी नदी के प्रदायक गधेरे अपनी दिशा अल्मोड़ा या नैनीताल जिले में ले लेते हैं। अल्मोड़ा जिले में स्थित अधिकांश प्रदायक गधेरे वनों के प्रचंड विनाश के कारण सूख चुके हैं वहीं नैनीताल जिले के गधेरे ही वास्तव में कोसी नदी को चलयमान बनाए हुए हैं। किलबरी में बाँज की उपलब्ध्ता के कारण यह गधेरे बारहमासी हैं। इन वनों के नष्ट होते ही, कोसी नदी का पानी भी काफी कम हो जाएगा।“
राज्य सरकार ने किलबरी को संरक्षित रिजर्व के रूप में घोषित कर एक विवेकपूर्ण निर्णय लिया है जिसमें लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। किलबरी के और आसपास के पन्गूठ और कुंज खड़ग के वनों में जैव दबाव प्रत्येक वर्ष बढ़ते हुए पर्यटन और नए होटलों, अतिथि गृहों के आने से, बिल्डरों द्वारा अंधाधुंध तरीके से विशाल आवासीय परिसरों जिसमें ज्यादातर पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता नहीं है, बढ़ता ही जा रहा है। इसके अतिरिक्त अधिक चरने, वनों में  आग तथा चारा और ईंधन के लिए पेड़ों की छंटाई जैसी पुरानी गतिविधियाँ पौधों के जीवन को खतरे में डालने के मुख्य कारक हैं। जैव दबाव के अहितकर परिणाम जीवों की आबादी पर मूलतः दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं।
रेंज अधिकारी श्री केसी सुयाल की राय में ”किलबरी के वनों में औषधीय पौधों का बाहरी व्यापारियाके के लिए ग्रामीणों द्वारा किये गए अधिक शोषण से पौधों की कुछ प्रजातियां जैसे किलमोड़ा, केदार पत्ती, बज्रदन्ती, भुत केश आदि विलुप्त होने के कगार पर आ गये हैं।“ जो पर्यटक पर्यटन सीजन के दौरान नैनीताल आते हैं वो किलबरी के वनों में भी जमघट लगाते हैं। वहीं हिमालय के दर्शन होने के कारण यहाँ वन विभाग का बंगला दर्शकों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है।
कुछ होटल, अतिथि गृह अथवा वनों में तम्बू कालोनियों के मालिक पर्यटकों और कैंपर्स के लिए कैंप फायर का आयोजन करते हैं। रात के आमोद-प्रमोद का यह आयोजन अब रोजमर्रा का जैसा हो गया है जिससे जैव विविधता की समृद्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कभी कभी ये वनों में आग का रूप ले लेती है पर अब संरक्षित रिजर्व के गठन के साथ वनों में इन हानिकारक गतिविधियों पर लगता है लगाम लग जायेगी।

लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
’अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित