विचार विमर्श

कीवी कुमाऊं में किसानों की अर्थव्यवस्था को बदल सकते हैं

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में सर्दियों के मौसम में ऋषि से जुड़ी गतिविधियाँ मंद पड़ने लग जाती है। इस अवधि के दौरान यानी नवंबर से फरवरी के बीच किसान अपेक्षात कार्यरहित होता है। एक सर्द मौसम के फल के रूप में कीवी किसानों की अर्थव्यवस्था का पूरक बन, उन्हें इन महीनों के दौरान सुयोग्य अवसर प्रदान कर सकता है। भारत के अन्य क्षेत्रों के समान, कुमाऊँ का क्षेत्र भी ग्लोबल वार्मिंग के प्रकोप से ग्रसित है, जिसके फलस्वरूप ज्यादा ठंडी, आवश्यकताओं वाले फल और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं। एक विशेषज्ञ डाॅ॰ केएस नेगी के मतानुसार ”शीतोष्ण और उप-शीतोष्ण वाले फलों में, कुमाऊँ की जलवायु कीवी उगाने के लिए अनुकूल है। वर्तमान में कुमाऊँ में कीवी की छह किस्में उपलब्ध हैं जैसे एलीसन, हेवर्ड, मोंटी, ब्रूनो, अब्बोट और तोमोरी, जिसमें 1200 से 1500 मीटर की ऊँचाई के बीच एलीसन तथा 2000 से 2500 मीटर के बीच हेवर्ड जैसी किस्में सफल हैं। कुमाऊँ और हिमाचल प्रदेश में समान क्षेत्र में जानकारी की कम लागत, प्रबंधन और अन्य निवेश के साथ सेब की तुलना में कीवी खेती प्रति इकाई क्षेत्र में ज्यादा प्रतिफल देती है।” कीवी आसानी से होने वाली प्रजाति का फल है जिसमें अन्य शीतोष्ण फल की तुलना में बहुत कम या लगभग नगण्य रासायनिक स्प्रे की आवश्यकता पड़ती है। जिसके कारण यह पर्वतीय क्षेत्रों में सतत बागवानी के लिए सबसे उपयुक्त फल बन सकता है। चूंकि कीवी का फल मोटे पत्तों के नीचे छिप जाता है, इसलिए न ही यह आसानी से मैगपाय जैसे पक्षियों द्वारा चोंच मारकर खराब किया जाता, और न ही लंगूरों द्वारा देखा जा सकता है जो इसे नुकसान पहुँचा सकते हैं। सेब और खुमानी के फलों के विपरीत, कीवी के फल आने की अवधि के दौरान ओलावृष्टि नहीं होती और होने पर भी मोटे पत्तों के कारण उनका क्षतिग्रस्त होना बच जाता है।
नैनीताल जिले के निगलाट क्षेत्र में स्थित राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) ने सफलतापूर्वक कीवी का प्रचार किया है। नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर और चम्पावत जिलों के प्रगतिशील किसान, जिनके पास बहुत कम भूमि है, कीवी को सफलतापूर्वक उगा रहे हैं। इसके फलस्वरूप यह उनके लिए एक प्रमुख नकदी फसल बन गयी है। एनबीपीजीआर के प्रभारी और एक प्रख्यात वैज्ञानिक डाॅ॰ एसके वर्मा कहते हैं, ”कीवी चाइनीज गूसबैरी (एक्टीनिदिा चिनेन्सिस) के नाम से भी जाना जाता है जिसे संस्थान द्वारा सन 1990 में कुमाऊँ में लाया गया था। किसानों की अर्थव्यवस्था एवं संस्थान की प्रयोगशाला से भूमि तक पहुँच के दृष्टिकोण के मद्देनजर, पिछले नौ वर्षो में 274 गावों के 624 किसानों को कीवी की 11,000 से अधिक ग्राफ्ट दिए गए हैं। इन गांवों में सबसे सफल उत्पादकों में जगत सिंह मेहरा, देवेंद्र सिंह खनायत, कुबेर सिंह बिष्ट, हिम्मत सिंह गौड़ तथा विक्रम सिंह नेगी रहे हैं।” देश में कई अन्य संस्थानो के विपरीत, एनबीपीजीआर ने उनके वैज्ञानिक निष्कर्षो को कुमाऊं में ग्रामीणों के मध्य कीवी और अन्य नकदी फसलों को लोकप्रिय बनाने में अतुलनीय सेवाएं दी हैं।
कीवी की खेती किसानों की - जिनके पास कम भूमि होती है उनकी आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं, क्यूंकि एक नाली क्षेत्र (200 वर्ग मीटर) से एक सत्र में 70 से 80 हजार रुपए के बराबर फल बेचे जा सकते हैं। एनबीपीजीआर के तकनीकी अधिकारी श्री रतन राम आर्य कहते हैं, ”समतल भूमि के एक नाली क्षेत्र में कीवी की 10 लताओं को लगाया जा सकता है, जिसमें परागण के लिए 8 मादा और 2 नर पौंधे होने चाहिए। वहीं सीढ़ीदार भूमि में समान क्षेत्र पर इसका अनुपात 1 नर और 6 मादा पौधों का हो जाता है। दोनों स्थितियों में नर पौधों को बीच में लगाया जाना चाहिए।” एक लता की औसत उम्र 40 साल होती है जो तीन साल के बाद प्रत्येक लता से 50 किलो तक फल देना शुरू कर देता है। एक फल का वजन 50 ग्राम होता है तथा हल्द्वानी में एक फल डीलर नासिर हुसैन के अनुसार ”वर्तमान में बाजार में एक फल का मूल्य 30 रुपये है। इसकी ज्यादातर आपूर्ति महानगरीय शहरों में पंच सितारा होटलों में की जाती है जहाँ एक फल का मूल्य 80 से 100 रुपये तक हो जाता है।”
वरिष्ठ वैज्ञानिक और कीवी खेती के विशेषज्ञ डा॰ ए के त्रिवेदी के अनुसार ”अपनी उच्च पोषण महत्व के फलस्वरूप इसकी मांग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ रही है। यह अपने उच्च एसकाॅर्बिक सामग्री और व्याप्त खनिजों खासकर फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम के लिए जाना जाता है। कीवी फल उम्र संबंधित धब्बेदार अधरूपतन, जो वयस्कों में दृष्टिहानि का प्रमुख कारण होता है, से रक्षा करता है। यह एक एंटी आॅक्सीडेंट फल भी है जो मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद करता है। साथ ही यह कोलेस्ट्राॅल के स्तर को कम कर कार्डियो वैस्कुलर बीमारियों से ग्रसित रोगियों की हालत में सुधार करता है।” कीवी में आमदनी बढ़ाने की जबरदस्त गुंजाइश है, जो उपयुक्त विपणन तकनीक के माध्यम से बढ़ सकता है। इसके फलस्वरूप कुमाऊँ में किसानों के आर्थिक हालत में सुधार होगा और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े शहरों के लिए पलायन होने की प्रक्रिया में पूर्णविराम लग जाएगा।
लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
’अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित