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कुंआरों’ की राजनीति........... सुबहानल्लाह!

‘कुंआरों’ की राजनीति........... सुबहानल्लाह!
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
किसी इंसान का शादी करना या नहीं करना, उसका निजी मामला है। परन्तु यह उस समय ‘निजी मामला’ नहीं रहता जब बात राजनैतिक और सामाजिक सेवा क्षेत्रों की हो। सामाजिक जीवन या राजनैतिक जीवन व्यक्तिगत मामला नहीं होता तब उसके निजी जीवन से समाज और राष्ट्र का बड़ा वर्ग प्रभावित होता है।
वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री को ‘कुंआरा’ इसलिए कहा जाता है कि उनका विवाह ‘बाल-विवाह’ था। बालिग़ होने पर उन्होंने विवाह या शादीशुदा जिन्दगी से छुटकारा पा लिया। वह आर॰एस॰एस॰ की पृष्ठभूमि से आते हैं और आर॰ एस॰ एस॰ में पूर्णकालिन स्वयं सेवक अविवाहित ही रहते हैं। आर॰एस॰एस॰ में संघ समर्पित कुंआरों की भरमार है। भाजपा आज पूरे देश में राजनीति की जो सम्राट बनी हुई है, उसकी हकूमत की जमीन कुशाभाऊ ठाकरे ने तैयार की थी। एक कुआरे ने बंजर भूमि को जोता और दूसरा कुंआरा आज फसल काट रहा है।
आमतौर पर देखा गया है कि कुंआरे राजनीति में काफी कामयाब रहते हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि असम जैसे राज्य पर भाजपा का शासन होगा, मगर यह हुआ और आज एक कुंआरा ;सर्बानन्द सोनोवालद्ध वहां का मुख्यमंत्री है। शादीशुदा अनेक राजनेताओं की दुकानें, कुंआरों ने बन्द कर दी। तो क्या शादीशुदा लोग राजनीति में कामयाब नहीं रहते? यह ख्याल भी गलत है क्योंकि लालू यादव की शादीशुदा ज़रख़ेज़ जमीन गवाह है कि वहां राजनीति की पूरी खेप मौजूद है। नर सिंह राव का परिवार भी राजनीति में कामयाब है। सबसे बड़ी बात यह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कई बेटों के बाप थे और उनकी औलादें भी राजनीति में सक्रिय रहीं।
मगर जो बात कुंआरों की राजनीति में है वह खूबसूरती शादीशुदा लोगों में नहीं है। राहुल गांधी इसलिए अपवाद हैं कि उनकी शादी का चांस अभी बाक़ी है। अटल बिहारी वाजपेयी का तो कहना ही क्या है। वह एक शानदार कुंआरे और जानदार राजनेता रहे हैं। ;वास्तव में वह साफ़-सुथरी राजनीति का एक मात्र स्कूल हैं।द्ध
राममनोहर लोहिया, भारतीय राजनीति का बड़ा भारी नाम है। कुंआरे थे मगर उनके अनुयायी यदि उनकी तरह निजी आचरण करते तो पूरी कौम ;यादवद्ध राजनेता नहीं बनती। कुंआरे राजनेता की पूरी फसल लहलहा रही है।
रोपड़ ;पंजाबद्ध के एक सरकारी मुलाज़िम काशीराम ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति की तो पूरे देश में कुंआरी राजनीति का लोहा मनवा लिया। उनकी शिष्या ने अपने गुरू का कुंआरा मार्ग नहीं छोड़ा और कुमारी मायावती के रूप में सशक्त राजनेता बनकर दिखाया। वह भी सरकारी स्कूल की अध्यापिका थीं। हो सकता है शादी करने के बाद वह घर-गृहस्थी में घिर कर सशक्त महिला राजनेता का पद सुशोभित करने से वंचित रहतीं।
ममता बनर्जी जैसी जुझारू महिला राजनेता अपनी मिसाल आप हैं।वह भी कुंआरी हैं। जय ललिता ‘लागी बदन मेें ज्वाला, सैंय्या तू ने क्या कर डाला’ का नृत्य करके आज भले-भले राजनेता को नचा रही हैं।
उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कुंआरे मुख्यमंत्री के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, केन्द्रीयमंत्री उमा भारती इस परम्परा को भली-भांति निभा रहे हैं।
नक्सलवादी आन्दोलन के प्रमुख कानू सान्याल, भारतीय कम्यूनिस्ट नेता इन्द्रजीत गुप्त भी मिसाल हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंधी और तूफान बनकर उभरने वाले गांधीवादी अन्ना हजारे अभी तक कुंआरे हैं।
क्या किसी नेता का अविवाहित रहना देश या उनकी विचारधारा के लिए फायदेमन्द रहता है? इन सवालों के जवाब कभी तलाश मत करना क्योंकि ऐसा करना खतरे से खाली नहीं है।