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कुमाऊँनी कहानी संग्रह परमेश्वर (पहाड़ी में)

कुमाऊँनी कहानी संग्रह
परमेश्वर (पहाड़ी में)
डाॅ. दीपा कांडपाल
परूलि मै झट तैयार है गे, उकैं कि पत्त गिरूवा हाल। एकैल दबी जुबान में गिरूवै कि शराबि हुणी बात कै लै, पर परूलि ईजल सोचै मणि-मणि खाणि-पिणी त हमार पहाड़ पर हुनै छन। ऐल मुख परि मांगणी मिलि रई होई कै दिनूं। वील अघिन-पछिन कै नि चै, बात पक्की करि दी। गौं वालनैल मिलि-जुलि बेर परूलि बिवै दी। परूलि ईजा पास आपण ब्या बखता एक कनफूल और एक मंगलसूत्र छी, उ वील परूलि कै पैरे दीं। बाकि ब्या हई बाद परूलि धेलि पल्ट्ण हु लै मैत नि ऐ सकि। को ल्हि जान को पुजून। परूलि मैक क्वे भै नै, गिरूवाक बौज्यूल च्यौल बिवै दी, लंग जिति ली-द्वि यै तरफ पट्ट भै। न मै बै क्वे बलूणी न सौरास बै क्वै पुजूंणी। परूलि क सौरास में परिवार पुरै भै पर वीक बार में सोचणि क्वे नि भै।
उ जदिन बै यौ घर में ऐ उदिन बै वील एक दिन लै सुखौक नि द्यख। रोज एक झसक ल्हि बेर उठनेर भै। वी झसक में दिन काटि रात पडि़ जानेर भै। निगुर शराबि गिरूवैल एक आंखर कदिनै भलि बलई लै हुनौ त परूलिक शायद मन लागि जा्न पर उ त बाबुल बर बणै दियौ त एक दिन बणि गे बर बांकि त उकै न सैणि चैनि न घर। रत्तै बै शराबौ आचमन शुरू। उठण है पैलिक खाटै बै घुटुक लगै ल्हि नेर गिरूवौ खुट बिना शराबै भीं नि पड़नेर भै। परूलि कि करौ क्वे घडि़ त यसि हुनि जब उ मैस जौ रून, तब के मसझाइ लै जौ। उ या तौ पिनेर भै या खै पी बेर घुरिरूनेर भै। एक दिन परूलिल आपण सौर ज्यू हुं कै ‘बाबु तनुकै बोतला लिजि डबल नि दिया त भल हुन’ सौरज्यू बिगडि गे ‘म्यर च्यल म्यार डबल, तू क्वे है छै बीचम बलाणी, आपण काम दगै मल्लब धर।’ कहूं कौ परूलि। रोल गिरूवा उठण है पैलि उठि जानेर भै नतरि शराबा भभुकैल दिन भरि ख्वौर रिंगि जानेर भै। परूलि कैं के कूणौ क हक्कै नि भै, कभतै हिम्मत करि बेर एक आंखर बलांण लै चाली तो ‘चोप्प’ कै बैर धकिये दिनेर भै। परूलि दिन भर कि करैं? खैं छ नि खानि? घर पना कि हुणौ के दगै मतलब नि भै गिरू कै। भाई क फाटि पुराण कुर्त-सुराव मिल गया लगै ल्ही, भौजिल थालि पसक दी खै ल्हि नतरि बाबुकि ल्याई बोतल पकडि घुरि रै। ब्या करि बाद लै वीकि दिनचर्या में कोई फरक नि ऐ। बाबुल समझि ब्या करि बाद आफि समझ जाल तबै उ दूरा क गौं बै परूलि जै देखणि-चांणि सुंदर सिपालि चेलि चै लै। नजीका क गौ वाला कणि गिरूवा हाल पत्तै भै-को जै दिणौ छि उकै आपणि चेलि? गिरूवा बौज्यू लै आब दिन-दिनै पटै गे, च्यलै कि दा्स जसि कि तसि देखि बेर उ लै बिना परूलि पर आपणि रीस फेड़नेर भै।