विचार विमर्श

कुमाऊँ का हरा सोना

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
उत्तराखण्ड के निर्माण के बाद कुमाऊँ में चाय उत्पादन का पुनरूद्धार हुआ था। यह राज्य की आर्थिक स्थिति को परिवर्तित कर सकती है और सीमित आर्थिक श्रोत के पर्वतीय किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकती है। ख्याति प्राप्त इतिहासकार डा.आर.एस टोलिया के अनुसार ”विश्व में चाय को सबसे पहले चीन के द्वारा लाया गया और भारत में यह अंग्रेजों के द्वारा लाई गई। 1833 ई0 में कैन्टन के साथ चाय के व्यापार में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कानूनी एकाधिकार को खो दिया और चाय के लिए अन्य स्त्रोतों को खोजने लगे। फलस्वरूप कम्पनी ने भारत में चाय उत्पादन का विचार किया और इसके लिए उचित क्षेत्रों की खोज के लिए एक चाय कमेटी बनाई गई। 1934 में चाय की खेती प्रारम्भ हुई। 1939 में लन्दन में इसकी स्वीकृति के बाद यह कहा जा सकता है कि आधुनिक चाय उद्योग भारत में ही प्रारम्भ हुआ। चाय का प्रयोग प्रारम्भ में आंग्ल भारतीयों के द्वारा ही होता था लेकिन 1940 में इसका प्रचार भारत के द्वारा अभूतपूर्व सफल विज्ञापन अभियान के द्वारा लोकप्रिय हो गया। इसका श्रेय भारत चाय निगम को जाता है और आज चाय पानी के बाद सबसे ज्यादा प्रयोग में आने वाला पेय है। “
उत्तर भारत के पर्वतीय जिलों में चाय उत्पादन का श्रेय डा. रोयले, जो 19वीं शताब्दी में सहारनपुर के चाय बागान के प्रमुख थे, को जाता है। उन्होंने चीन में उत्पन्न होने वाली चाय और हिमालयी वनस्पति की साम्यता की ओर संकेत दिया और विशेष रूप से कुमाऊँ की मिट्टी को इसके लिए उपयुक्त घोषित किया। उन्होंने यह राय गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिंग की सहारपुर की यात्रा के समय भी व्यक्त की उसी समय चाय उत्पादक डा॰ वैलिस ने हाउस आॅफ कौमन्स में एक पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें कुमाऊँ में चाय उत्पादन के लिए एक पत्र प्रस्तुत किया। गढ़वाल और सिरमौर में भी चाय उत्पादन के लिए आग्रह किया गया। इसके फलस्वरूप कुमाऊँ की पहाडि़यों में अल्मोड़़ा में लक्ष्मेश्वर, भीमताल में भरतपुर में 1840 में चाय की दो पौंधशालाओं का निर्माण हुआ। दो वर्ष के बाद डा॰ फौकनर, जो उत्तर भारत में चाय उत्पादन के प्रमुख थे, ने इन दो पौधशालाओं का निरीक्षण किया और जोर देकर एक छोटे चाय निर्माण करने वाली कारखानें की संस्तुति की। उनकी इस संस्तुति को सरकार ने स्वीकार कर लिया और कलकत्ता से चीन के प्रशिक्षित काश्तकार कुमाऊँ में भेजे गए। उनके पास चाय निर्माण के आधुनिक उपकरण भी थे। प्रशिक्षितों का यह दल 1842 में कुमाऊँ पहुँचा और छोटी मात्रा में चाय के उत्पादन में सफल रहे। डा. फौकनर इसका नमूना इंग्लैण्ड ले गए। जहाँ पर इस नमूने की बहुत प्रशंसा की गई और यह कहा गया कि इसकी गुणवत्ता आसाम में उत्पादित चाय से अधिक है और यह चीन से आयातित ओलोंग नाम से विख्यात चाय से साम्यता रखती है। धीरे-धीरे कुमाऊँ और गढ़वाल में चाय बागानों का निर्माण हुआ और यह आर्थिक प्रगति का एक महत्त्वपूर्ण श्रोत बन गया।
स्वतंत्रता के बाद कुमाऊँ में केवल तीन चाय बागान कार्यरत थे। दो चैकोड़ी और बेरीनाग के चाय बागान प्रसिद्ध दान सिंह मोहन सिंह परिवार के थे और तीसरा चम्पावत के चीरापानी में था। कई वर्षो की अनदेखी के बाद उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव और बाद में उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव डा. आर एस टोलिया और उत्तराखण्ड सेवा निधि ने कुमाऊँ में चाय उद्योग को कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के सहयोग से बढ़ावा दिया।
कुमाऊँ में उत्पादित चाय प्राकृतिक रूप से कार्बनिक है और इसे उपभोक्ता बाजार सुलभ है। इसके पियोकी फूल, कार्बनिक पाउडर स्वाद में विशिष्ट स्थान रखता है और भारत तथा विदेशों में चाय के शौकीनों द्वारा प्रशंसित किया जाता है। श्री दीपक रावत, IAS (जब वे कु॰म॰वि॰नि॰ के प्रबन्ध निदेशक थे) के अनुसार- निगम कार्बनिक चाय के उत्पादन के लिए प्रतिब( है, जो कुमाऊँ का हरा सोना है। अभी तक निगम को श्यामखेत, कौसानी और चम्पावत के कार्बनिक चाय बागान और पुराने चाय बागानों के पुनरूद्धार में सफलता प्राप्त हुई है। ये चाय बागान सफलता की सीढ़ी पर शनैः शनैः बढ रहे हैं और अपनी सुन्दरता और ईश्वरीय एकान्त की ओर पर्यटकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। कार्बनिक चाय की पत्तियाँ सबसे स्वच्छ चाय का प्याला प्रस्तुत करती है।
यह कृत्रिम रासायनिक अवशेषों से मुक्त होती है और वातावरण के संरक्षण में भी योगदान करती है। क्योंकि चाय की पत्तियाँ प्राकृतिक प्रदूषण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है और वातावरण से प्रदूषित करने वाले तत्वों को भी सोख सकती हैं। इनमें औषधीय गुण भी है। ये रोग प्रतिरोधक क्षमता के महत्वपूर्ण श्रोत हैं, जिससे हृदय घात के खतरे के साथ और कुछ विशेष प्रकार के कैंसर जैसे मुख, पैन्क्रियाज़ और प्रोस्टेट को कम किया जा सकता है। कैंसर विशेषज्ञ श्री आई.डी. पाटनी के अनुसार- कुमाऊँ में चाय उत्पादन महिला व पुरुषों को महत्वपूर्ण रोजगार का अवसर प्रदान करता है। जो पुरुष व महिला समाज के कमजोर वर्ग के हैं और जिन्हें अकुशल मजदूर समूह समझा जाता है। चाय उत्पादन को कम सीमित भूमि की आवश्यकता होती है। यह भूमि दूरवर्ती स्थानों के क्षेत्रों में होती है। इस प्रकार ग्रामीण उत्थान और विकास में यह महत्वपूर्ण योगदान करती है।