संस्कृति

कुमाऊँ की पारम्परिक जल व्यवस्था

कुमाऊँ की पारम्परिक जल व्यवस्था
डाॅ॰ रितेश साह, नैनीताल -
वसंतिक नवरात्र की समाप्ति के साथ ही ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा है। ग्रीष्म ऋतु के साथ ही जल से सबंधित समस्याओ में भी वृद्धि निश्चित है। अतः हमें अपने जल के साथ संबधो के निहितार्थ समझने आवश्यक है।
जल, जीवन का आधार ही नहीं वरन् सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन के अस्तित्व की सर्वप्रमुख शर्त भी है। जल प्रकृति का निःशुल्क उपहार है, धरा पर प्राणियों की उत्पत्ति इसके अस्तित्व से ही संभव हुई। जल की महत्ता को समझकर इसे जीवन नाम दिया गया। जल तथा जल उद्गम स्थली को श्रद्धा एवं पूज्यनीय स्वरूप प्रदान किया। इसको प्रदूषित करने को पाप की संज्ञा दी गयी। मानव सभ्यताएं प्रमुख प्राकृतिक जल-व्यवस्थाओं के समीप विकसित हुई हैं। कुमाऊँ में भी प्राचीन मानव बस्तियां प्रमुख नदी-घाटियों में ही स्थापित व विकसित हुई। जनसंख्या में वृद्धि व अन्य सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक कारणों के परिणामस्वरूप ये बस्तियां ऊँचाईयों की ओर बढ़ी लेकिन बसासत के लिए ऐसे क्षेत्रों को चुना गया जहां सदाबहार जलस्रोत पर्याप्तता में उपलब्ध थे। कुमाऊँ के पर्वतीय समुदायों ने सैकड़ों वर्षों के अंतराल में हिमालय के भूगोल व भूगर्भ के अनुरूप जलस्रोतों की प्रकृति का ज्ञान अर्जित किया और उसके अनुरूप जल संरक्षण हेतु लोक तकनीक विकसित की। मध्य हिमालय का भू-भाग अत्यधिक विविधतापूर्ण यहाँ जल की स्थिति अत्यन्त दुरूह है। अतः इसी भाग में जल संरक्षण की समृद्ध सांस्कृतिक व सामाजिक परम्पराएं पायी जाती है और जल संग्रह ढांचों में भी पर्याप्त विविधता पाई जाती है।
हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित एवं विकसित जल प्रबन्ध की परम्पराओं की उत्पत्ति स्थानीय परिस्थितिजन्य ज्ञान, परिवेश एवं उपलब्ध संसाधनों के अनुरुप की गयी, जिसमें उनकी भौगोलिक परिस्थिति को समझते हुए दूरदर्शिता अन्तर्निहित है। इसी दूरदर्शिता व परम्परा के पालन के कारण उनकी जल व्यवस्था वर्षों से क्षेत्र के निवासियों को संतृप्त करती आयी है। हमारे पूर्वजों ने इन जल सम्बन्धी व्यवस्थाओं के निर्माण एवं विकास में व्यवहारिक परिस्थितियां जो कि स्थानीय परिवेश एवं पर्यावरण के अनुकूल थी, को पूरी तरह ध्यान में रखा तथा उसे जन-जीवन के अन्तर्मन में गहराई तक प्रविष्ट कराने के लिये लोक मान्यताओं को विकसित किया तथा इसको धर्म, आध्यात्म और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। ये व्यवस्थायें आज भी उपयोगी तो हैं ही, साथ ही स्वदेशी परिस्थिति के अनुकूल तकनीक व परम्परागत जल प्रबन्धन की तारतम्यता को भी प्रदर्शित करती है।
कुमाऊँ में जल संचयन की जागृति प्राचीनकाल से ही रही है। जल के महत्व और उसके यथा स्थान उपयोग के लिये सुदृढ़ भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक विधियों की खोज लोगों ने कर ली थी। जल को संरक्षित करने के पीछे यहाॅ की दुर्गम भौगोलिक विषमता महत्वपूर्ण है, जल हर जगह सरलता से इस क्षेत्र में उपलब्ध नहीं है। इस कारण जल को संरक्षित कर इसे देवत्व स्वरुप प्रदान किया गया। इसके पीछे यहाॅ के निवासियो का वैज्ञानिक दृष्टिकोण निहित था कि जल का प्रयोेग यदि सरलता से करना है तो उसे धर्म से जोड़ना ही होगा, क्योकि धार्मिक आस्था के आधार पर जल का संरक्षण आसान था। जल की वर्तमान विश्वव्यापी चिंता को यहां के लोगों ने बहुत पहले ही समझ लिया था, यही कारण है कि जल संचय के लिये अलग-अलग परिस्थितियों में जल संरक्षण की संस्कृति को विकसित किया गया।
क्षेत्र में इस प्रकार की संरचनायें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। कई नौले यद्यपि अब जल उपलब्धता के मूल उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर रहे हैं किन्तु यह उनका नहीं, अपितु वर्तमान प्रबन्धनतंत्र का दोष है जिसने उनको उपेक्षा की कगार पर ला खड़ा किया है। अपनी भव्यता और ऐतिहासिकता में आज भी उनका कोई मुकाबला नहीं है। कुमाऊँ की सांस्कृतिक, भौगोलिक, पारिस्थितिक, पर्यावरणीय और सामाजिक स्थिति के अनुरूप राजवंशों ने भी उनको समुचित महत्व दिया। प्राचीन राजधानियों, गढ़ों और बसासतों में ये भव्य नौले बहुतायत में पाये जाते थे। कई प्रमुख नगरों व ग्रामांचलों में जब आधुनिक पेयजल व्यवस्था अक्षम हो जाती है तब पुराने नौले, धारे, स्रोत आज भी अपनी दयनीय स्थिति के बाद भी जलापूर्ति के विश्वसनीय साधन सिद्ध होते हैं।
कुमाऊँ क्षेत्र के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि यह भू-भाग जल से समपन्न है। यहां के निवासियों ने प्राचीनकाल से ही इस सम्पदा का प्रयोग अपनी भौगोलिक आवश्यकतानुसार किया है। प्राचीन राजवंशों, ब्रिटिश शासन से लेकर स्वाधीनता तक यहां के निवासियों ने अपनी जल आवश्यकताओं के अनुरूप जल प्रबन्धन किया और यही प्रबन्धन परम्परा के रूप में परिपोषित हुआ जिसने क्षेत्र के निवासियों को जल संकट से दूर रखा। वहीं दूसरी ओर वनों का भी जल संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वृक्ष मिट्टी तो बांधे रहते ही है, साथ ही जल का पुनर्भरण भी करते हैं और क्षेत्र को जल से परिपूरित भी करते हैं। वर्तमान में तेजी से कम होते जंगलों ने जल संकट को गम्भीर कर दिया है। बदलते परिवेश में कटते जंगल, घटती वन सम्पदा, जनसंख्या वृद्धि व नवीन साधनों का प्रयोग करने के कारण हम अपनी परम्पराओं से दूर होते चले गये, किन्तु आज भी जल प्रबन्धन की पुरातन परम्परा भौगोलिक विशिष्टताओं से भरे कुमाऊँ भू-भाग की जन सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हैं। अतः आवश्यकता है कि हम अपनी समृद्ध परम्परागत जल परम्पराओं को विस्तृत न कर वर्तमान के साथ उसका तारतम्य बैठाकर जल संकट का सशक्त रूप से सामना करें।
यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि समय रहते सिकुड़ते स्वच्छ जल के स्रोतों पर ध्यान नहीं दिया गया तो तेजी से गिरती प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता के कारण एक महासंकट उत्पन्न होगा, चूंकि जल सभी की आवश्यकता है और इसकी कमी से सम्पूर्ण जीवन चक्र प्रभावित होगा। अतः जल के प्रबन्धन, नियोजन एवं उपयोग में सभी का सक्रिय योगदान अनिवार्य है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जल जीवन का आधार है। जल प्रबन्धन के लिये दो बातें प्रमुख रूप से महत्वपूर्ण हैंः- जल संरक्षण व स्वच्छ जल उपलब्धता, यही कारण है कि जल प्रबन्धन करना इस सदी की सबसे बड़ी समसामयिक आवश्यकता के रूप में उभरी है। कुमाऊँ क्षेत्र जो जल सम्पदा से परिपूर्ण है वहां उपलब्ध जल को सुरक्षित कर, उसे प्रदूषण मुक्त रखना व उसका उचित प्रबन्धन करना हम सबका सामूहिक दायित्व है।
कुमाऊँ की जल प्रबन्धन की व्यवस्था यहां की संस्कृति कला और इतिहास का ही बोध नहीं करती है वरन् यह उसके लिये दूरदर्शी विचार, समझ व कार्य पद्धति को भी प्रदर्शित करती है। वर्तमान जल व्यवस्था जहां कुछ ही वर्षों में अकर्मण्य सिद्ध हो रही है, वहीं ये प्राचीन जल प्रबन्ध की व्यवस्था जलापूर्ति के साथ-साथ यहां की संस्कृति को भी जीवंत रख अपने अभीष्ट पूर्ति में भी समक्ष सिद्ध हुई है। वर्तमान में इनकी उपेक्षा अवश्य हो रही है लेकिन इनकी उपयोगिता में अब तक कोई कमी नहीं आयी है। अतः आज आवश्यकता है कि कुमाऊँ की इस जल प्रबन्धन की संस्कृति को ना सिर्फ सुरक्षित रखा जाय बल्कि इसका संरक्षण व विकास भी जन आदोंलन के रूप में किया जाय जिससे कि भविष्य की पीढि़यों को जल तथा जल संस्कृति की आपूर्ति निरन्तर व निर्बाध होते रहे। कुमाऊँ के जल स्रोतों पर निर्मित संरचनाएं ऐतिहासिक, पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, वहीं इनका जल वितरण एक परम्परा को पोषित करता आ रहा है। ये सभी स्रोत, जल संरचनाएं, इतिहास की दृष्टि से आधुनिक समाज के लिए परम्परा का गौरवपूर्ण हस्तान्तरण है।