संस्कृति

कुमाऊँ में सूर्य उपासना

प्रो॰ अजय सिंह रावत,
नैनीताल -

भारत में सूर्य की उपासना अनादिकाल से अक्षय ऊर्जा के श्रोत के रूप में प्रचलित है और वेदों में इसे अक्षय ऊर्जा और तेज के भंडारग्रह के रूप में प्रदर्शित किया गया है। वैदिक साहित्य में असंख्य ऋचाएं भगवान सूर्य को देवीय गुणों के दिव्य शरीर और ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण जीवन के जन्म और रक्षक के रूप में समर्पित किया गया है।
भगवान सूर्य की प्रशंसा में एक महत्वपूर्ण वैदिक ऋचाओं का ग्रन्थ ‘सूर्य उपनिसद्’ है। सूर्य उपासना का उल्लेख पुराणों मेें तथा अन्य शास्त्रों में भी है। समय के अन्तराल में सूर्य उपासना और महत्वपूर्ण हो गई तथा सातवीं शताब्दी A.D. में सम्राट हर्षवर्धन के राजदरबार के प्रतिभाशाली विद्वान ‘मयूर’ ने भगवान सूर्य की प्रशंसा में ‘सूर्य शतकम’ की रचना की और ऐसा विश्वास किया जाता है कि इन ऋचाओं के पाठन से उनके अन्धत्व का निराकरण हुआ।
आचार्य के. सी. सुयाल के अनुसार युर्जवेद में यह उल्लेख किया गया है कि हिमालयी क्षेत्र में सूर्य उपासना यहाँ की विकट जलवायु के कारण और महत्वपूर्ण हो गई। कुमाऊँ में भी अनादिकाल से सूर्य उपासना प्रचलित है और यह विश्वास किया जाता है कि शीत ऋतु में सूर्याेदय में उदित सूर्य को जल अर्पित करना मानव के स्वास्थ और ऊर्जा के लिए बहुत लाभदायक है। जिससे मानव शरीर शीत ऋतु से अपनी सुरक्षा कर सके। इस ऋतु में सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से अपनी गति को परिवर्तित करता है और यह क्षेत्र शीत ऋतु से प्रभावित हो जाता है। इसलिए यह परम्परागत है कि भगवान् सूर्य को जाग्रत किया जाय और गायत्री मन्त्र का जाप शीत से बचाव के लिए आवश्यक हो जाता है।
कुमाऊँ में सूर्य की उपासना का प्रचलन पांचवी-छठी शताब्दी A.D. में तालेश्वर के ताम्रपत्र के दान पत्र से अनुमानित किया जाता है। इस दान पत्र में भगवान् सूर्य के ब्रह्मांड को जीवन प्रदान करने वाले दिव्य गुणों का उल्लेख किया गया है और यह भी उल्लेख किया गया है कि भगवान् सूर्य की उपासना सम्पूर्ण वर्ष भर और विशेष कर शिशिर ऋतु मंे करने का प्रावधान भी है। प्रो. के. पी. नौटियाल के अनुसार कुमाऊँ के कत्यूरी और चन्द राजाओं ने सूर्य की उपासना पर अधिक बल दिया और इसका प्रमाण उत्तराखण्ड में उनके द्वारा निर्मित भगवान् सूर्य की अनेक मूर्तियाँ और स्मारक हैं। सम्पूर्ण कुमाऊँ और गढ़वाल में भगवान सूर्य को समर्पित अस्सी सूर्य प्रतिमाएं हैं और अनेक सूर्य मंदिर हैं। कुमाऊँ में परम्परागत रूप से भगवान् सूर्य को नित्य प्रकाशित आत्मिक तेज का भौतिक अवशेष माना जाता है। यही आत्मिक प्रकाश व्यक्ति की पहचान का प्रतीक है। यही प्रकाश जीवन की जटिलताओं को समाप्त करने की शक्ति है। यदि वह अपने अन्तरात्मा की आत्मिक प्रकाश का अनुभव कर सके।
एक स्थानीय इतिहासकार रितेश साह के अनुसार कुमाऊँ में मध्यकाल से ही सूर्य उपासना, सूर्य प्रतिमाओं के रूप में बहुत लोकप्रिय हो गई थी और इसका प्रमाण जागेश्वर, द्वारहाट, बैजनाथ, कटारमल और दन्या में उत्कृष्ट रूप में संरक्षित सूर्य प्रतिमाएं हैं। इस क्षेत्र में उत्तरी भारत की तरह सूर्य प्रतिमाओं की शैली मंे ईरानी प्रभाव है। इस काल की सूर्य प्रतिमाआंे में ईरानी शैली के अनुसार नुकिली टोपी, खुले बिना बाहों के घुटनों तक लम्बा लबादा के रूप में कोट और पैरों में ऊँचा बूंट (उपानह) दिखाया गया है। तथापि दक्षिण की मूर्तियां पवित्र व विशुद्ध भारतीय शैली में ही निर्मित की गई। उनका ईरानी तत्वों का समावेश नहीं है। प्राचीन भारत का पुरातात्विक आधार पर अल्मोड़ा जिले का ‘कटारमल’ मन्दिर सबसे उत्कृष्ठ मन्दिर है। समय और काल के कारण मंदिर को काफी क्षति पहुंची लेकिन अभी भी इसका मौलिक रूप विद्यमान है। कटारमल के मुख्य मन्दिर के समीप सातवीं तथा आठवीं शताब्दी A.D. के 50 मन्दिरों का एक समूह और विद्यमान है। ऐसा कहा जाता है कि कटारमल के सूर्य मन्दिर के लकड़ी के काष्ठ शिल्प के दरवाजे सुरक्षा की दृष्टि से नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित किए गए हैं। यह कुमाऊँ के काष्ठशिल्प के अद्भुत प्रतीक हैं। राष्ट्रीय संग्रहालय में भगवान सूर्य की प्रतिमा और कटारमल के पवन राजा की मूर्ति को भी संरक्षित किया गया है। जिसे अमेरिका में एक बार तस्करों द्वारा ले जाया गया था। यह मूर्ति इस युग के धातु शिल्प का अद्भुत प्रतीक है। जिसे आठ धातुओं के मिश्रण से निर्मित किया गया था। इस मंदिर के गर्भ का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि सूर्य की पहली किरण इसको प्रकाशित करती है। कटारमल मन्दिर की एक विशेषता यह है कि मन्दिर के गर्म ग्रह के ऊपर एक कक्ष और है जो पूर्ण रूप से अन्धकारमय है। सोलंकी वंश के राजाओं द्वारा निर्मित गुजरात राजपुताना और ग्वालियर के ‘सास बहू’ मन्दिर से इसकी अनोखी साम्यता है। इस मन्दिर का शिखर और झुकाव 15.5 मीटर है। सीढ़ी पर निर्मित कलात्मक शैली मेें इस मुख्य ढांचे का निर्माण किया गया है और कई चैड़े क्षेतिज खण्ड अन्त तक पाये जाते हैं। कटारमल में इतिहास पत्थरों में अंकित है। लेकिन दुर्भाग्य से प्राचीन अतीत के पुरातात्विक सुन्दरता का प्रतीक, पयर्टन व्यवसाय के लिए उचित प्रचार के अभाव में अच्छी यात्रा के लिए यात्रा मार्ग का अभाव लोगों का विध्वंश्यत्मक प्रकृति और उदासीनता के कारण वंचित है। इस पुरातात्विक महत्व के प्रचीन अवशेष को प्रकाशित करने के लिए सकारात्मक सोच और उचित प्रचार साधनों का होना नितान्त आवश्यक है। इन कारणों से अतीत का पुरातात्विक सुन्दरता का भव्य प्रतीक आज विस्मिृत धूमिल और नगण्यता की कालधाराएं प्रवाहित हो रहा है।

 

अंधत्व निवारण हेतु यजुर्वेद में वर्णित चाक्षुषोपनिषद्
कृष्णयजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद्
अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिर्गायत्रीचछन्दः सूर्यो देवता चक्षुरोग-निवृत्तये विनियोगः।
चक्षुश्चक्षुश्चक्षस्तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि त्व्रितं चक्षूरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय । यथा अहमन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय कल्याणं कुरु कुरु। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधक- दुष्कृतानि तानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय।
नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। नमः करुणाकरायामृताय। नमः सूर्याय। नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमयेति। उष्णो भगवा´छुचिरूपः। हसो भगवान् शुचिरप्रविरूपः। नमो भगवते अदित्याय अहोवाहिना स्वाहा। विश्वरूप घृणिं तं जातवेदसं, हिरण्मयं पुरुषं ज्योतीरूपं तपन्तं। विश्वस्य योनिं प्रतिपन्तं महान।। पुरः प्रजानामुदत्येष सूर्यः।