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कृषि में श्रीधान विधि अपनाकर श्रीगणेश करें

कृषि में श्रीधान विधि अपनाकर श्रीगणेश करें
मनुज पाण्डे, देहरादून -

उत्तराखण्ड राज्य में 70 प्रतिशत जनसँख्या के लिए कृषि ही आजीविका का मूलभूत स्रोत है, पर सोचने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र का योगदान सकल घरेलू उत्पाद में केवल 37.5 है। फलस्वरूप, यह लोगों के लिए पर्याप्त आय का स्तर प्रदान नहीं कर पाता। कम होने को जलवायु परिवर्तन की समस्या मानवजाति को ऐसे जकड़े हुए है मानो अथक परिश्रम और नयी-नयी तकिनीकियां अपनाये बिना नहीं छूटेगा। जहाँ एक तरफ अनियमित वर्षा पानी की कमी बढ़ा रही है वहीं मौसम अपनी पुरानी रंगत-संगत से दूर होता चला जा रहा है। ऐसे में आवश्यक है, खासकर छोटे किसानों के लिए की नयी तकनीक का उपयोग कर अपनी सेहत ही नहीं वरन् खाद्य सुरक्षा को प्रबल बना सकें। ऐसी ही एक तकनीक (विधि) का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ जिसमें उदहारण के लिए धान का उपयोग किया गया है पर सिद्धान्तः हम दूसरी फसलों में भी इसे उपयोग में ला सकते हैं। अगर मैं दनिन्दिनी भाषा में कहूँ तो यह पद्यति कुछ ऐसी है कि ”अगर एक जगह पर भीड़ इकठ्ठा कर दें तो वहाँ उपस्थित सभी जनों को साँस लेने और रहने में दिक्कत होगी, पर अगर उन्हें व्यवस्थित तरीके समान दूरी से एक-एक करके बैठायें तो उन्हें दिक्कत कतई नहीं आएगी“।

ऐसी ही कृषि में की जाने वाली एक विधि की शुरुआत फ्रांसीसी पादरी फादर हेनरी डे लाडलानी द्वारा 1980 के दशक में मेडागास्कर में की गई। मेडागास्कर, अफ्रीका के दक्षिण पूर्वी तट पर एक विशाल द्वीप राष्ट्र है, जहाँ 15 वर्षों तक इस विधि की प्रमाणिकता पर जांच एवं प्रयोग हुए। विधि का नाम सिस्टम आॅफ राइस इन्टेंसिफिकेशन यानी धान सघनीकरण विधि (एसआरआई) रखा गया। इस विधि को अपनाकर हम वर्तमान में धान में हो रहे पानी की मात्रा को कम से कम उपयोग में ला सकते हैं। अमूमन ऐसा माना जाता है कि धान की उपज के लिए अधिक पानी और अच्छी फसल के लिए खेत में पानी से लबालब भर कर रखना अनिवार्य होता है। जबकि नये अनुसंधान कहते हैं कि परम्परागत विधि में फसलों की जड़ें हवा की पर्याप्त मात्रा न मिलने से बालियों के निकलने तक जीर्णशीर्ण पड़ जाती हैं जिससे कभी-कभी फसल हवा से गिर जाती है और उत्पादन कम हो जाता है।

इस विधि से खेत में पानी नहीं रहने पर और मिट्टी में वायु का संचार होने से फसलों की जड़ों में बढ़ोत्तरी अधिक होती है क्यूंकि अब वो अच्छी तरीके से साँस ले सकते हैं। अरे यह तो ज्ञात ही है ना कि पौधों में भी जीवन होता है। इससे फसलों का अच्छा विकास होता है और उत्पादन पर सकारात्मक एवं प्रबल प्रभाव पड़ता है।

उत्तराखण्ड जहाँ की भूमि क्षेत्र का 64.79 प्रतिशत वन क्षेत्र के अंतर्गत और लगभग 14 प्रतिशत क्षेत्र ;जिसमें से 80 प्रतिशत वर्षा आधारित और सिर्फ 20 प्रतिशत सिंचित हैद्ध कृषि के अंतर्गत आता है। ऐसे में अनियमित वर्षा और पहाड़ों में पानी की कमी को देखते हुए इस विधि की उपयोगिता अपने आप ही बढ़ जाती है । जिससे किसान कम पानी से भी अधिक धान का उत्पादन कर सकते हैं। एक महत्वपूर्ण बात, खासकर पहाड़ में छोटे किसानों के लिए यह है की इसमें कम बीज व कम पानी की जरूरत पड़ती है। तथा रासायनिक खादों व कीटनाशकों के स्थान पर जैविक खाद और जैविक तरीकों से कीट पर सफल नियंत्रण हो सकता है। बात पते की यह भी है कि जैविक तरीकों से भूमि की उत्पादकता में वृद्धि तथा उत्पादित अनाज स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होता है। इससे उत्पादन व किसान की आय में बढ़ोत्तरी होती है।

परम्परागत विधि की तुलना में इस विधि से उत्पादन में कम से कम डेढ़ से दो गुना तक वृद्धि होती हुई देखी गयी है। उसका कारण प्रति पौधे पर कल्लों की ज्यादा संख्या, बालियों की ज्यादा लम्बाई तथा दानों की संख्या और वजन ज्यादा होना है। अगर इसके सिद्धांतो को समझें और अमल में लायें तो परिश्रम के फल को मीठा होने से कोई नहीं रोक सकता। जानने वाली कुछ निम्न बातें इस प्रकार हैं कि इसमें -

कम बीज की आवश्यकता - नर्सरी में बीज से बीज को अधिक और एक समान दूरी पर बोया जाता है जिससे बीज की लागत कम होती है
कम पानी की आवश्यकता - इस विधि में खेत को पानी से लबालब भरकर नहीं रखा जाता। जबकि कभी सूखा - कभी गीला रखा जाता है।
कम उम्र और समान दूरी पर पौधों की रोपाई - 8 से 12 दिन (2-3 पत्ते) के पौधों का रोपण कम गहराई पर किया जाता है जिससे पौधों में जड़ें व नये कल्ले अधिक संख्या तथा कम समय में निकलें और पैदावार अधिक हो। इस विधि में दो पौधों के बीच की दूरी कम से कम 25 से.मी. (अधिकतम 50 से.मी.) होने से सूर्य का प्रकाश प्रत्येक पौधें तक आसानी से पहुँच जाता है जिससे उनमें जल, जमीन और जीवन के लिए खींचातानी नहीं होती। वस्तुतः जड़ें पर्याप्त रूप से फैलती हैं जिससे उन्हें ज्यादा पोषक तत्व प्राप्त एवं उनमें अधिक उत्पादन होता है।
खरपतवार को मिट्टी में मिलाना - निराई करने पर खरपतवार खाद में बदल जाती है एवं फसलों के लिए पोषण का काम करती है। निराई की प्रक्रिया से जड़ों में हवा का संचार ज्यादा होता है जिससे वह तेजी से फैलती हैं। निराई करने के लिए वीडर को प्रयोग में लाया जा सकता है।
जैविक खाद का उपयोग - जैविक खाद के प्रयोग से भूमि में हवा का संचार एवं सूक्ष्म साथी जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है जो पौधों के विकास में मदद करती है। अधिक एवं समान दूरी पर लगने से सूर्य का प्रकाश व हवा के उचित मात्रा में मिलने से रोग व कीटों का प्रकोप कम होता है। इसके बावजूद यदि रोग व कीटों का प्रकोप होता है तो जैविक पद्यति के द्वारा उसका निदान किया जा सकता है।

भारत के बहुत से क्षेत्रों में इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है। और यह कहते और सुनते मुँह और कान नहीं थकते की इस बेजोड़ किसानुपयोगी तकनीक का कोई सानी नहीं है। तो फिर देर किस बात की, आओ क्यों न हम अपना आज और कल बदलें तथा इस विधि से श्रीगणेश कर खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित करें।