अपना शहर

केमोमिला के फूल और बाज़ार में ठहरी जि़ंदगी

राजशेखर पंत, नैनीताल -

इस साल गर्मियों के मौसम में हो रही अनचाही बरसात और कोहरे के बाद अचानक खिली धूप बहुत सुन्दर लग रही है। दो तीन दिन लगातार हुई बारिश के बाद आसमान उस दिन भी एकदम साफ था। सुबह असेंबली हाॅल से निकलते ही बाँज के उस बुजुर्ग पेड़ के नीचे बेतहाशा खिले हुए, वाइल्ड डेज़ी और केमोमिला के फूलों के पीछे, नयी उगी हरी कोपलों पर धूप का एक टुकड़ा ठहर सा गया था- नींद में खोये किसी बच्चे के होठों पर अचानक ही बेवज़ह आयी मुस्कान की तरह। जंग लगे हुए लोहे के बदसूरत खम्बों पर बेतरतीब झूलते कंटीले तारों से घिरे होने और ताजा तोड़े गए प्लास्टर के आड़े-तिरछे टुकड़ों के आस-पास यूँ ही बिखरे रहने के बावजूद एक खूबसूरत फ्रेम था यह।

सफाई के नाम पर अक्सर इन फूलों की ”अनचाही गन्दगी“ को लचीले तारों को आपस में गूंथ कर बनायीं गयी चाबुकनुमा शक्ल से पीट-पीट कर गिरा दिया जाता है- उन दीवारों को जिन पर ये उग आते हैं, तार के ब्रश से रगड़ कर साफ करने के बाद रंग दिया जाता है, चूने या किसी और रंग से- हमारे सौंदर्यबोध को एक नए ढंग से परिभाषित करने का प्रयास है यह।

90 के दशक से धीरे-धीरे पैर पसारने वाले बाज़ारवाद ने शायद बहुत बदल दिया है हमें। हमारी ज़रूरतों पर ही नहीं, शायद हमारे दृष्टिकोण, हमारे नज़रिए, पर भी बाज़ार कहीं न कहीं काबिज़ है, कंडीशन कर रहा है हमें- दस, पंद्रह, बीस या फिर पच्चीस लाख की सीडान या स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल लेकर हिल स्टेशन में छुट्टियाँ बिताने के लिए आने वाले पर्यटक के चेतन मन के लिए हाॅट मिक्स सड़क पर ”मछ्ली की तरह तैरती गाड़ी“, उसकी ”लेदर अपहोलेस्ट्री“, पाॅवर स्टीयरिंग से ”मक्खन की तरह कटते मोड़“, वाइब्रेशन लेस ए सी या फिर ”120 की स्पीड में भी कुछ पता नहीं चलना“ जैसी चीजें ज्यादा अहम, ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय गाड़ी के बंद शीशों के बाहर विपरीत दिशा में तेजी से धकियाये जा रहे किसी पहाड़ी झरने, गुजरी सदियों के साक्षी रहे किसी पुराने देवदार या फिर फूलों से लदे बुरांश के वृक्ष जैसी ”फालतू“ चीजों के- यहाँ तक कि फेसबुक वाल पर ”होलिडेयिंग इन हिल्स“ जैसे सोचे-समझे कैप्शन के साथ चिपकाई जाने वाली तस्वीरों में भी पहाड़ का कोई खूबसूरत एंगल भले ही गायब हो, पर गाड़ी, नैनीताल के फ्लैट्स से सौविनीर की तरह खरीदा कोई सस्ता सा हैट, स्वीट काॅर्न का ग्लास या फिर आइसक्रीम के कोन की दमदार उपस्थिति जरूर दर्ज मिलती है-
गौर फरमाइयेगा कभी उन लोगों के जन्म दिन इत्यादि पर जो हमारे करीबी हैं या फिर टीचर-स्टूडेंट सरीखे कुछ ऐसे रिश्तों के मामले में-जहाँ सम्मान, प्यार, आशीर्वाद, शुभकामनाओं इत्यादि का रस्मी आदान-प्रदान कभी कभी जरूरी हो जाता है - अब आपको संभावित रूप से बची-खुची भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए शब्द तलाशने की जरूरत नहीं है- आर्ची शौपी में मिलने वाले कार्ड या आपके स्मार्ट फोन का कोई एप सहज ही सब कुछ उपलब्ध करा देगा- इन्टरनेट की बुनियाद पर खड़ा किया हुआ वर्चुअल वर्ल्ड या आभासी संसार एक सामानांतर दुनिया गढ़ रहा है हमारे अन्दर और हम शायद अपने आस-पास की दुनिया से कटते चले जा रहे हैं- फेसबुकिया तस्वीरों पर मिले हुए ‘लाइक्स’ या कमेंट्स अब हमारी ‘सेल्फ इमेज’ को गढ़ते हैं और लगातार बढ़ता हुआ ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’ का दायरा या फालोअर्स की संख्या निर्धारित करती है पाॅपुलैरिटी के पैमाने पर हमारे द्वारा हासिल की गयी उस ऊंचाई को जहाँ वक्त पड़ने पर हमें अपना कहलाने वाला कोइ ऐसा कन्धा कभी नसीब नहीं होता जिस पर सर टिका कर सुस्ताया जा सके, रोया जा सके- फेसबुक की निर्जीव दीवार के लिए अलग-अलग एंगल्स से सेल्फी खींच कर कमेंट्स का इंतजार करने वाली यह पीढ़ी क्या जिन्दगी की वास्तविकताओं का सामना एक सुलझे हुए, चिंतन शील युवा की तरह कर पायेंगी? पता नहीं-
याद आते हैं बचपन के वो दिन जब शार्पनर से तराशी हुई पेंसिलों के छोटे छोटे टुकड़ों को हम किसी बेकार हो चुकी पेन की बाॅडी में फंसा कर अंत तक इस्तेमाल किया करते थे- अगली कक्षा में प्रमोट हो जाने पर हमारी किताबें, ज्योमेट्री बाॅक्स, यूनिफार्म का कोट, कमीजें वगैरा छोटे भाई बहिनों या पड़ोसियों के काम आया करती थीं- दाढ़ी बनाने के बाद बार बार चमड़े की पट्टी में रगड़ने के बावजूद भोथरे हो चुके शेविंग ब्लेड को घर में प्रायः पेंसिल छीलने, काटने काटने या ऐसे ही किसी अन्य काम के लिए उपयोग में लाया जाता था- आज डिस्पोजेबल कल्चर हमारी जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन गया है- रेजर या टार्च जैसे चीजों से लेकर कटलरी तक सब कुछ यूज एंड थ्रो के बढ़ते दायरे में सिमट गया है- इंसानी रिश्तों की कहानी भी तो अब कमोबेश कुछ ऐसी ही है- अमेरिका की सिलिकाॅन वैली या मिशिगन में सेटल्ड बेटे के लिए हल्द्वानी जैसे कस्बे में अपना रिटायर्ड जीवन बिता रहे माँ बाप के लिए भरपूर पैसा भेज देना ही पित्र ऋण की सफलतम और आदर्श अदायगी है- पैसा ही तो है आज की तारीख में जिन्दा रहने का सबसे महत्वपूर्ण और अपरिहार्य आधार- दीवाली-दशहरे के मौसम में बूढ़े माँ बाप अपने बड़े से घर की रंगे-पुताई करा कर अगर बेटे बहू, नाती पोतों का इंतजार कर रहे हों तो यह सब उनकी सेंटीमेंटल स्टूपीडीटी है- कोई महत्व है भला इसका आज की ‘बी प्रैक्टिकल’ वाली दुनिया में--- कभी कभी सोचता हूँ की क्या यह जरूरी है कि खुशियों की, उत्साह की, स्पंदन की किसी वजह को जिन्दगी में तलाशा जाये?--- इंतजार किया जाये उसका- हम क्यों इसलिये खुश नहीं हो सकते कि दिनभर की भटकन के बाद पक्षी अपने नीड़ों की ओर लौट रहे हैं- डूबता सूरज वादा कर रहा है कि एक उदास शाम के बाद कल सुबह वह फिर आयेगा या फिर शिशिर की ठिठुरन में अनायास ही गिर गए चिनार के पत्ते किसी नवजात शिशु के गालों की लालिमा लिए हुए दोबारा उगेंगे---
केमोमिला और वाइल्ड डेजी के रंग बिरंगे फूल सुबह की हवा में झूल रहे हैं--- इधर उधर धूम कर निर्दयी से दिखने वाले कंटीले तारों और प्लास्टर के बदसूरत टुकड़ों के विरोधाभास को फ्रेम से हटा कर एक तस्वीर लेने के मेरे प्रयासों से पूरी तरह तटस्थ और निर्विकार- बटे हुए तारों के चाबुक से पिट कर, लोहे के बालों वाले ब्रश की रगड़न को झेल कर चूने या किसी और रंग की मोटी परत से ढक जाना ही नियति है इनकी- पर मैं जानता हूँ अगले वर्ष गर्मियों के मौसम में यह फिर खिलेंगे- इसी तरह---- असेंबली हाॅल की मोटी शहतीर पर किसी ने सफेद पेंट से खूबसूरत अक्षरों में लिखा है- स्व धर्मे निधनं श्रेयः- मुझे नहीं मालूम इन शब्दों को यहाँ लिखने वाले और इन्हें लिखवाने वाले ने महज चंद कदमों की दूरी पर हर साल बेवजह उगने वाले डेजी और केमोमिला के फूलों को कभी ध्यान से देखा होगा या नहीं-