विचार विमर्श

कैपीटौल के बहाने भाग 1

कैपीटौल के बहाने
गंगा प्रसाद साह-
समय आवश्यकता के अनुसार सब कुछ करवाता है। देश गुलाम था नैनीताल की सुन्दरता व मौसम अंगे्रजों को भा गया। उन्होंने इसे अपने लिये उपयुक्त स्थान पाया और 1841 से इसे एक शहर का स्वरूप देने की प्रकिया प्रारम्भ कर दी। वाॅलरूम डान्स उनकी संस्कृति  का एक अंग था लेकिन यहाँ उसके लिये कोई उपयुक्त स्थान नहीं था इसलिए अंगे्रजों ने यहाँ की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए शहर के पश्चिमी किनारे के पास के स्थान को उपयुक्त पाया और बाॅलरूम डान्स के लिये डान्स हाॅल (नाचघर) के निर्माण की योजना बनाई ताकि वह अपनी मैमो (पत्नियों) को खुश रख सकें और भारत में भी इंग्लैण्ड की भाँति नृत्य का आनन्द ले सकें और नाचघर के निर्माण की योजना बनाई, यह बात लगभग 1865 की होगी। अंग्रेजों को यह भवन बहुत भाया और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग किया। दिनभर काम में वयस्त रहकर सन्ध्या को यहां रौनक बनी रहती थी। बात उस समय की थी जब झील के पश्चिमी किनारे के सामने तब खेल के मैदान में जीमखाना क्लब का एक छोटा व सुन्दर लकड़ी का पैैवीलियन था उसके सामने घास का मैदान। इस मैदान में अंगे्रज हाॅकी, क्रिकेट, फुटबाॅल का भी आनन्द लिया करते थे। शहर में सड़कों का निर्माण हो रहा था। शहर की पहाडि़यों में वृक्ष हरियाली बिखेर रहे थे जो यहाँ की सुन्दरता पर चार चाँद लगा रहे थे किन्तु समय को यह सब अच्छा नहीं लगा और वर्ष 1880 में शेर-का-डांडा की पहाड़ी में अब तक का सबसे बड़ा भू-स्खलन हुआ। परिणामस्वरूप नाचघर जिसे बड़े प्यार और अरमान से अंगे्रजों ने बनवाया था वह भू-स्खलन की चपेट में आया और मलुवा आने के कारण भवन नष्ट हो गया।
इस हादसे में 43 योरोपियन और 108 भारतीयों की मृत्यु हो गई। शहर को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिये अंग्रेजों द्वारा नगर पालिका की स्थापना की जा चुकी थी। इस हादसे पर पालिका ने विचार-विमर्श कर निर्णय लिया कि प्राकृतिक  आपदा के कारण भारी नुकसान हुआ साथ में जनहानि भी हुई जिसे रोका नहीं जा सकता था। क्या इस हानि से शहर को किसी प्रकार का फायदा दिया जा सकता है। गम्भीर मंत्रणा के बाद निर्णय लिया गया कि शहर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए तथा भविष्य में विनाशकारी भू-स्खलनों को रोकने के लिये ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया जा ताकि भविष्य में शहर में होने वाली दुर्घटनाओं को पूर्णतया रोका जाय। दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय यह भी लिया गया कि खेल के मैदान को बड़ा किया जाय। तत्कालीन पालिका ने इस दोनों निर्णयों को साकार रूप भी प्रदान किया जिसका परिणाम आप और हम 131 वर्षाें बाद भी सुरक्षित नैनीताल देख रहे हैं। यहाँ पर यह बीते हुए वर्ष एक बड़ा प्रश्न भी छोड़ रहे हैं कि अंगे्रजों द्वारा जो 62 बड़े नाले व उन नालों में मिलने वाली छोटी नालियों का निर्माण करवाया जिनकी लम्बाई कोे जोड़ा जाय तो वह एक लाख छः हजार चार सौ नियानब्बे (1,06,499) फीट है। उनकी सुरक्षा के लिए हम और आप क्या कर रहे हैं? क्या अंगे्रजों द्वारा शहर के सुरक्षा कवच के रूप में जो ड्रेनेज सिस्टम हमें सौगात के रूप में मिले हैं क्या हम उनके समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं या 1880 की त्रासदी का इन्तजार?
अंगे्रजों ने तथा तत्कालीन नगरपालिका ने तब प्राकृतिक विपदाओं को रोकने के लिए सुरक्षात्मक उपाय किये जिसके कारण शहर अपने अस्तित्व को आज भी बचाये हुए है। आज हमारा प्रशासन तथा सम्बन्धित विभाग क्या कर रहे हैं? अभी भी समय है इसके लिये योजना बनाई जाये, नालों की दशा ठीक की जाये। लेकिन कोई ऐसी योजना बनाना तो दूर की बात है सोच भी नहीं है। इसके लिये शहर को अपना समझने वालों को जगाना होगा अन्यथा यह शहर इतिहास के गर्त में समा जाएगा।
नाचघर के नष्ट होने के बाद तत्कालीन नगरपालिका ने इसी स्थान पर 1882 में एसेम्बली हाॅल का निर्माण करवाया। इसी एसेम्बली रूम को कुछ समय तक नगरपालिका के सभा कक्ष के रूप में इस्तेमाल किया गया। सभासदों ने शहर के चहुँमुखी विकास के अनेक प्रस्ताव यहाँ पारित किये। 28 अप्रैल 1929 की रात्रि भवन के प्रथम तल में यहाँ बटलर एण्ड कम्पनी जो तालब की ओर था। उनके आवास में  आग लग गई। इस समय तक शहर में आग बुझाने का कोई प्रबन्ध नहीं था। भवन के इस भाग में श्री एवं श्रीमती बटलर और उनकी पोती फिलिप्स रहा करती थीं। जनता के प्रयासों से फिलिप्स को तो किसी तरह बचा लिया गया लेकिन श्रीमती बटलर को आग की उन भयानक लपटों ने लील लिया। मि. बटलर ऊपर बालकोनी से गिर गये और गम्भीर रूप से घायल हो गये। इस आग में सभी किरायेदारों का सामान अग्नि की भेंट चढ़ गया। भवन के नुकसान को जीवन बीमा प्रमाण पत्रों के अनुसार 30,000 रूपया आंका गया जबकि उस समय के मूल्यानुसार 75,000 रूपये से कम न होगा।