संस्कृति

कैलास मानसरोवर यात्रा

कैलास मानसरोवर यात्रा
भगवान शंकर का आवास स्थल
दिनेश लोहनी, नैनीताल -
भगवान शंकर के आवास स्थल के रूप में मान्य पवित्र कैलास मानसरोवर का देवस्थलीय महत्च भारतीय आस्था व लोकों में वैदिक काल से ही रहा है। पौराणिक साहित्य में अनेक देवताओं एवं मुनियों के द्वारा यहाँ की यात्राओं का वर्णन मिलता है। माना जाता है कि मानसरोवर अथवा राक्षसताल को  कठोरतम करके रावण ने दिग्विजय होने का वरदान प्राप्त किया था। भारतीय तप साधकों की यह दुर्गम कैलास यात्रा पिछले युगों से ही अविच्छिन रूप में चलती रही है। मध्य युग में यह परम्परा बराबर बनी रही है। आधुनिक युग से आचिर पूर्व तक भी संगठित रूप में की जाने वाली उत्तराखण्ड के चार धामों यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ यात्राओं के अतिरिक्त कैलास मानसरोवर यात्रा का अपना पृथक ही महत्व रहा है।

भारतीय हिमालय के उस पार प्रिविष्ट (तिब्बत) क्षेत्र में स्थित यह क्षेत्र पहले भारत की उत्तरी सीमा के अन्र्तगत ही परिगणित होता था तथा तीर्थयात्री उत्तराखंड के अनेक पूर्वी एवं पश्चिमी गिरिद्वारों को पार करके यहां पहुँचा करते थे। इतिहासकारों के एक आकलन के अनुसार सन् 1962 में तिब्बत पर चीन का अधिकार होनेे से पूर्व तक यहां के व्यवसायी एवं तीर्थ यात्री बिना किसी प्रतिबन्ध एवं पारपत्र के इसके उत्तरी सीमा पर स्थित 18 गिरीद्वारों से तिब्बत में प्रवेश कर सकते थे। जिसमें प्रमुखता से लिपूलेख, लिम्पियाधूरा, उँटाधूरा (पिथौरागढ़) नीती माणा (चमोली) एवं लडः (उत्तराकाशी)। किन्तु सन् 1962 में चीन के द्वारा तिब्बत का अधिग्रहण कर लिये जाने के बाद यात्रा प्रतिबन्धित हो गई और लगभग अगले कई वर्षाें तक यही स्थिति बनी रही। पुनः सन् 1980 में दोनों देशों (भारत व चीन) के बीच एक समझौते के अन्तर्गत पारपत्र सम्बन्धी औपचारिकताओं की पूर्ति के उपरान्त कैलास मानसरोवर की यात्रा के इच्छुक भारतीय तीर्थयात्रियों को पिथौरागढ़ जनपद के लिपुलेख गिरिद्वार के मार्ग से ताकुलाकोट होते हुए पवित्र कैलास मानसरोवर तक की यात्रा की सुविधा प्रदान की गयी, जिसका आयोजन एवं व्यवस्था

प्रशासकीय स्तर पर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा की जाती है। सामुहिक रूप से आयोजित की जाने वाली इन यात्राओं में यात्रा के इच्छुक व्यक्तियों को कई प्रकार की औपचारिकताओं की पूर्ति करनी होती है। यात्रा के प्रारम्भ होने से पूर्व यात्रियों को दिल्ली में एकत्र होकर स्वास्थ्य परीक्षा आदि से गुजरना होता है। तत्पश्चात् सभी यात्री दिल्ली से पहले पड़ाव काठगोदाम में प्रवेश करते हैं साथ ही आगे की यात्रा करते हैं। भारत सरकार द्वारा उत्तराखण्ड में यात्रा अनुभवी कुमाऊँ मण्डल विकास निगम लि॰ का यात्रा संचालन हेतु नामित किया गया है। यही से यात्रा को कुमाऊँ मण्डल विकास निगम आगे की पूरी व्यवस्था संभाले रखता है। फिर प्रारम्भ होती है तीर्थ यात्रियों की आवभगत। सर्वप्रथम कुमाऊँ के प्रवेश द्वार में तीर्थयात्रियों को स्वागत सतकार व तिलक लगाकर कुमाऊँनी परिधानों में सजी महिलायें शिव भक्तों की यात्रा की मंगलकामना करती है।

यात्रा काठगोदाम से अल्मोडा, पिथौरागढ़, धारचुला, तवाघाट, मालपा, बूंदी, गूंजी के पड़ावो को पार करते हुए कुमाँऊ क्षेत्र के कालापानी, नाभीढांग होते हुए तिब्बत में प्रवेश करती है, जहां से तिब्बत के अधिकारी यात्रियों को अपने संरक्षण में कैलास मानसरोवर तक ले जाने का जिम्मा लेते हैं। वापसी में तीर्थ यात्रियों को कु.म.वि.नि. अपने संरक्षण में दिल्ली तक छोड़ता है।
इतिहासकारों की माने तो इस आधुनिक मार्ग का अनुसरण करने से पूर्व पुरातन यात्रा मार्ग इससे भिन्न हुआ करते थे। कुमांऊ के कत्युरी शासनकाल में पूर्वी क्षेत्रों से जाने वाले मार्ग कुमाँऊ के दक्षिण पूर्व में नेपाल में स्थित ब्रह्ममदेव मंडी के सिद्ध बाबा मंदिर से होकर काली नदी के पूर्वी तट के साथ-साथ जाता था। जनश्रुति है कि कत्यूरी शासक ब्रह्ममदेव ने कैलास यात्रियों की सुविधा के लिए ही ब्रह्मदेव मण्डी की स्थापना की थी। अर्थात् तद्नुसार यह मार्ग सिद्ध आश्रम से पंचेश्वर , देवल (झूलाधार के समीप, बैतूली अंचल) उकू (जौलजीवी के निकट) होकर गुजरता था। वहां से धारचुला, तपोवन होकर आगे जाता था। किन्तु चन्द्रशासन काल में चम्पावत राजधानी के बन जाने से इस पूर्वी मार्ग में परिवर्तन आ गया था।इस ओर से आने वाले यात्री चम्पावत के बाद पूर्वी रामगंगा को पार करके हथुवा (एक हथिया) देवल होते हुए थल पहुँचते थे जो कि तत्रस्थ बालेश्वर के मंदिर के कारण एक देवस्थल का महत्व प्राप्त कर गया था। यात्री यहां स्नान करके बालेश्वर का पूजन करते थे।

तीर्थयात्रियों को रहने व खाने की व्यवस्था भी यहां की जाती थी व दूसरे दिन यात्री डीडीहाट (10 किमी.) होते हुए अस्कोट, जौलजीवी पहुंच जाते थे। इसके बाद वलुवाकोट के रास्ते धारचूला, तपोवन, खंलापांग आदि होते हुए निरपनिया धूरा की झंडीधार पहुंच जाते थे। वहां से आगे मालपा, छिरपती के मूल डंग में भारतीय क्षेत्र के अंतिम पडाव डालते थे। साथ ही वही रास्ता कैलास मानसरोवर की ओर जाता था। इसी प्रकार पवित्र कैलास मानसरोवर की यात्रा नेपाल के रास्ते भी की जाती है। वाई.टी.डी.ओ. संचालक विजयमोहन सिंह खाती के अनुसार नेपाल के रास्ते यह यात्रा मात्र पन्द्रह दिनों में पूर्ण की जाती है । जिसमें यात्री का खर्चा भी और समय भी कम लगता है। इस यात्रा मार्ग में पैदल तो लगभग नहीं के बराबर है। मात्र 36 किमी. पैदल परिक्रमा मानसरोवर की होती है। विजयमोहन सिंह खाती अपने संस्थान से लगभग 5 वर्षों से इस धार्मिक यात्रा का आयोजन कर रहे हैं।

इसी प्रकार कुमांऊ मण्डल विकास निगम द्वारा पिछले वर्ष से इस धार्मिक यात्रा के शेड्यूल में परिर्वतन कर दिया गया है। कु. म. वि. निगम के प्रबन्ध निदेशक धीरज गब्र्याल ने बताया कि इस वर्ष कुमाऊँ के रास्ते से 18 दलों को विदेश मंत्रालय द्वारा अनुमति दी गई है। यात्रा मार्ग को दुरस्त बनाया जा रहा है। साथ ही यात्रा मार्ग में शौचालयों की संख्या भी बढ़ा दी गई है। इसके अतिरिक्त रजाइंया व अन्य सामग्री के लिए विदेश मंत्रालय को बजट की डिमांड की गई है।
उत्तराखण्ड के पौराणिक मार्ग की विशेषता यह भी है कि मार्ग दुर्गम होने के साथ उच्च हिमालयी क्षेत्र में हिम पर्वतों व श्रंखलाएं चमकती नजर आती हैं। 16000 फीट की ऊँचाई पर स्थित नाभीढांग से जिस ऊँ पर्वत के दर्शन भाग्यशाली यात्री को होते हैं, वह भी परंब्रह्म का वाचक ऊँ शब्द की सत्यता को सिद्ध  करता है।

भारतीय हिमालय में नन्दा देवी (25645 फीट) सर्वोच्च शिखर है, जो कि एवरेस्ट के बाद दूसरे स्थान पर आता है। नन्दा देवी पर्वत उत्तराखण्ड में अवस्थित है। इसकी दो चोटियों के बीच लगभग समतल पठार है। लम्बे पठार के दोनों छोरों से चोटियाँ जुड़वा बहिनों जैसी लगती है। इसी प्रकार हिमालय सदियों से मानव को आकर्षित करता आ रहा है।