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कोटेश्वर महादेव में महाशिवरात्रि

कोटेश्वर महादेव में महाशिवरात्रि
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
महाशिवरात्रि का त्यौहार कोटेश्वर महादेव में भगवान शिव की प्राचीन गुफा में भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह रुद्रप्रयाग में गढ़वाल जिला मुख्यालय से लगभग 2 किमी दूरी पर स्थित है। अलकनंदा नदी के तट पर स्थित कोटेश्वर महादेव भगवान शिव की पूजा का पवित्र एवं सबसे बड़े केंद्रों में से एक है। किवदंतियों के अनुसार, कौरवों के नरसंहार के बाद पांडव काशी की तीर्थयात्रा पर निकल पड़े थे। उनका उद्देश्य भगवान शिव से अपने ही भाइयों की हत्या के पाप से मुक्त कराने हेतु आशीर्वाद लेना था। लेकिन भगवान शिव उनसे न मिल गढ़वाल में गुप्तकाशी को चले गए। पांडवों ने वहाँ भी उनका पीछा किया, तब शिव वहाँ से केदारनाथ चले गए। केदारनाथ जाते समय भगवान शिव कोटेश्वर महादेव में रुके जहाँ अलकनंदा नदी ने बहुत ही विशाल रूप धारण कर रखा था। वहाँ नदी पार करना बिल्कुल संभव नहीं था। भगवान शिव ने तब अलकनंदा को गुफा में आमंत्रित किया जिसे आज कोटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। नदी ने वहाँ आने के पश्चात ऐसा छोटा रूप धारण कर लिया मानो जिसे काकड़ भी आसानी से पार कर जाये। तब से वह स्थल काकड-फाल के नाम से भी जाना जाता है।
मंदिर के पुजारी महंत शिवानंद गिरि के अनुसार, ”महाशिवरात्रि का त्यौहार पूरे देश भर में बडे़ आनन्द और रंगों के साथ मनाया जाता है, लेकिन यहाँ महाशिवरात्रि की रात्रि के समय प्रार्थना, आत्मदर्शन, ध्यान और चिंतन में भक्त तल्लीन रहते हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा, ”यह भूमि दोगुनी रूप से पवित्र है क्योंकि यहीं भगवान शिव भस्मासुर दानव के बंधन से मुक्त हुए थे।” प्रथाओं के अनुसार, वह भगवान शिव का एक बड़ा भक्त था जिसने अमरता को प्राप्त करने हेतु कड़ी तपस्या की थी। अमरता के बदले, शिव ने उसे वरदान दिया कि वह जब किसी के सिर को छुएगा, तब वह शीघ्र भस्म हो जायेगा। भस्मासुर भगवान शिव की अर्धांगनी, माता पार्वती पर मुग्ध हो उनके सिर को छूने की कोशिश करने लगा। यह देख भगवान शिव ने भगवान विष्णु से प्रार्थना कर एक सुन्दर स्त्री, मोहिनी का रूप धारण करने का निवेदन किया। पहली दृष्टि में ही भस्मासुर मोहिनी पर भी मंत्रमुग्ध हो उनसे विवाह करने की कल्पना करने लगा। भस्मासुर से विवाह करने हेतु मोहिनी ने हामी भर दी किन्तु सिर्फ एक शर्त पर कि वह उनके साथ नृत्य कौशल में बराबरी करे क्यूंकि मोहिनी को नृत्य बहुत प्रिय था। वे दोनों कई दिनों नृत्य करते रहे और अपनी इसी मोहित कर देने वाले नृत्य के दौरान मोहिनी ने एक नृत्य मुद्रा बना अपना हाथ अपने सर पर रख दिया।उन्हें ऐसा करते देख भस्मासुर ने जैसे ही अपना हाथ अपने सिर पर रखा वह भस्म हो गया।
रुद्रप्रयाग नगर पालिका के अध्यक्ष राकेश नौटियाल कहते हैं, ”इन किवदंतियों एवं लोगों के विश्वास ने बहुत भक्तों के मानस को प्रभावित किया है जिस कारण वे महाशिवरात्रि के दौरान भारी संख्या में यहाँ आते हैं। प्राचीन काल से इस त्यौहार के दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना हेतु तीर्थयात्री कठिन यात्रा कर यहाँ आते है।” मंदिर के पुजारी जो भक्तों के लिए यहाँ पूजा अर्चना करते हैं वह समीप के स्यूं गाँव से सेमवाल, वशिष्ठ और डिमरी समुदायों के लोग हैं। वे बेहद समर्पित एवं निःस्वार्थ भाव से अपनी सेवा प्रदान करते हैं। उन लोगों का लक्ष्य सांसारिक उपलब्धियों के बदले आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त करना होता है।
रुद्रप्रयाग से सामाजिक कार्यकर्ता नागेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट दृढता से कहते हैं, ”पूजा के लिए बेलपत्र को चढ़ाया जाता है वहीं मंदिर के चारों ओर वन में बेल पत्र के पेड़ उन्हें और जीवंत बना देते हैं। यह भी देखा गया है कि पीपल के पेड़ की भाँति बेल का पेड़ अन्य पेड़ों की तुलना में शुद्ध हवा देता है। इस प्रकार शिवरात्रि के दौरान कोटेश्वर महादेव आये तीर्थयात्रियों के लिए यह यात्रा आध्यात्मिक और लौकिक महत्ता प्रदान करती है।”
रुद्रप्रयाग से ही अन्य सामाजिक कार्यकर्ता सूरत सिंह राणा की राय में, ”महाशिवरात्रि भगवान शिव की एक ऐसी अद्भुत रात्रि होती है जब वह तांडव नृत्य या मौलिक सृजन, संरक्षण और विनाश का नृत्य करते हैं। कुछ एक भक्त जन्म और पुनर्जन्म के बंधनों से मुक्त होने तथा जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यहाँ योग और ध्यान के रूप में तपस्या करते हैं।” योग संस्कृति  में भगवान शिव को गुरु या आदि गुरू के नाम से जाना जाता है। यही योग अब प्रौद्योगिकी के रूप में आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व भी करता है। कुछ भक्तों के लिए महाशिवरात्रि का त्यौहार, शिव जिनसे योग की उत्पत्ति हुई थी, का आदर करना है। ऐसा माना जाता है कि यदि रात्रि में जाग कर कोई कोटेश्वर महादेव में ध्यान करता है तो उसे आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति होती है। इस दिन उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रहों की स्थिति और अमावस की रात्रि प्राकृतिक  ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं। कोटेश्वर महादेव के प्रांगण में महामृत्युंजय मंत्र का जाप एक शक्तिशाली वातावरण प्रदान करता है जिससे आध्यात्मिक उपलब्धियों की राह में बाधाएँ भी दूर होती है जो जीवन, स्थायित्व और भंगुरता, वास्तविकता एवं अवास्तविकता के द्वंद्व से मनुष्य को बाहर लाता है।