विचार विमर्श

खून से लिखी गयी दास्ताने हयात’ (अ)

‘खून से लिखी गयी दास्ताने हयात’ (अ)
आबाद जाफ़री, नैनीताल
1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी जान की बाजी लगाकर छोटी सी मशाल जलाने वाले मंगल पाण्डे को भी यह नहीं मालूम रहा होगा कि वह जो मशाल जला रहा है वह चन्द ही रोज में करोड़ों भारतवासियों के दिलों तक पहुँचकर आजादी के जुनून में तब्दील हो जायेगी। एक रोजी शातिर ताकत के सामने जिसकी हकूमत का सूरज कभी अस्त नहीं होता था, चन्द सर-फिरे और जुनूनी हिन्दुस्तानियों का आजादी का नारा लगाना भला क्या औकात रखता था? मगर महज चंद दिन में दुनिया ने देखा कि 10 मई 1857 को मेरठ के चन्द कफन फरोशी भारत माता के बेटों ने अपनी पवित्र भूमि का तिलक लगाकर देहली की जानिब कूच किया। कोई घोड़े पर था कोई पैदल, कई के बदन पर पूरे कपड़े भी नहीं थे। चन्द लोगों के पास गिनी-चुनी पुरानी बन्दूके थीं, तो किसी के पास तलवार, किसी के पास दरांती तो किसी के पास लाठी। यह असंगठित टुकड़ी आजादी के नारे लगाती और अंगेे्रजों को काटती हुुई देहली की तरफ बढ़ रही थी। देहली तक यह छोटा सा जाकिरदारों का काफला सैकड़ों, हजारों में तब्दील हो गया। देहली में इन सपूतों ने जबरदस्त मारकाट की और अंग्रेजों को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। पदच्युत मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को पुनः सम्राट घोषित कर देहली में स्वराज की स्थापना कर दी। 4 माह तक यह बादशाहत रही। इस अवधि में अंग्रेजांे ने अपनी बिखरी हुई शक्ति को एकत्र कर देहली पर पुनः शासन स्थापित कर लिया। उन्होंने देश में उन स्थानों को चिन्हित किया जहाँ इन्कलाबियों का ज्यादा जोर था और सबसे पहले रोहेलखण्ड के पठानों को तबाह किया जो जंगजू समझे जाते थे। अंगे्रजों की इस पुनः वापसी में ‘रायल राइफल बटालियन’ का बहुत बड़ा हाथ था। कश्मीरी गेट देहली को अंग्रेजों की लाशों से पाट दिया गया था और यही हाल मो. का था परन्तु अंगे्रजों ने वापसी करके 1857 से 1867 तक दस बरसों में संवेदनशील स्थानों पर एक करोड़़ हिन्दुस्तानियों को बेरहमी से कत्ल किया।
1857 के इस स्वतन्त्रता संग्राम के कई पहलुओं को हमारे सुनिश्चित, घटिया और अंगे्रज परस्त इतिहासकारों ने इसलिए नजरअंदाज कर दिया है कि कई में मुस्लिम उलमा का जबरदस्त योगदान रहा। देहली से लखनऊ ;अवध तक द्ध लगभग 400 मील की सड़कों के किनारे शायद ही कोई मनहूस पेड़ होगा जिस पर किसी मौलवी की लाश नहीं टंगी थी। देहली में अंगे्रजों की बेरहमी का शिकार ‘देहली अखबार’ के सम्पादक मौलवी बाकर हुसैन हुए। जिन्हें ‘देशद्रोह’ के आरोप में तोप के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया था। भारत में वह सबसे पहले शहीद पत्रकार हैं। पत्रकारों ने आज तक इस पर कभी लिखने की जरूरत इसलिए मालूम नहीं की कि वह राम ‘मुसलमान’ थे।
मैं इस वक्त आपसे सीधी बात करने के मूँड में हूँ। क्या रोजा हो सकता है कि इस प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में हमारे कुमाऊँ का कोई सपूत शामिल नहीं रहा हो? आज किसी का नाम बताएँ। उनकी नस्ल का शायद ही कोई नौजवान कोई नाम बता सके। इतिहास के अनेक विद्वानों और तथाकथित शोधकर्ताओं से मेरी गुफ्तगू हुई है मगर पर्याप्त जानकारी से सब ‘नाबलद’ थे। दर असल इस पहलू को जानबूझ कर छोड़ा गया। कुमाऊँ के राम सपूत ‘कालू मेहरा’ को कोई नहीं जानता, जो 1857 की हमारी आजादी का ‘कुमाऊँनी हीरो’ है।
नैनीताल स्थित तत्कालीन फाँसी गधेरे’ में झील के किनारे राक पेड़ पर रोहैला सरदार खान बहादुर वली खान के तीन साथियों को ‘चैमहला’ (बहेड़ी जिला बरेली का पुराना नाम) से गिरफ्तार करके फाँसी दे दी गयी। मुझे डाॅ. यमुना दत्त वैष्णव अशोक ने बताया था कि उन पठानों के वारीसों से वह एक बार मिले थे जो पाकिस्तान से अपने पूर्वजों की ‘शहादत गाह’ पर आये थे और पेड़ की जड़ पर फूल चढ़ाये थे। इस घटना को इतिहास से निकाल फेंका गया है। वरना यह स्थान आज ‘शहीद स्थल’ होना चाहिए था।