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खून से लिखी गयी दास्ताने हयात’ (स)

‘खून से लिखी गयी दास्ताने हयात’ (स)

आबाद जाफ़री, नैनीताल

यह हमारे स्वतन्त्रता संघर्ष का वह चैप्टर है जिसे बयान करना हम जरूरी नहीं समझते। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के इब्ते दाई दौर मंे नैनीताल और अल्मोड़ा अंग्रेजों की शरणस्थली बने। देश के बड़े भू-भाग मंे अंग्रेजों के विरुद्ध  क्रोध भरा हुआ था। रोहेलखण्ड में रोहेला सरदार हाफिज रहमत खान के पोते ;पौत्रद्ध खान बहादुर वली खान (पुत्र जुलफिकार अली खां) के नेतृत्व में अंगे्रजों को उखाड़ फैंकने का क्रम जारी था। उन्होंने अंगे्रजों की शरण स्थली नैनीताल पर चार बार आक्रमण करने का प्रयास किया। 10 जनवरी 1858 को अंग्रेजों की सेवा से चैमहला ;बहेड़ीद्ध नामक स्थान पर रोहेला जाँबाँजों को करारी शिकस्त दी। इस नाकामी ने अंग्रेजों की शरणस्थली नैनीताल को सुरक्षित कर दिया। उस समय कुमाऊँ में भी कुछ लोग अंग्रेजों के विरुद्ध थे परन्तुु विषम भौगोलिक परिस्थितियों और साधनों के अभाव में कुछ कर पाने में असमर्थ थे। नवाब खान बहादुर वली खान ने खुफिया तरीके से कुछ लोगों को कटोलगढ़ के किलेदार कालू मेहरा के पास भेजा। रोहेलों ने अंग्रेजों को पहाड़ी क्षेत्र से खदेड़ने के पश्चात कालू मेहरा की सत्ता को समर्थन देने का वादा किया। इस समन्वय में दोनों ओर से एक कम्पेक्ट तैयार हुआ जिसमें कहा गया कि भविष्य में खान बहादुर को केवल उतने ही क्षेत्र पर अधिकार होगा जिसमें उनका सरकारी रथ गुजर सके। खान बहादुर के आदेश से फौजी और आर्थिक सहायता भी कालू मेहरा को दी गयी। इस कम्पेक्ट के पश्चात कालू मेहरा ने अपने साथियों के साथ लोहाघाट में अंग्रेजों के फौजी ठिकाने पर आक्रमण कर दिया। पहाड़ी सेना अप्रशिक्षित थी और उनके पास हाथ के बने हथियार थे जो अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों के सामने नहीं टिक सकें। कालू मेहरा की सेना हार गयी। इस हार में गद्दारों की बड़ी भूमिका रही जो कालू मेहरा की सैन्यराजनीति की रिपोर्ट पल-पल अंग्रेजों को दे रहे थे। लोहा घाट में यह ऐतिहासिक स्वतन्त्रता संघर्ष 18 जनवरी 1858 को हुआ था। कालू मेहरा को जेल में डाल दिया गया और उनकी मृत्यु जेल ही में हुई। उनके विश्वास पात्र सैन्य साथियों आनन्द सिंह और बिशन सिंह को अंगे्रजों ने देशद्रोह के आरोप में मृत्यु दण्ड दिया और उन्हें गोली मार दी गयी।
कालू मेहरा की इस घटना का उल्लेख पिथौरागढ़ के पत्रकार श्री बी॰डी॰ कशन्याल जी ने भी एक अंग्रेजी अखबार में किया था शायद 8-9 वर्ष पूर्व की बात है।
यदि गद्दारी नहीं होती और पहाड़ी सेना प्रशिक्षित होती तो भारत में अंगे्रजों की शरण स्थली ही उनकी कब्रगाह बन जाती । मगर अफसोस कि आस्तीन के साँपों ने डस लिया।
आप मंे से कितने लोग कालू मेहरा, आनन्द सिंह और बिशनसिंह के नामों से वाकिफ हैं? स्वतन्त्रता की इस ज्वाला को धधकने में थोड़ा वक्त लगा मगर आगे चलकर कुमाऊँ में स्वतन्त्रता संघर्ष का एक नया वातावरण बना और अनेक स्थानों पर लोगों ने अपने प्राण न्यौछावर किये। इस दूसरे दौर का आरम्भ महात्मा गाँधी की कुमाऊँ यात्रा से शुरू होकर 1947 तक रहा। हमारे स्वनामधन्य कुछ इतिहासकारों ने तो स्वतंत्रता संघर्ष की कुछ घटनाओं को तो हिन्दू और मुसलमान की धार्मिक लड़ाई बना दिया है। कुछ जाहिलों का कहना है कि रोहेले, पहाड़ी लोगों को मुसलमान बनाने आते थे, यह गुमराह कुन प्रोपगन्डा यहाँ के इतिहास ग्रन्थों में बिका प्रमाण मिल जाता है। अच्छा खुदा हाफिज!!
देखना है आज क्या
आकाश देता है हमें,
है उसी बादल में पानी,
है उसी बादल मंे आग!