दिशा तथा दशा

गैस की गाड़ी

गैस की गाड़ी
राजशेखर पंत, नैनीताल -

नैनीताल और इसके आसपास के शहरों जैसे भवाली, भीमताल इत्यादि में एलपीजी की गाड़ी आना किसी उत्सव से कम नहीं होता। लोग अपने-अपने घरों से गैस के सिलिंडर लादे हुए गैस की गाड़ी की ओर भागते हैं, और फिर सिलिंडर मिल जाने पर जीत की सी खुशी के साथ उसे लुड़काते, घसीटते या कंधे पर टिकाये अपने-अपने घरों की ओर वापस लौट जाते हैं। इस उपलब्धि से वंचित रहे बाकी बचे उपभोक्ता हाथ मलते हुए आसपास खड़े लोगों से गैस की गाड़ी के दोबारा आने की संभावित तारीख और दिन के बारे में बातें करने लगते हैं।
एक मजेदार तथ्य यह है कि उपभोक्ता से उसके घर तक गैस पहुँचाने तथा घर से खाली सिलिंडर को वापस गैस की गाड़ी तक ले जाने का भाड़ा गैस सिलिंडर की कीमत में शामिल होता है. पर गैस बाँटने वाले व्यक्ति, चाहे वह ठेकेदार का आदमी हो या संबंधित विभाग का कर्मचारी, के चेहरे पर दाता भाव अपनी समस्त तीव्रता के साथ इतना मुखर होता है कि आम उपभोक्ता सिलिंडर कंधे पर रख अनुग्रहित अनुभव करता हुआ एक साँस में चार पांच बार धन्य होने का इज़हार करता हुआ चुपचाप निकल लेता है। भीमताल जैसे फैले हुए कस्बे में गैस की गाड़ी के तीन-चार पड़ाव हैं। अगर उन निश्चित पड़ावों पर आप अपना सिलिंडर लेकर खड़े हैं तो ठीक है, वर्ना फिर गैस का न मिलना आपकी बदकिस्मती और काहिली है। इसके लिए देवभूमि का समर्पित प्रशासन दोषी नहीं है।
सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं, सरकारी अमले और नेताओं के प्रति हमारे व्यवहार में ‘‘तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी।’’ वाली मानसिकता चस्पा है। वो जो हमें सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को उपलब्ध करने के लिये जिम्मेदार हैं, उनके प्रति हमारे मन में एक श्रद्धा भाव सा प्रायः रहता है। हमारा अचेतन मस्तिष्क यह मानने के लिये अभिशप्त है कि उन सुविधाओं को उपलब्ध करा कर, जो कि वास्तव में हमारा अधिकार है, ये सरकारी नुमाइंदे कोई एहसान कर रहे हैं हम पर। गुलामों वाली, सदियों से दबी कुचली कौम वाली मानसिकता है हमारी। अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की हिम्मत ही नहीं है हममें। अपने हक़ के लिया सामुहिक लड़ाई लड़ना भी नहीं चाहते हम। अपना काम हो जाये बस!!!!! बाकी दुनिया जाये तेल लेने। इधर कुछ वर्ष पूर्व मुझे भी गैस मिलने में ये सब दिक्कतें थीं। मैंने एक लम्बी सी रिपोर्ट सरकारी विभाग के सक्षम अधिकारी का इंटरव्यू लेकर एक अंग्रेजी अख़बार के लिए कर दी। तब से कोई परेशानी नहीं हुई है मुझे। और मैं शायद खुश हूँ।