संस्कृति

गोमाता से प्राप्त उपहार

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
4. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने गाय के गोबर, खमीर व समुद्र जल को मिलाकर एक उत्प्रेरक पदार्थ बनाया और कई स्थानों पर बंजरभूमियों को हरा भरा कर दिया है। वहाँ सूखे तेल के कुँओं में उक्त पदार्थ डाला व पुनः कुँए तेल देने लगे। समुद्र में जहाजांे से रिसे तेल के विष को समाप्त करने के लिये वहाँ गोबर का घोल डाला जाता है जो उस विषैले तेल को सोख लेता है। खेतों के कीटाणुओं को भी नष्ट किया जाता है।
5. गोबर के कंड़ों व उपलों को ईधन के रुप में जलाकर उसकी राख को मल शोधन व दुर्गन्धनाशक के रूप में प्रयोग किया जाता है।
6. गाँवों में अभी भी लोग बर्तनों की सफाई गोबर की राख से करते हैं जिससे ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है, स्वास्थ्य रक्षा होती हैं साथ ही क्लीनिंग पाउड़रों के खतरनाक रसायनों से नाना प्रकार के रोगों की आशंका होती है, उससे भी व्यक्ति सुरक्षित रहता है।
7. प्राचीन भारतीय कृषि पद्धति में कीटाणुनाशकों का कोई स्थान नहीं है। शोध बताते हैं कि गोबर की खाद से की जाने वाली खेती में सभी पोषक तत्व विद्यमान रहते थे। आज की खेती में वे तत्व गायब हो गए हैं जिससे कुपोषणादि बीमारियाँ उत्पन्न हो रही हैं। खाद्यान, फल व सब्जियों में पौष्टिकता समाप्त हो गई है। WHO की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय माताओं के दूध में विष की मात्रा उत्पन्न होने लगी है जिसका कारण कीटाणुनाशकों व रासायनिक खादों का प्रयोग है। W.R.M. ने परीक्षणों में सभी स्थानोें में पेयजल में नाइटेªट, नाइट्राइट की बढ़ी हुई मात्रा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया है।
Encyclopedia britanica ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहा है कि जो किसान इन रसायनों का प्रयोग करते हैं वे प्रतिवर्ष इसकी मात्रा बढ़ाने हेतु मजबूर हैं। IARB ने कहा है कि ऐसी भूमि पच्चीस वर्षो बाद बंजर हो जाती है। मिट्टी के जीवाणु समाप्त हो जाते हंै, मिट्टी एक Drug Adict की भाँति व्यवहार करने लगती है। I.A.R.B. ने चेतावनी दी है कि कुछ वर्षाें बाद पंजाब की भूमि मरूस्थल बन जाएगी, यदि इसी प्रकार जहरीले रसायनों का उपयोग होता रहा। साथ ही कैंसर के विस्तार की पुष्टि भी की गई है। इन रसायनों से जल व वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।
वर्ष 1951-52 से अब तक हमारा देश विदेशों से 40,000 करोड़ रूपये की रसायनिक खाद क्रय कर चुका है। ऐसा लगता है कि यह भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला करने का षडयंत्र तो नहीं है?