संस्कृति

गोमूत्र

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
गोमूत्र पंचगव्य रूपी अमृत का प्रमुख घटक है। मध्य प्रदेश के इन्दौर में वर्तमान में गोमूत्र चिकित्सा पर एक चिकित्सा महाविद्यालय कार्य कर कर रहा है जो गोमूत्र के द्वारा असाध्य रोगों की चिकित्सा पर अनुसन्धान कार्य कर रहा है तथा गोमूत्र चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर रहा है। वहाँ टी.बी., कैन्सर व एड्स जैसे रोगों की चिकित्सा गोमूत्र के द्वारा वैज्ञानिक रूप से की जा रही है।
भारतवर्ष विशेषकर, कुमाऊँ क्षेत्र में, संक्रामक रोगों से बचने के लिये प्राचीनकाल से ही अशिक्षित व्यक्ति भी गोमूत्र का प्रयोग पवित्रता के लिए करता है। गोमूत्र शारीरिक व मानसिक व्याधियों से रक्षक के रूप में यहाँ परम्परागत रूप से प्रतिष्ठित है। आज भी जब ग्रामों में शिशु जन्म के पश्चात् माता को गोबर से बनी सीमारेखा के अन्दर रखा जाता है। उस रेखा से अन्दर/बाहर आने जाने वाला व्यक्ति गोमूत्र छिड़ककर व उसका पान कर के ही आ जा सकता है जिससे शिशु व माता सभी प्रकार के संक्रमणों (प्दमिबजपवद) से सुरक्षित रहते हैं। इसी प्रकार व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके परिवारजन गोमूत्र का प्रयोग कर उसको मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाए रखते हैं। छोटी माता, बड़ी माता, शीतला, चेचक, नाना प्रकार के त्वाचा रोगों, एलर्जी, मानसिक कमजोरी आदि रोगों में यहाँ के ग्रामीण सफलतापूर्वक गोमूत्र का प्रयोग करते हैं। गोमूत्र का विश्लेषण ‘भावप्रकाश’ नामक प्राचीन आयुर्वेद ग्रन्थ निम्न प्रकार करता है-‘‘गोमूत्र चरचरा, कटु, तीक्ष्ण, गर्म गुण वाला, खारा, कसैला, हल्का, अग्निदीपक (पेट की क्षुधा अग्नि को बढ़ाने वाला), बुद्धिवर्धक, स्मरणशक्ति वर्धक तथा कफ, वात, शूल, गुल्म (फोड़ा), खुजली, नेत्ररोग, मुखरोग, किलास, आमवात, बस्तिरोग, कोढ़, खाँसी, सूजन;ेूमससपदहद्ध, कामला (श्रंनदकपबम) व पांडुरोग (।दमउपं) का नाशकारक है।’’
वैद्यक शास्त्रों में फाइलेरिया के कृमियों को समाप्त करने के लिये गोमूत्र का प्रयोग बताया गया है। फाइलेरिया के जीवाणुओं को आयुर्वेद में ‘‘पतले धागे की तरह लम्बे’’ कीटाणु कहा गया है। आज भी अनेक लोगों को फाइलेरिया जनित फीलपाँव (हाथीपाँव) व शरीर विकृतिकारक रोगों से गोमूत्र पान के द्वारा मुक्ति मिली है। इसीलिए गोमूत्र को आयुर्वेद में धर्मानुमोदित, प्राकृतिक, सहजप्राप्त, हानिरहित (ूपजीवनज ेपकम मििमबजे) व आरोग्यवर्धक (ज्वदपब) व दिव्यौषधि (भ्मंअमदसल डमकपबपदम) कहा गया है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह आदि धातुओं तथा वत्स नाभ, धतूरा व कुचला जैसे विषैले रसायनों से विशेष रसायन निर्माण करने के लिये गोमूत्र का प्रयोग किया जाता है।
।सवचंजीपब उमकपबंस ेबपमदबम के अनुसार गोमूत्र में च्वजंेेपनउए ब्ंसबपनउए डंहदमबपनउए ब्ीसवतपकमए न्तमंए च्ीवेचींजमए ।उउवदपंए ब्तपंजपदपद आदि विभिन्न पोषक क्षार पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। गोमय पिलाकर टपजण् ठ12 मिलता है।
चिकित्सा हेतु गोमूत्र का प्रयोग (1) पान (पीना) (2) मालिश (3) पट्टी भिगोकर प्रयोग (4) नस्य (नाक से पीना) (5) एनीमा (गुदाद्वार से प्रवेश कराना) (6) गर्म सेक, छः रीतियों से किया जाता है। पीने हेतु ताजा व मालिश हेतु 2-7 दिन पुराना गोमूत्र ग्राह्य है। बच्चों को पांच ग्राम व वयस्कों को 10-30 ग्राम गोमूत्र का सेवन वांछित है।