संस्कृति

गो-महत्ता

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
देवताओं को जो आहुतियाँ प्रदान की जाती हैं, अग्निरूपी मुख से देवता उसे ग्रहण करते हैं-मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक कव्य भुक तथा।

आहुति दिये जाने हेतु गोघृत आवश्यक है। यह आहुति सूर्य, वरूण, वायु व इन्द्रादि देवताओं को पुष्टि प्रदान करती है। आहुति से सूर्य की किरणें शक्ति प्राप्त करती हैं जिससे वर्षा होती है तथा वर्षा से वनस्पतियाँ व औषधियाँ उत्पन्न होती हैं जिनसे प्राणियों का भरण पोषण होता है। मनुस्मृति में कहा है-
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक आदित्यमउपतिष्ठते।
आदित्याज्जायते वृष्टिः वृष्टेः अन्नं ततः प्रजा।।3।76।।
श्रीमद् भगवद्गीता में कहा गया है-
यज्ञात् भवति पर्जन्यः पर्जन्यात् अन्नसम्भवः।
अन्नात् भवति भूतेभ्यो .......................... ।
सनातन परम्परा में षोडस संस्कारों में सभी में पंच गव्य ;दूध, दही, घी, गोमय व गोमूत्रद्ध के बिना कार्य सम्पन्न नहीं हो पाता है। यज्ञोपवीत संस्कार में बटुक को पंचगव्य का पान आवश्यक बताया गया है। विवाह संस्कार में भूमि को गोमय से लीपकर पवित्र किया जाता है। विभिन्न संस्कारादि में गोदान व वृषभदान का विशेष महत्व बताया गया है। जनन व मरण अशौच के लिये गाय का गोबर व गोमूत्र अति आवश्यक है। बीमार मनुष्य जिसे अन्न नहीं पचता उसे घी की आहुति के धुऐं से बल दिये जाने का आयुर्वेद में विधान है। गाय का दूध भी मरीज को तुरन्त शक्ति प्रदान करता है। यात्रा एवम् मांगलिक कार्यों के प्रारम्भ हेतु गाय के दही को प्रयोग करना शकुन माना जाता है। महायात्रा के यात्री को भी दही का स्पर्श कराया जाता है ताकि परलोक यात्रा मंगलमय हो। वैतरणी नामक नदी को पार करके मोक्षप्राप्ति के लिये गोदान आवश्यक बताया गया है। पितरों को तृप्त करने के लिये श्राðकर्म में गोदुग्ध निर्मित खीर अर्पित की जाती है। देवता भी गोदुग्ध व घृतादि से ही तृप्त होते हैं। गाय के सभी अंगों में देवताओं का वास है। गाय की छाया भी शुभ मानी गई है।