संस्कृति

गो-माता - गोधन

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
बिहार प्रान्तीय गोशाला सम्मेलन के अवसर पर डाॅ॰ राजेन्द्र प्रसाद जी देशरत्न ने पटना में कहा था ‘‘मवेशियों से हमारी जितनी आमदनी होती है और उनसे जो काम हमको मिलता है उसकी मजदूरी को सब जोड़ा जाय तो मवेशियों खासकर गोवंश से प्राप्त आमदनी इतनी होती है जितनी किसी अन्य स्रोत से होनी सम्भव नहीं है।’’
अभी इस मशीनीकरण के युग में भी देश में उत्पादित चावल की कीमत गाय-बैल से हुई आमदनी का एक तिहाई और गेहूँ की कीमत एक चैथाई है। इस प्रकार सारे देश में फैले ये मवेशी अमृतवर्षा की तरह काम कर रहे हैं।
गाय दूध देती है, बैल हल जोतते हैं और बोझा ढोने का कार्य करते हैं। साथ ही गोबर व गोमूत्र जैसी बहुमूल्य वस्तुऐं प्रदान करते हैं, मरने पर कीमती चमड़ा देते हैं और हड्डी आदि सब कुछ फिर जमीन में खाद के रूप में चला जाता है। इन सभी प्राप्तियों का हिसाब सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री सर आर्थर आलवर ने लगाया है 20 अरब रूपये।
सर आर्थर आलवर ने अपने भाषण में कहा था ‘‘हमारे देश में गायें ऐसी होनी चाहिये जो अपनी जिन्दगी में काफी दूध दें। खेती व अन्य कार्यों के लिये मजबूत और मेहनती बछड़े दें, अपने मल मूत्र से काफी खाद दें और मर जाने पर अपने चमड़े, हड्डी व मांस वगैरह से भी हमारी पूर्ति करें।’’ यही गोधन है।
वर्तमान में मरे ढोरों (मवेशियों) की हड्डियाँ विदेशों को निर्यात की जाती हैं, जो कि यहाँ रहतीं तो खाद बनकर जमीन की उर्वरता बढ़ा सकती थीं। उससे देश वंचित हो जाता है। इस प्रकार यदि हम पूरा हिसाब लगा कर देखें और उक्त सभी प्राप्तियों का यथोचित उपयोग करें तो मवेशी रखने में नुकसान नहीं होगा अपितु पर्याप्त लाभ होगा।