संस्कृति

गो-माता गो-महत्ता भाग 1

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
यात्रा के समय गाय/ बैल/ साँड को दाहिने हाथ की ओर रखने के निर्देश हैं। गोदर्शन अत्यन्त शुभ माना गया है। उसके शरीर के स्पर्श से आई हुई वायु भी पवित्र मानी जाती है। किसी भूमि पर यदि भवनादि निर्माण की योजना हो तो वहाँ कुछ दिन पूर्व गाय-बैलों को बाँधा जाता है ताकि भूमि शुð हो जाय। गोरज ;धूलद्ध भी अति पवित्र मानी गई है। निष्कामभाव से गोसेवा करने से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। )षि मुनियों को जो दिव्य दृष्टि प्राप्त होती थी, विलक्षण बुðि प्राप्त होती थी, जिनके द्वारा उन्होेंने वेदों, उपनिषदों, आरण्यकों, ज्योतिष ग्रन्थों, आयुर्वेद ग्रन्थों, तंत्र मंत्रादि ग्रन्थों की रचना की उसके मूल में गोदुग्ध व घृत का प्रभाव बताया गया है। इसी से वे लोग दीर्घायु भी होते थे। इसीलिए गोघृत का एक नाम ‘आयु’ है। वर्तमान में जबकि यज्ञ होमादि की वैसी व्यवस्था नहीं हो पा रही है। इसलिए अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मौसम परिवर्तन (Global Warming) आदि समस्याऐं उत्पन्न हो रही हैं। यज्ञादि होम, दान व तप आदि कत्र्तव्य हैं तथा कत्र्तव्य पालन से देवता भी अपने कत्र्तव्य का पालन करते हैं व वर्षा आदि सम्यकरूपेण होती हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता में कहा है-
देवानभावयतानेन ते देवा भावयन्तु यः।
परस्परं भावयन्त्रः सद्यः श्रेयम उपास्यसि।।
वर्तमान में गोवंश की विशेषकर बैलों की उपेक्षा करके टैªक्टर आदि यंत्रों से खेती की जा रही है। उस विषय में पारिस्थितिक वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग बीस वर्षों में ये पेट्रोलियम पदार्थ समाप्त हो जाऐंगे क्योंकि भूमि के अन्दर में पदार्थ समाप्त हो जाऐंगे। तब फिर गाय बैल ही काम आएंेगे। इन पेट्रोलियम पदार्थों के उपयोग से प्रदूषणादि विभिन्न समस्याऐं भी पैदा हो रही हैं। इसलिये गोवंश की उपेक्षा का बड़ा कठोर दण्ड दुनिया को भोगना पड़ेगा। अतः गोवंश की रक्षा अति आवश्यकीय है।