संस्कृति

गो-माता गो-महत्ता भाग 2

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
गाय के गोबर की कुछ और उपयोगिताएं- श्रावणी कर्म में निम्न श्लोक (मंत्र) का प्रयोग देखें-
अग्रम अग्रम चरन्तीनां ओषधीनां वने वने।
तासामृषभपत्नीनां पवित्रं कायशोधनम्।।
तन्मे रोगांश्च शोकांश्च नुद गोमय सर्वदा।
अर्थात् वनों में औषधियों को चरती हुई वे गौएं पवित्र हैं और मनुष्यों के शरीरों को शोधित करती हैं तथा रोगांे व शोेकों अर्थात् शारीरिक व मानसिक विकारों को वह औषधियुक्त गोमय नष्ट करता है। कहा गया है कि उक्त मंत्र से अभिमंत्रित करके गोमय (गोबर) से लेप कर स्नान करें। डाॅ. रविप्रताप ने ”विशाल भारत“ के एक अंक में लिखा है- ”भारत में अनादिकाल से गोबर का मानव शरीर के लिये औषधि की तरह उपयोग किया जा रहा है परन्तु इस बीसवीं शताब्दी में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से हमने इसे त्याग दिया।“
सनातनधर्मियों के प्रायः सभी धार्मिक कार्यो में गोबर का उपयोग किया जाता है जिसका कारण इसका कीटाणु नाशक होना है। हमारे गाँवों में अभी भी घरों को गोबर से लीपा जाता है और उसे कीटाणुमुक्त व रोगमुक्त रखा जाता है। चूँकि हमारे ऋषि महर्षि वस्तु की व्यावहारिक उपयोगिता जान कर उसे धार्मिक स्वरुप दे देते थे।
एक दगडि़या के पिछले अंकों में रूसी वैज्ञानिकों द्वारा गोबर के सदुपयोग व उसके गुणों के विषय में उल्लेख किया गया है। इस अंक में इटली के वैज्ञानिकों के गोबर सम्बन्धी शोध को देखें- इटली के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो.जी.ई. बीगेंड ने गोबर के ऊपर गहन शोध किये और शोधों के आधार पर सिद्ध किया कि ताजे गोबर के सम्पर्क में आने पर तपेदिक और मलेरिया के कीटाणु तुरंत नष्ट हो जाते है। प्राथमिक अवस्था के जन्तु तो गोबर की गन्ध से ही मर जाते हैं। गोबर के इस अलौकिक गुण के कारण इटली के सेनीटोरियक्स में गोबर से लिपाई पुताई नित्य की जाती है। वहाँ हैजा व अतिसार के रोगी को पानी में ताजा गोबर मिला कर पिलाया जाता है, जिससे तुरन्त लाभ भी होता है। जिस जलाशय में हैजे के जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं उसमें गोबर डाला जाता है।
डाॅ. बीगेंड ने लिखा है कि गोबर से फोड़ा-फुन्सी, घाव, दंश चक्कर व लचक आदि रोग दूर हो जाते है। इटली के ही डाॅ. मैकफर्सन ने लगातार दो वर्ष तक गोबर के गुणों पर अनुसंधान किया और उसके सम्पूर्ण निष्कर्ष विश्वप्रसिद्ध पत्र न्यूयार्क टाइम्स में छपवाया। इस लेख में सिद्ध किया गया है कि गोबर से बढ़कर कीटाणुनाशक कोई दूसरा प्राकृतिक द्रव्य ज्ञात नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा है कि गोबर उसी गाय का उत्तम होता है जिसका आहार उत्तम हो। अपरिलिखित श्लोक मे आया शब्द अग्रमगं्र चरन्तीनाम् इस मंत्र का भी यही अभिप्राय है।
सतपूड़ा के गौंड,भील तथा उत्तराखण्ड़ के सभी मूल निवासी उनका तो कोई भी कार्य गोबर के बिना पूर्ण नहीं होता। अपसार, चक्कर, शिरोरोग व मूर्छा आदि रोगों पर वे गाय के दूध में गोबर घोलकर पिलाते है। और इस का लेप करते हैं। तेल में गोबर मिलाकर मालिश करने से मज्जातन्तु निरोग हो जाते है। क्षय रोग;जनइमत बनसवेपेद्ध ग्रस्त रोगियों को वैद्य लोग गायों के गोठ में सुलाते थे चूँकि गोमूत्र व गोबर की गन्ध से ही क्षयरोग के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। क्षयरोगी के पलंग को गोमूत्र व गोबर से धोया जाता था। ग्रामीण हिन्दु नित्य अपने द्वार के पास देहली को गोबर से लीपा करते थे।
इतिहास गवाह है सन् 1938 ई0 में मद्रास प्रान्त में हैजा (बीवसवतं) फैल गया था। देखा गया कि गोबर क गारों में काम करने वाले लोग इस महामारी से बचे रहे। इस आश्चयर्यजनक परिणाम को देखकर तब से वहाँ विशेेष कर वर्षाकाल में सब कामों मे गोबर का प्रयोग प्रारम्भ हो गया। अध्ययनों से यह भी निष्कर्ष निकला है कि आग से जल जाने या चोट से घाव होने पर गोबर के लेप से वह अच्छा हो जाता है। खुजली व चकते आदि रोग तो गोमूत्र व गोबर के प्रयोग से यों ही ठीक हो जाते हैं।
श्रावणी कर्म के दौरान जो प् पानं का नियम रखा गया है। उसका उद्देश्य है आषाढ़। श्रावण के नए पानी से हैजा आदि रोगों की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है।