संस्कृति

गो-माता गो-महत्ता भाग 1

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
उक्त बिन्दुओं का यदि अवलोकन किया जाय तो ज्ञात होगा कि पशु व कृषि चक्र का रहस्य क्या है? पृथ्वी से उत्पन्न फल-फूल की उपयोगिता कृषि (पृथ्वि रक्षा) से अर्थ प्राप्ति की उपयोगिता स्पष्ट होती है। फल, फूल व शाकादि से उपयोगी विटामिन्स, शर्करा व क्षारा पदार्थ प्राप्त होते हैं जिससे संसार का स्वास्थ्य सम्पादन होता है और ‘काम’ की प्राप्ति होती है। दूसरे बिन्दु अनुसार तिलहन से तेल उत्पन्न होता है, यथा सरसों, राई, मूँगफली, नारियल, सूरजमुखी आदि से। यह तेल खाने व जलाने के काम आता है। इससे आयुर्वेदिक व अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। बचती है खली जो पशु चक्र का पोषण करती है। दूसरी ओर तेल सम्बन्धी कारखाने आदि चलते हैं और अर्थ व काम की पूर्ति होती है। तृतीय बिन्दु में खाद का वर्णन है और यह खाद पृथ्वी से तीन रूपों में प्राप्त होती है जो धरती को अधिक उर्वरक बनाती हैं और ड्डषिचक्र की उन्नति होती है। चतुर्थ चरण में तन्तु (Fibre)  के गुणों के रूप में पाट, कपास व सन आदि आते हैं जिनसे कपड़े की मिलें व लघु-उद्योगों के रूप में चरखे व करघे आदि के चलते हैं। इससे काफी अर्थ लाभ होता है। दूसरी ओर इनसे हरी खाद तैयार होती है जिससे कृषि में वृद्धि होती है। पंचम चरण में चारे (Fodder) का उल्लेख है।धरती माता जो घास व चारा आदि उत्पन्न करती है, वह गौओं व अन्य पशुआंे का महत्वपूर्ण भोजन है। सूखने के बाद भी यह भूसा, पुआल व सूखे चारे के रूप में दीर्घकाल तक काम में आता है। घास चारे से कम्पोस्ट खाद तैयार होती है। इस प्रकार यह घास चारा पशु व ड्डषि दोनों चक्रों के लिये लाभकारी होता है। प्रथम चरण में खाद्य पदार्थों की चर्चा है। धरती से धान, गेहूँ, दालें, साग सब्जियों व गन्ना आदि उत्पन्न होती है। ये पदार्थ मनुष्यों के खास भोजन हैं ही पशु आदि के भी उपयोग में आते हैं। इस प्रकार इनसे पशुचक्र की तो पुष्टि होती ही है दूसरी ओर उत्तम भोज्य पदार्थ प्रस्तुत करके मानव जगत का पोषण करते हैं और ‘काम’ की प्राप्ति कराते हैं और भी जैसे गन्ने से गुड़ व चीनी के कारखाने चलते हैं, मंडियों में अनाज का भी व्यापार होता है और अन्ततः ‘अर्थ’ की प्राप्ति होती है।