संस्कृति

गो-माता गो-महत्ता भाग 2

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
अब गोरक्षा से सम्बन्धित प्रथम स्तम्भ की ओर दृष्टिपात करें। प्रथम चरण में धेनु माता से उत्पन्न बछड़े का उपयोग अर्थात वह साँड बनकर गोवंश की रक्षा व वृद्धि करेगा अथवा बैल बनकर खेती व वाहन चलाने के काम आ सकता है जिससे कृषि चक्र की उन्नति होती है। द्वितीय चरण में इसी प्रकार पशुओं की देखभाल से गायें अच्छा दूध देंगी तो अच्छा दुग्ध व्यवसाय (Dairy farming)  की स्थापना होगी, अच्छे बलिष्ठ पशु तैयार होंगे तो कृषि की वृद्धि होगी साथ ही मृत पशु के चमड़ों को एकत्रित करके अहिंसक चर्मालय चलाए जा सकते हैं। इस प्रकार Dairies से दूध खेती से अनाज व चर्मालय (Teneries)  से विभिन्न वस्तुओं के व्यापार से ‘अर्थ’ की प्राप्ति होगी। तीसरे चरण में प्रदर्शित है कि पशुओं के गोबर, गोमूत्र व खर पतवार आदि से अच्छी Compost  खाद तैयार की जा सकती है जिससे धरती की उत्पादकता बढ़ेगी और कृषि की उन्नति होगी। मृत पशुओं के शरीर से अर्थात हड्डी व मांस से बहुत अच्छी खाद बन सकती है जिससे कृषि का विकास होगा और चमड़े के कारखानों से ‘अर्थ’ प्राप्त होगा। पुनः प्रथम स्तम्भ की ओर दृष्टिपात करें। उत्तम बछिया अच्छी गाय बनेगी। दूध प्रदान करेगी और बछड़े व बछिया भी उत्पन्न करेगी। पांचवे चरण में देखें और वैज्ञानिकों की रिपोर्टाें को पढ़े तो ज्ञात होगा कि दूध की जोड़ का दूसरा कोई खाद्य पदार्थ नहीं है। इससे शरीर स्वस्थ्य, सबल और पुष्ट बनेगा। गोदुग्ध में high class protein घी, मक्खन, Starch आदि उपलब्ध होते हैं जिससे संसार के मनुष्यों की स्वास्थ्य रक्षा होगी। इस प्रकार धेनु माता पशुचक्र व कृषिचक्र की उन्नति तो करती ही हैं, साथ ही मनुष्य के अर्थ और कामरूपी लौकिक पुरूषार्थाें को सिद्ध करती हैं।
अतः स्पष्ट है कि गोदेवी व भूदेवी पारस्परिक सहायता से पुष्ट होकर प्राणियों के लिये अन्न व धन उत्पन्न करती हैं। अन्न से पोषण व धन से ‘काम’ की सिðि होती है। अतः इससे दोनों लौकिक (worldly)  पुरूषार्थ सिद्ध  होते हैं।