संस्कृति

गो-माता

के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
पूर्व में कुछ मूर्ख डाक्टर स्वास्थ्य के लिये मांस, अंडे व मछली को आवश्यक बताते थे परन्तु आधुनिक डाक्टर गाय के दूध को इन तामसिक वस्तुओं से कई गुना श्रेष्ठ बतलाते हैं। अमेरिका के जाॅन राॅबिन्सन ने एक पुस्तक Diet for a new America  जो कि इमेज ेमससमत पुस्तकों की श्रेणी में है लिखी। जिसकी लगभग 25 लाख प्रतियाँ बिक चुकी हैं और इसे पढ़कर लाखों लोग शाकाहारी बन गए हैं। इसके कुछ ंिबजे इस प्रकार हैं-
(1) विश्व में यदि सभी व्यक्ति शाकाहारी हो जाए और खाए जाने वाले पशुओं से ऋषि व वाहनादि का कार्य लिया जाय तो विश्व के Petroleum पदार्थ भंडार अभी 300 वर्ष चलेगा अन्यथा केवल 15 वर्षों में समाप्त हो जाएगा।
(2) शाकाहार (दूध सहित) जल की बचत करता है। एक किलो गेहूँ या दूध के उत्पादन में 250 लीटर पानी लगता है जबकि एक किलो मांस उत्पादन में 2500 ली0।
(3) दूध/शाकाहार से औसतन 1 kg. Protein  प्राप्त करने के लिये 3.50 doller तथा मांस से इतना ही च्तवजपमद प्राप्त करने हेतु 30 Protien खर्च होते हैं।
(4) मांसाधारित आहार मंे कीटनाशक दवाओं के 55%  अंश पाये जाते हैं। जबकि दुग्ध/शाकाहार में केवल 5%  क्योंकि पशु व वनस्पति इन रसायनों को या तो सोख लेते हैं या इनका प्रभाव समाप्त कर देते हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से दुग्ध को पूर्णाहार की श्रेणी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने दी है क्योंकि शरीर रक्षा व संवर्धन हेतु इसमें प्रत्येक तत्व विद्यमान हैं।
चरक संहिता के अनसार ‘‘प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्।’’ अर्थात् यह जीवन को चलाने वाला रसायन है।
आयुर्वेदानुसार गोदुग्ध जीवनोपयोगी, जराव्याधिनाशक, रसायन रोग और वृद्धावस्था को नष्ट करने वाला, कमजोर रोगियों के लिये लाभकर बुद्धिवर्धक, बल वर्धक, दुग्ध वर्धक, पेट साफ करने वाला है। यह थकावट, चक्कर आना, मद, अलक्ष्मी, श्वास, काँस, खुस्की, भूख, जीर्ण ज्वर, मूत्रकृच्छ व रक्तपित्तनाशक है। आयु को स्थिर रखता है व बढ़ाता है।
विदेशों मेें सभी जगह गोदुग्ध डेयरियों का विकास हो रहा है क्योंकि वे लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं परन्तु हमारे यहाँ गाय को बेचकर भैंस पाल रहे हैं। जिसके असर से वर्तमान पीढ़ी की बुद्धि व शरीर भैंस जैसा ही हो रहा है।